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Vachchan Prachar karne wale Paster ke liye Permeswar kya kehta hai ?

Table of Contents

Vachchan Prachar karne wale Paster ke liye Permeswar kya kehta hai

1. बाइबल के अनुसार एक पादरी कौन है ?

० एक पादरी को अपनी मंडली का चरवाहा बनना पड़ता है। उन्हें अपने झुंड की देखरेख करनी चाहिए और पवित्र आत्मा की शक्ति और उपहार पर भरोसा करना चाहिए।

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पादरी का एक कर्तव्य शिक्षक होना है। उन्हें शिष्यत्व प्रदान करना है और लोगों को यह सिखाना है कि मसीह की तरह कैसे रहना है।

2.  क्या बाइबल में कोई पादरी हैं ?

० पादरी, शेफर्ड और एल्डर शब्द सभी एक ही स्थिति हैं। शब्द “वरिष्ठ पादरी” शास्त्र में मौजूद नहीं है, लेकिन – बहु-कर्मचारी चर्चों में –

आमतौर पर उपदेश देने वाले पादरी को निरूपित करने के लिए उपयोग किया जाता है। कई प्रोटेस्टेंट चर्च अपने मंत्रियों को “पादरी” कहते हैं।

3.  पादरी को प्रोत्साहित करने के लिए क्या कहना है ?

पादरी को प्रोत्साहित करने के दस तरीके : –

  1. मसीह के प्रेम में उसके साथ रहो, ईश्वर को अपने हृदय, आत्मा, मन और पराक्रम से प्यार करो और अपने आप को प्रेम करते हुए पादरी से प्रेम करो। …
  2. उसे प्रभु में प्रेम करो
  3. उसके लिए हर समय प्रार्थना करें।
  4. उसे व्यक्तिगत और पारिवारिक आराम के अवसर दें :👇

यह सुनिश्चित करने के लिए सक्रिय रहें कि उसे आध्यात्मिक, भावनात्मक, मानसिक और शारीरिक कायाकल्प मिल रहा है।

प्रार्थना, ध्यान और चिंतन के समय के लिए उसे प्रोत्साहित करें। अपने दिन या दिनों के दौरान उसे अकेला छोड़ दें, जब तक कि यह एक आपातकालीन स्थिति न हो।

अपनी सभी समस्याओं को हल करने के लिए उस पर भरोसा न करें, इसलिए लगातार उसके पास जाते रहें।

शायद कुछ फंड भी जुटाए और उन्हें और उनके परिवार को एक क्रूज या एक अध्ययन अवकाश पर भेज दें।

  1. पादरी का सम्मान, सराहना और सम्मान करें :👇

बाइबल पादरी को करने के लिए आवश्यकताओं की एक अधिक कठोर सूची देती है और स्थानीय चर्च में पादरी की भूमिका निभाने के लिए विशेष रूप से भूमिका अदा करती है।

फिर भी, बाइबल पादरी (ओं) और बड़ों के संबंध में आपकी ज़िम्मेदारी के बारे में समान रूप से स्पष्ट है। (फिल। 02:29;  1 थिस्स। 5:12, 13  प्रेरितों 28: 9-10, 2 कुरि। 7) : 15)

ईसाईयों को स्थानीय चर्च के पादरी (बड़ों) और बड़ों का सम्मान करने का निर्देश देता है (1 तीमु। 5:17)। एपॉस्टल पॉल के शब्दों में पाया जा सकता है कि तीमुथियुस के बारे में कुरिन्थुस के चर्च में,

जब उन्होंने कहा, अब अगर तीमुथियुस आता है, तो देखें कि वह बिना किसी डर के आपके साथ हो सकता है; क्योंकि वह यहोवा का कार्य करता है, जैसा मैं भी करता हूं।

इसलिए कोई भी उसे तुच्छ न समझे (1 कुरिं। 16: 10-11)।

  1. वह सब कुछ करें जो आप उसकी आत्मा में जान डाल सकते हैं :👇

उसका निर्माण करें, उसे प्रोत्साहित करें, और उससे संवाद करें कि कई तरह से उसकी सेवा का आपके लिए कितना मतलब है।

उसे उठाएँ, उसे प्रेरित करें, और उसे मसीह में आशीर्वाद दें। आप इसके लिए अवशिष्ट प्रभावों को पुनः प्राप्त करेंगे।

उसे और उसके परिवार को प्रभु के पास लगातार प्रार्थना करने के लिए उठाइए। प्यार और दया दिखाओ। अनुग्रह, आशा और प्यार का एक कंडक्टर बनो अपने पादरी का निर्माण करने के लिए।

  1. मसीह में उसके प्रति वफादार रहो : 👇

जब वह भरोसेमंद हो तो उस पर भरोसा करें। वह जो है और जिस कार्यालय के लिए है, उसके लिए उसका इलाज करो।

  1. जैसा वह तुम्हें देता है, वैसा ही उसे दो :👇

केवल मौद्रिक सहायता न दें, बल्कि उसे और उसके परिवार को सेवा दें। कल्पनाशील बनें और उन तरीकों के बारे में सोचें जिनसे आप अपने पादरी की सेवा कर सकते हैं:

उसे वास्तविक और मूल्यवान प्रतिक्रिया दें; उसे नैतिक समर्थन दें; उसे समय दें और प्रार्थना करें। सबसे बढ़कर उसे प्यार और स्नेह दें!

  1. यीशु के नाम से सत्य के वचन को खूल के बोले किसी से ना डरे : 👇

आप सभी उसके नाम और प्रतिष्ठा की रक्षा कर सकते हैं, लेकिन इससे भी अधिक, उसके नाम का निर्माण करें ताकि यह सम्मान का नाम बन जाए।

निश्चित रूप से, पादरी को मसीह में अपनी प्रतिष्ठा और एकता  बनाए रखना चाहिए। यदि आप स्पष्ट रूप से पाप करते हैं और प्रभु के नाम को बदनाम करते हैं, तो यह आपके लिए दिखावा नहीं है।

हालांकि, अगर उसके पास फटकार से परे एक चरित्र है, तो इसे बनाए रखें, इसे बनाए रखें, और इसे बढ़ावा दें।

  1. अपने पादरी के पास जाने के लिए अपने पादरी की तरह लोभी मत बनो, जिसकी तुम प्रशंसा करते हो या मूर्तिपूजा करते हो :👇

वह पादरी भगवान ने इस समय चर्च में और आपके जीवन में रखा है। परमेश्वर वह है जिसने पादरी को व्यक्तिगत प्रतिभाएँ,

आध्यात्मिक उपहार और चर्च को दिया है; पूर्व पादरी, प्रसिद्ध पादरी, या कोई अन्य सराहनीय व्यक्ति नहीं। उन लोगों के गुणों का आनंद लेना और उनका जश्न मनाना काफी ठीक है,

जबकि एक ही समय में अपने वर्तमान मंत्री को मनाना और आनंद लेना।

4. एक पादरी की बाइबिल जिम्मेदारियां क्या हैं ?

० एक पादरी के मूल कर्तव्यों में से एक पूजा सेवाओं का नेतृत्व करना है। पारंपरिक ईसाई चर्चों में रविवार सुबह परमेश्वर पिता   की सेवाएं हैं।

हालांकि, समकालीन चर्चों में कभी-कभी बुधवार या शनिवार की रात भी सेवाएं होती हैं। एक पादरी सामान्य रूप से सबसे नियमित पूजा उपदेश या संदेश तैयार करता है और प्रस्तुत करता है।

5.  पादरी के कर्तव्य और दायित्व क्या हैं ?

एक पादरी की नौकरी की जिम्मेदारियां

० एक पादरी के रूप में, आप एक चर्च के सदस्यों को आध्यात्मिक नेतृत्व प्रदान करते हैं। आपके कर्तव्यों में साप्ताहिक उपदेश तैयार करना,

उपदेश देना और पूजा सेवाएं आयोजित करना शामिल है। यह आपकी ज़िम्मेदारी है कि कलीसिया के लिए बाइबल के शास्त्र की व्याख्या करें।

5.1.  याकूब 3:1,2👇

1) प्रिय भाइयो और बहनो, चर्च में ज़्यादा लोगों को शिक्षक नहीं बनना चाहिए, क्योंकि हम सिखाने वालों के साथ परमेश्‍वर ज़्यादा सख्ती के साथ पेश आएँगे।

2) हम सभी बहुत गलतियाँ करते हैं, लेकिन जो इन्सान अपनी ज़ुबान को वश में कर सकता है, खरा मनुष्य है, और हर दायरे में अपने आपको वश में कर सकता है।

० “शिक्षक”- इसका मतलब है बाईबल शिक्षक। ऐसे व्यक्‍ति के पास एक गंभीर ज़िम्मेदारी है। पहली बात यह कि जो कुछ वह दूसरों को सिखाता है पहले खुद करता है या नहीं।

इसलिए कि उसके पास ज्ञान ज़्यादा है उसकी शिक्षा का हिसाब भी परमेश्‍वर सख्ती से लेंगे। इसलिए बाईबल सिखाना हल्की फ़ुल्की बात नहीं है।

हर एक शिक्षक को जानना चाहिए कि उसकी बुलाहट शिक्षक की है और शिक्षा देने का वरदान है। ध्यान दें याकूब कहता है कि हम सभी ऐसा अलग तरीकों से करते हैं।

० बहुत चालाकी से मसीही लोगों का पहले विश्‍वास जीतते हैं। बाद में गलत शिक्षा का परिचय कराते हैं। वे सच्चाई के साथ ‘झूठ’ को ऐसा मिला देते हैं, कि वह सच्चाई ही लगती है।

उन में से ज़्यादा लोग रखवाले, शिक्षक और बिशप हैं जो अलग डिनॉमिनेशन के हैं। गलत शिक्षाएँ लोगों और पूरी मण्डलियों को बर्बाद कर डालती हैं।

धार्मिक झूठ बहुत खतरनाक होते हैं। शैतान के पहले झूठ ही ने इन्सान को बर्बादी में ढकेल दिया था। उसके मानने वाले बहुत से लोगों को बर्बाद करते हैं।

ज़ुबान को”- याकूब कहता है कि इन्सान के पास जो कुछ है उसमें से सब से मुश्किल में वश में आने वाली चीज़ जीभ है।

जिसने अपनी ज़ुबान को काबू में कर लिया है, वही परिपक्व है और परमेश्‍वर के काम के लिए योग्य है।

5.2.  1 तीम. 3:2-7👇

2) इसलिए चाहिए कि देख-रेख (चरवाही) करने वाला, आरोप मुक्‍त , और एक ही पत्नी का पति , संयमी , सुशील , सभ्य , मेहमान नवाज़ी करने वाला , और सिखाने में निपुण हो।

3) शराबी या मारपीट करने वाला न हो, पैसों का लोभी न हो , बल्कि कोमल स्वभाव का हो। वह झगड़ालू और लालची भी न हो ।

4) वह अपने घर का अच्छा इन्तज़ाम करता हो, और उसके बच्चे पूरी आधीनता के साथ उसका आदर करते हों।

5) जब कोई अपने ही घर का प्रबन्ध करना न जानता हो, तो परमेश्‍वर की कलीसिया (चर्च) की देखभाल कैसे करेगा?

6) दूसरी बात यह, कि देख रेख करने वाला नया शिष्य न हो , ऐसा न हो, कि घमण्ड से भर कर शैतान के समान सज़ा पाए।

7) बाहर वालों के बीच उसकी गवाही अच्छी हो , ऐसा न हो कि निन्दित होकर शैतान के फँदे में फँस जाए।

० जिस व्यक्‍ति को कलीसिया इस पद के योग्य समझती है, उसे पवित्र ईमानदार और नैतिक जीवन जीना चाहिए कि उसके ऊपर किसी गलत कार्य के लिए उँगली उठायी न जा सके।

० “एक ही पत्नी का पति”- उन दिनों में एक से अधिक पत्नी रखना आम बात थी। यह संभव था कि ऐसे पुरुष जिनकी एक से अधिक पत्नियाँ थीं, मसीह के शिष्य बन गए थे।

ऐसे व्यक्‍ति को अगुवे का स्थान नहीं मिलना चाहिए। अगुवों को पूरी कलीसिया (चर्च) के लिये ऐसा नमूना होना चाहिए, जिन्हें लोग अपना आदर्श बना सकें 👉

(1 पतर. 5:3)। आरम्भ से मनुष्य के लिये यह परमेश्‍वर की योजना थी, कि एक पुरुष की एक ही पत्नी हो -👉

उत्पत्ति 3:22-24;👉 मत्ती 19:3-9. कुछ लोग सोचते हैं कि ‘एक ही पत्नी का पति’ का मतलब है कि ऐसा अगुवा जिसका दूसरी बार विवाह न हुआ हो।

दूसरे लोग सोचते हैं कि पौलुस यह सिखा रहा था कि अविवाहित पुरुषों को अगुवे (देख-रेख करने वाले) नहीं होना चाहिए, जब कि वह स्वयं अविवाहित था 👉

(1 कुरि. 12:28; 2 कुरि. 11:28)।, फिर भी एक देख-रेख करने वाले से उसका पद ऊँचा था जिसके अन्तर्गत वह अनेकों मण्डलियों के ऊपर था। क्या हम इस संभावना के विषय में सोचते हैं कि वह व्यक्‍ति जिसने 👉

1 कुरि. 7:1, 8, 26, 27, 32-34 लिखा, यह सिखा रहा है कि अविवाहित पुरुषों को देख-रेख करने वाला नहीं बनना चाहिए?

० एक पादरी को “संयमी”- अपनी इच्छाओं को आधीन करना सीखना चाहिए ।

० पादरी को “सुशील”-  👉1 कुरिन्थ. 9:17  यदि मैं खुद की इच्छा से ऐसा करता हूँ तो मुझे इसका प्रतिफल मिलेगा।

लेकिन मेरे पास कोई दूसरा रास्ता या चुनाव नहीं, इसलिए कि परमेश्‍वर ने मुझे यह ज़िम्मेदारी सौंपी है।

० एक पादरी को “सभ्य” वाले व्यक्ति होना चाहिए – यह पर्याप्त नहीं कि मात्र परमेश्‍वर के वचन को जाने या सिखाएं ।

पादरियों को भी यीशु के अनुसार करना चाहिये। उसके अनुसार चलना चाहिए ना की चर्च के लोगों को सिखाना ही काफी  है पादरी को भी यीशु मसीह के पक्के वचनों को पकड़ के चलना चाहिए है ,

और उसके अनुसार चलना होगा ताकी चर्च में आने वाला हर व्यक्ति के नजर में यीशु मसीह के जीवन किस तरह था इस पृथ्वी काल में ; उस पादरी के जीवन में दिख सके ये जरूरत भी  है ।

एक पादरी को महमान नवाज़ी करने वाला होना चाहिए ”- उसे लोगों को अपने घर में और चर्च में खुशी खुशी  स्वागत करना चाहिये और दया दिखानी चाहिये -👉

इब्रा. 13:2. तीतुस में यह और अधिक कठोर शब्दों में है – “सेवा के चाहने वाले” – जो पहुनाई या सेवा करने में दिलचस्पी लेता है, न कि उसे प्राप्त करने में।

स्वार्थवश से अपने आपको दूसरे उन लोगों से बचाना नहीं चाहिये जिन्हें उसकी ज़रूरत है।

एक पादरी को सिखाने में निपुण होना चाहिए ”- बाईबल सिखाने के लिए अगुवों को बाईबल का ज्ञान होना चाहिये – यदि वे स्वयं बाईबल नहीं जानते तो दूसरों को क्या सिखाएँगे।

उनके पास परमेश्‍वर द्वारा दी गई सिखाने की योग्यता भी होनी चाहिये।

० “एक पादरी को शराबी नहीं होना चाहिए ”–  शराब का आदी न हो।👉 रोमि. 14:21 और  हमें सर्वोत्तम सिद्धान्त देते हैं।

प्रत्येक व्यक्‍ति को स्वयं को परमेश्‍वर के प्रति समर्पित करना चाहिये, न कि दास के। 👉इफिसि. 5:12 क्योंकि उन बातों के बारे में जिन्हें वे छिप कर करते हैं, मुँह से कहने में भी शर्म आती है।

एक पादरी को  लोभी नहीं  होना चाहिए ”- 👉 मत्ती 6:24; लूका 16:13-14. यदि इन सभी सिद्धान्तों को लागू किया जाए, तो आज कलीसिया से कितने अगुवे निकाल दिये जाएँगे?

पर परमेश्वर की येही इच्छा है । ऐसा करना भी जरूरी है ।

० पादरियों को “कोमल स्वोभाव के होना चाहिए , झगड़ालू नहीं” होना चाहिए -👉 2 तीमु. 2:24-25; मत्ती 11:29. परमेश्‍वर के सेवकों को गाली नहीं देनी चाहिये।

न ही दूसरों को पैसा देकर ऐसा करना चाहिये। जो ऐसा करता है, उसे मसीही नहीं कहलाना चाहिये, न ही उसे मण्डली में अगुवाई करने का स्थान दिया जाए।

“और न लालची हो”- जो व्यक्‍ति धन या सम्पत्ति बेईमानी या गलत तरीके से लेता है, उसे नेतृत्व का कार्य नहीं दिया जाना चाहिये। इतना ही नहीं,

ऐसी कोई भी इच्छा उसे सदा के लिये नाश कर सकती है 👉 यूहन्ना 12:6. प्रत्येक मसीही लालच से जो विष समान है, किनारा करे।

० अपने घर का अच्छा इन्तज़ाम करता हो, और बच्चों को सारी गंभीरता से आधीन रखता हो – तीतुस 1:6 देखें।

यदि कोई इन्सान अपने घर में सही स्थान नहीं ग्रहण करता है, तो वह कलीसिया की सही रीति से अगुवाई करने के लायक भी नहीं है।

यह इस बात को निर्धारित करने के लिये अच्छा पैमाना है, कि कोई व्यक्‍ति देखरेख करने के योग्य है या नहीं। क्या इसका अर्थ यह है,

कि विवाहित होने के बाद यदि उसकी संतान नहीं है, तो वह देखरेख करने वाला नहीं बन सकता? नहीं ऐसा नहीं है। पौलुस का अर्थ यह है,

कि उसे अपने बच्चों को वश में करना चाहिये ।“एक ही पत्नी का पति” – यदि पौलुस यह नहीं कह रहा है कि देखरेख करने वाले के पास बच्चे होने ही चाहिये,

तो वह यह भी नहीं कह रहा है, कि उसे विवाहित होना ही चाहिये। दोनों बातें एक ही दायरे की हैं।

० एक पादरी “नया शिष्य न हो”- पौलुस तुरन्त कहता है …. क्यों? यह बेहतर है कि देखरेख करने वाला नया विश्‍वासी न हो,

बजाए इसके कि ऐसे लोगों को नियुक्‍त किया जाए, जिन्हें अनुभव न हो। इसके पहले कि विश्‍वासियों को नेतृत्व का काम सौंपा जाए,

उन्हें आत्मिक रूप से तरक्‍की करना, परमेश्‍वर के सत्य में मज़बूत हो जाना चाहिये। नहीं तो वे दूसरों को सिखा नहीं पाएँगे, न ही अगुवाई कर पाएँगे।

यह भी कि आत्मिक शिशु, जिन्हें नेतृत्व की ज़िम्मेदारी दी जाती है, घमण्ड से फूल न जाएँ।

० एक पादरी “शैतान के समान सज़ा” देने वाला ना हो – अर्थ यह है  शैतान निरन्तर विश्‍वासियों पर दोष लगाता है👉 (प्रका. 12:10)।

यदि वह चर्च के अगुवे में घमण्ड और कपट देखता है, तो उसे परमेश्‍वर के साम्हने दोष लगाने का अवसर मिलता है। 👉मत्ती 4:1 में शैतान पर नोट्स देखें।

० सच पूछें तो यह बहुत ज़रूरी है। इसका अर्थ है कि उसका जीवन, मात्र शब्द नहीं, उन लोगों के लिए गवाही होना चाहिए।

यदि एक मण्डली ऐसे व्यक्‍ति को अगुवा या पादरी नियुक्‍त करती है, जो समाज में दुष्टता और अनैतिकता का जीवन जीता है,

तो वे ऐसा कर के उस पर दोष लगाकर पूरी कलीसिया के लिए शर्म का कारण बन सकते हैं। यह उनके लिए एक ठोकर का कारण होगा,

जो लोग मसीह पर विश्‍वास करना और कलीसिया का अंग बनना चाहेंगे।

० एक बार फिर पौलुस अगुवे या पादरी में आवश्यक गुणों की सूची देता है। जो तीमुथियुस के पहले पत्र के पहले अध्याय में दिखाई देती है।

यह भी कि अगुवों के बच्चों को विश्‍वासयोग्य होना चाहिए, न कि अनाज्ञाकारी । उसे बहुत जल्द गुस्सा नहीं आना चाहिए, नीच कमाई का प्रेमी नहीं होना चाहिए।

वह पवित्र और सच्चा हो और विश्‍वसनीय वचन को पकड़ कर रखता हो।

5.3.  मत्ती 6:12👇

12) जिस तरह हम ने अपने अपराधियों को माफ़ किया है, वैसे ही हमारे अपराधों को माफ़ करें ।

० अलग-अलग शब्दों में यीशु ने एक ही प्रार्थना को क्यों दिया है? शायद इसलिए कि गुनाह, अपराध और जानबूझ कर की जाने वाली बुराई है और ‘कर्ज़’ वह जो करना चाहिए और नहीं किया गया।

हम तुलना करने पर यह पाते हैं कि परमेश्‍वर के कर्ज़दार होना भी गुनाह है। हमें चाहिए कि हम परमेश्‍वर के प्रति पूरी आज्ञाकारिता और प्रेम रखे बिना अपनी असफ़लता को

माने कोई प्रार्थना पूरी नहीं है, जिसे यीशु ने सिखाया। यह तो एक नमूना है। हर एक को हर दिन अपनी गलतियाँ मानना है।

० दुष्टता की तरफ़ हमारा रूझान और मुआफ़ी की ज़रूरत यह यीशु के शब्द इन के शिष्यों से कहे गये थे। वे अच्छे लोग थे।

लेकिन परमेश्‍वर की दृष्टि में क्या थे, यह यीशु बताते हैं यीशु अपने लोगों के साथ ही सारी दुनिया के लोगों की सही हालत पर रोशनी डालते हैं।

बुरे विचार, बुरी इच्छाएँ, बेवकूफ़ी के और अनुचित काम, परमेश्‍वर की न मानने की आदत – यह सब बुरे स्वभाव/मन के लक्षण हैं।

शिष्य भी अपने मन के ख्यालों, बातचीत और कामों में सिद्ध नहीं थे। अगर कोई सोचता है कि वह शुरू के इन शिष्यों से अच्छा है तो क्या वह गलती नहीं कर रहा है?

जब हम प्रार्थना करते हैं हमें अपने को सद्गुणी नहीं समझना चाहिए, जैसा फ़रीसी👉 लूका 18:10-12 में करता है।

लेकिन अपनी असफ़लता और कमज़ोरी का एहसास करते हुए कि अगर हमें कुछ मिलता है तो यह परमेश्‍वर की कृपा है।

० एक बात और देखें। यीशु ने अपने शिष्यों को ‘कुकर्मी’ नहीं कहा, जैसे झूठे नबियों को कहा था। यह कहना कि शिष्यों के अन्दर बुरा मन (स्वभाव) है,

का मतलब यह नहीं कि वे जानबूझ कर बुराई में हैं। हमारे स्वभाव बुरे होने के बावज़ूद, हम कुकर्मी नहीं कहलाए जाएँगे।

बुरे स्वभाव के साथ ही यीशु के शिष्यों के पास नया (अच्छा स्वभाव) भी है। 👉इफ़ि. 4:22-24. बुरे स्वभाव पर जीत हासिल कर के जीवन जिया जा सकता है ।

० जो लोग मसीह के संदेश का विरोध करते हैं वे आत्मिक रीति से दिमाग से सरके हुए हैं 👉(सभो. 9:3 से तुलना करें)।

अपने कल्याण के खिलाफ़ वे बेवकूफ़ी का व्यवहार करते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि शैतान ने उन्हें गुलाम बना लिया है और उन्हों ने उसके झूठ को अपना लिया है। 👉

(यूहन्ना 8:44; प्रे.काम 26:18; 2 कुरि. 4:4; इफ़ि. 2:2 से तुलना करें। जो विरोधी ताकते हैं, उनके बारे में उन्हें अनजान नहीं होना है।

उन्हें यह जानना है कि मात्र याहवे की शक्‍ति लोगों को आज़ाद कर सकती और इसे हासिल करने के लिए परमेश्‍वर सत्य की शिक्षा का उपयोग कर सकते हैं।

5.4.  मत्ती 12:31👇

इसलिए मैं तुम से कहता हूँ हर तरह की दुष्टता और बुराई माफ़ की जाएगी , लेकिन पवित्र आत्मा के खिलाफ़ बुराई (निन्दा)  माफ़ नहीं, की जाएगी।

० जिसे परमेश्‍वर तैयार करते हैं, शिक्षा देने के लिए, उसे बहुत संतोषजनक अद्भुत काम दिया गया है। वह दूसरों की बड़ी भलाई कर सकता है।

अपने इस काम में इन्हें खतरनाक अंग (जीभ) का इस्तेमाल करना है। झूठे शिक्षक बर्बादी को लाते हैं। वे परमेश्‍वर को प्रेरित करते हैं कि वह उन्हें बर्बाद कर डाले।

उनका व्यवहार दिखाता है कि न्याय उन पर आएगा। जो कुछ होगा, वे पूरी तरह से उसके ज़िम्मेदार होंगे।

5.5.  लूका 12:47-48👇

वह नौकर जो अपने मालिक की इच्छा जानता था, और तैयार न रहा और न उसकी इच्छा के मुताबिक जी रहा था, बहुत मार खाएगा।

लेकिन जो नहीं जान कर मार खाने के लायक काम करे वह थोड़ी मार खाएगा, इसलिए जिसे बहुत दिया गया है, उससे बहुत आशा की जाएगी, और जिसे बहुत सौंपा गया है, उससे बहुत लिया जाएगा।

० इन्साफ़ के दिन यह देखा जाएगा कि लोगों ने अवसर और हासिल किए हुए ज्ञान का कितना फ़ायदा उठाया।

5.6.  रोमि 12:6-7👇

मिलने वाली असीम कृपा (अनुग्रह) के कारण हमें अलग-अलग वरदान प्राप्त हैं। यदि भविष्यद्वाणी का दान है तो विश्‍वास के माप के अनुसार व्यक्‍ति भविष्यद्वाणी करे।

यदि सेवा करने का है, तो वह सेवा में लगा रहे। यदि सिखाने का वरदान है, तो सिखाने में लगा रहे।

5.7.  गिनती 11:25;👇

फिर यहोवा एक बादल में उतरा और उसने मूसा से बात की। मूसा पर उसकी जो पवित्र शक्‍ति थी, उसमें से थोड़ी लेकर उसने उन 70 मुखियाओं में से हरेक को दी।

जैसे ही उन सब पर पवित्र शक्‍ति आयी, वे भविष्यवक्‍ताओं जैसा व्यवहार करने लगे। मगर इसके बाद उन्होंने फिर कभी ऐसा व्यवहार नहीं किया।

5.8.  1 कुरिन्थ. 12:10👇

किसी को आश्चर्य के कामों को करने की शक्‍ति , किसी को भविष्यद्वाणी करने की, किसी को आत्माओं की परख ,

किसी को तरह-तरह की भाषाएँ बोलने और किसी को उन भाषाओं का मतलब बताना।

आश्चर्य के कामों को करने की शक्‍ति”- यह लोगों को ठीक करने से हटकर अद्भुत कार्य करने की योग्यता है।

पौलुस यह नहीं बतलाता है कि वे चमत्कार कौन से हैं। किंतु हम जान सकते हैं कि वे सभी विश्‍वासियों के सामान्य लाभ के लिये हैं ,

न कि उस व्यक्‍ति के बड़े नाम के लिये जिसके पास यह है।

भविष्यद्वाणी”- यह वह वरदान है, जिसमें व्यक्‍ति परमेश्‍वर की ओर से शान्ति और प्रोत्साहन का सन्देश ग्रहण करता है और पवित्र आत्मा की सहायता से दूसरों को देता है।

संदेश भविष्य से सम्बंधित हो भी सकता है या नहीं भी।

आत्माओं की परख”– यह जानने की योग्यता है कि बोलने वाला या भविष्यद्वाणी करने वाला व्यक्‍ति परमेश्‍वर की सहायता से ऐसा कर रहा है या नहीं।

सभी लोग परमेश्‍वर की ओर से प्रेरित नहीं होते, जैसा कि कई बार दिखाई देता है। हो सकता है कि वह दुष्टात्मा से या अपनी ही आत्मा से प्रेरित हो।

5.9.  1 कुरिन्थ. 14:29👇

नबियों में से दो या तीन ही बोलें, दूसरे लोग परखें ।

० झूठे भविष्यद्वक्‍ताओं और झूठी भविष्यद्वाणियों की संभावना के कारण उन्हें जो कुछ कहा जाता था उसे परखना ज़रूरी था।

उन्हें इन भविष्यद्वाणियों को कैसे परखना था? यह देखना था कि पुरानी वाचा के वचन और मसीह और प्रेरितों की शिक्षा के समानांतर यह शिक्षा थी, कि नहीं।

कोई भी ऐसी शिक्षा जो इन के विपरीत थी, वह झूठी और खतरनाक थी।

5.10.  1 थिस्स. 5:20-21👇

भविष्यवाणियों को तुच्छ न मानो। सब बातों को परखो , जो अच्छी है उसे पकड़े रहो।

० “भविष्यद्वाणियाँ”- इसका अर्थ है कलीसिया (चर्च) के उन लोगों के द्वारा भविष्यद्वाणियाँ, जिनके पास यह आत्मिक योग्यता थी।

प्रत्येक भविष्यद्वक्‍ता या भविष्यद्वाणी प्रभु की ओर से नहीं है –

5.11. 1 यूहन्ना 4:1👇

प्रिय भाइयो बहनो, किसी भी आत्मा पर विश्‍वास मत कर लेना, लेकिन परखना कि वे परमेश्‍वर से हैं या नहीं, क्योंकि इस दुनिया में बहुत से झूठे (जाली) भविष्यद्वक्‍ता हैं।

० यूहन्ना ऐसे दो आधार परखने के लिए देता है, जिससे हम जान सकते हैं, कि लोग सच्चाई को अपना रहे हैं या नहीं।

किसी भी आत्मा पर विश्‍वास” – इस दुनिया में परमेश्‍वर का आत्मा है और गंदी आत्माएँ भी हैं। ये गंदी आत्माएँ लोगों को प्रेरित करती हैं, कि गलत सिद्धान्त सिखाएँ।

ये उन में होकर भी बात कर सकती हैं। हमें हर एक शिक्षक पर भरोसा नहीं करना चाहिए, जो सिखाना चाहते हैं, या वे आत्माएँ जो दूसरे मनुष्यों में से होकर सिखाना चाहती हैं।

5.12.  1 तीम. 4:1-3👇

1) लेकिन आत्मा स्पष्टता से कहता है, कि आने वाले समयों में बहुत लोग भरमाने वाली आत्माओं और दुष्टात्माओं की शिक्षाओं पर मन लगाकर विश्‍वास से बहक जाएँगे।

2) वे पाखण्ड के साथ झूठ बोलेंगे , उनका विवेक मानो जलते हुए लोहे से दागा गया हो।

3) वे शादी (विवाह) करने से रोकेंगे और खाने की कुछ वस्तुओं से परहेज़ करने की आज्ञा देंगे, जिन्हें परमेश्‍वर ने इसलिए बनाया कि विश्‍वासी,

और सत्य के पहचानने वाले, धन्यवाद के साथ खाएँ।

० परमेश्‍वर के आत्मा ने भविष्य को प्रगट किया।👉 यशा. 46:10. परमेश्‍वर जानते थे कि झूठे उपदेशक और शिक्षक उठ खड़े होंगे, इसलिए बाईबल में बहुत स्थान पर उन्हों ने चेतावनी दी थी।

झूठे शिक्षक खुले रीति से और ईमानदारी से सामने नहीं आते हैं। वे चोरों की तरह आ जाते हैं। सत्य के साथ झूठ मिलाकर वे इसे और अधिक धोखा देने वाली बना देते हैं।

देह के उस जीवन के बारे में है जो आत्मिक जीवन के बिलकुल उल्टा है । कुछ लोग इसी ईश्‍वर (देह की इच्छाओं से चलना) की उपासना करते हैं।

वे झूठ बोलने, धोखा देने और चुराने में पीछे नहीं हटते। वे कहते तो हैं, कि मसीह के पैरोकार हैं, लेकिन अपनी अभिलाषाओं के हिसाब से जीते हैं –

वे हमेशा अपने पेट को भरना चाहते हैं, परमेश्‍वर की आत्मा से भरपूरी का उन्हें कोई लेना देना नहीं।

5.13.  रोमि 16:18👇

इसलिए कि ऐसे लोग हमारे मसीह यीशु की सेवा नहीं करते हैं, लेकिन अपने पेट की। वे अपनी चापलूसी और मीठी बातों से सीधे लोगों को धोखा देते हैं।

० झूठे पास्टर  परमेश्‍वर की सही शिक्षा के विरोध में सिखा रहे हैं, तो यह सच है कि वे मसीह के सच्चे सेवक नहीं हो सकते हैं

वे अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए कर रहे हैं (वे शैतान की ओर से हैं ) । वे भीतर से दुष्टात्मा के समान हैं बाहर से मीठी-मीठी बातें करते हैं।

5.14.  यहूदा 1:13👇

ये समुद्र की तेज़ लहरें हैं, जो अपनी बेशर्मी का झाग उछालते हैं। ये डावाँडोल तारे  हैं, जिनके लिए सदा का गहरा अन्धेरा  ठहराया गया है।

5.15.  फ़िलिप्पि. 3:18-19👇

बहुत से लोग मसीह के क्रूस के दुश्मन की तरह जीवन जी रहे हैं। अक्सर मैंने उनके बारे में तुम्हें बताया है और अभी रोते हुए कहता हूँ।

उनका अन्त बर्बादी है। उनका ईश्‍वर उनका पेट है। अपनी शर्मनाक✽ बातों पर उन्हें घमण्ड है। उनका सारा ध्यान दुनिया की बातों पर लगा हुआ है।

० पौलुस रोता था। क्योंकि बहुत से लोग जो यह दावा करते थे कि उनके विश्‍वास मसीह में है, वे अपने कर्मों द्वारा सिद्ध कर देते थे कि वे मसीह के शत्रु हैं।

ऐसा लगता है कि जब भी एक स्थानीय कलीसिया शुरू होती थी, क्रूस के ऐसे दुश्मन जल्द ही उजागर हो जाते थे । वे धार्मिकता तो दिखाते थे परन्तु उसकी सामर्थ का इन्कार करते थे।

5.16.  1 तीम. 3:5👇

5) जब कोई अपने ही घर का प्रबन्ध करना न जानता हो, तो परमेश्‍वर की कलीसिया (चर्च) की देखभाल कैसे करेगा?

5.17.  मत्ती 7:15👇

झूठे भविष्यद्वक्‍ताओं से सचेत रहो, जो हैं तो फाड़ खाने वाले भेड़िए, लेकिन भेड़ों के वेष में तुम्हारे पास आते हैं।

5.18.  मत्ती 24:4-5👇

यीशु ने उत्तर में कहा, “सावधान रहो कि तुम्हें कोई धोखा न देने पाए।

मेरे नाम से बहुत लोग आकर यह कह कर भरमाएँगे कि मैं मसीह हूँ।

5.19. मत्ती 24:24👇

क्योंकि झूठे मसीह और झूठे भविष्यद्वक्‍ता उठ खड़े होकर बड़े चमत्कार और चिन्ह दिखाएँगे, ताकि अगर संभव हो तो चुने हुओं को बहका दें।

5.20.  प्रे.काम 20:29-30👇

इसलिए कि मैं यह जानता हूँ कि मेरे जाने के बाद फाड़ खाने वाले भेड़िए तुम्हारे बीच आएँगे और झुण्ड को छोड़ेंगे नहीं।

साथ ही तुम्हारे बीच ही से लोग उठ खड़े होंगे और शिष्यों को अपनी तरफ़ खींच लेने के लिए झूठी बातें बोलेंगे।

5.21.  रोमि 16:16-17👇

16) आदर के साथ एक दूसरे को अपना प्यार दिखाओ। यीशु मसीह के सभी चर्च तुम्हें आशीर्वाद देते हैं।

17) हे भाइयो-बहनो, मैं तुम से बिनती करता हूँ कि जो लोग तुम्हारे बीच दी गयी शिक्षा के विपरीत फूट और सेवा में रुकावट डालते हैं, उन्हें पहचानो और उन से दूर रहो।

5.22.  2 कुरिन्थ. 11:13-15👇

13) इसलिए कि ऐसे लोग झूठे प्रेरित, धोखेबाज़ कार्यकर्ता हैं, जो मसीह के प्रेरितों का रूप धारण करते हैं। 14) इस में कोई आश्चर्य नहीं क्योंकि शैतान खुद ज्योतिर्मय स्वर्गदूत का सा रूप ले लेता है।

15) इसलिए इस में कोई बड़ी बात नहीं कि उसके (शैतान के) सेवक मसीह के सेवकों का रूप धारण करें। अन्‍त में उन्हें उनके बुरे कामों की सज़ा जो मिलनी चाहिए, ज़रूर मिलेगी।

5.23.  2 तीम. 4:3👇

एक समय आएगा, जब लोग सही शिक्षा को न सह सकेंगे, किन्तु अपनी पसन्द की बातों को सुनने और उन से सन्तुष्टि पाने के लिए ढेर सारे शिक्षकों को बटोर लेंगे।

5.24.  2 पतर. 2:1👇

जैसे उनके बीच में झूठे भविष्यद्वक्‍ता थे, वैसे ही तुम्हारे बीच में भी झूठे शिक्षक होंगे, जो बड़ी चालाकी से पाखण्‍ड की बातें पेश करने के

साथ-साथ उस परमेश्‍वर का इन्कार करेंगे जिन्होंने विश्‍वासियों को मोल लिया है। इस कारणवश वे अपने ऊपर बहुत जल्दी बर्बादी को लाएँगे।

5.25.  2 पतर. 2:2👇

बहुत से लोग उन की नुकसान पहुँचाने वाले चालचलन को अपना लेंगे और उनकी वजह से सच्चाई के रास्ते की बदनामी की जाएगी।

5.26.  यहूदा 1:4👇

क्योंकि तमाम लोग जो इस गुनाह के पहले ही से दोषी ठहराए जा चुके हैं, चुपके से हमारे बीच घुस गए हैं।

वे दुष्ट हैं और परमेश्‍वर की कृपा को, अनियन्‍त्रित वासना में बदल चुके हैं। वे हमारे एक मात्र मालिक परमेश्‍वर और प्रभु यीशु मसीह का इन्कार करते हैं।

० यहाँ यहूदा ने एक खतरा देखा। मसीहियों में एक भयानक गलत शिक्षा फैल रही थी। वह यह थीः इसलिए कि परमेश्‍वर के अनुग्रह से उद्धार मिलता है

इसलिए कि उद्धार पूरी तरह से परमेश्‍वर का कार्य है और अच्छे कामों पर निर्भर नहीं है, मसीही लोग जैसा चाहें, जी सकते हैं।

चाहे वे कुछ क्यों न करें, कैसे भी जीएँ, अनुग्रह उन्हें क्षमा करेगा। आज भी यह गलत शिक्षा प्रचलित है। वे मसीही और यीशु के शिष्य होने का दावा करते थे, किन्तु उनका जीवन बिल्कुल भिन्न था।

अनुग्रह को अनियन्‍त्रित अभिलाषा में बदल डालते हैं – ऐसा लगता है कि कुरिन्थ में मसीही होने का दावा करने वालों का विचार ऐसा ही था।

इन्कार, कार्य और शब्द दोनों ही से होता है। इन लोगों ने अपने ऊपर मसीह की प्रभुता से इन्कार किया, किन्तु शायद उन्हों ने कहा होगा कि वे उसे प्रभु मानते हैं।

० सारे अधिकार का स्वामी। यह नाम परमेश्‍वर को दिया गया है। इसलिए कि मसीह ही मात्र सार्वभौमिक हैं, इसका अर्थ है मसीह परमेश्‍वर हैं, जैसा कि इस पद का आखिरी भाग बताता है।

दुनिया के बनाने वाले परमेश्वर को छोड़ कर कोई हमारा मालिक नहीं है । इसका प्रमाण हम यहां पाते हैं 👇

5.27.  यूहन्ना 1:1-3👇

1) आदि में वचन था, और वचन परमेश्‍वर के साथ था, और वचन परमेश्‍वर था ।

2) यही आदि में परमेश्‍वर के साथ था।

3) सब कुछ उसी के द्वारा उत्पन्न हुआ। जो कुछ उत्पन्न हुआ है, उसमें से कोई भी वस्तु उसके बिना उत्पन्न न हुई।

5.28.  गलाति. 2:4👇

4) यह उन झूठे भाइयों के कारण हुआ जिन्हें गुप्त तरीके से लाया गया था। वे मसीह यीशु में जो हमारी आज़ादी थी, उससे हमें हटाने के लिए, लुके-छुपे जासूसी कर रहे थे।

5.29.  फ़िलिप्पि. 3:19👇

उनका अन्त बर्बादी  है। उनका ईश्‍वर उनका पेट है। अपनी शर्मनाक बातों पर उन्हें घमण्ड है। उनका सारा ध्यान दुनिया की बातों पर लगा हुआ है।

5.30.  2 तीम. 4:1-5👇

1) परमेश्‍वर, और यीशु मसीह जो दोबारा आकर मरे हुओं और जीवित लोगों का इन्साफ़ करेंगे और राज्य करेंगे, उनकी मौजूदगी में तुम्हें मैं यह आदेश देता हूँ,

2) परमेश्‍वर का संदेश (वचन) सुनाओ , हर समय तैयार रहो। गलतियों का मुकाबला करो, लोगों को डाँटो , धीरज के साथ सिखाओ ताकि लोगों की हिम्मत बढ़े ।

3) एक समय आएगा, जब लोग सही शिक्षा को न सह सकेंगे, किन्तु अपनी पसन्द की बातों को सुनने और उन से सन्तुष्टि पाने के लिए ढेर सारे शिक्षकों को बटोर लेंगे।

4) अपने कानों को सत्य से हटा कर वे अपना ध्यान खोखली कहानियों पर लगाएँगे।

5) तुम सब बातों में सचेत रहो, दुख उठाओ , दूसरों तक सुसमाचार पहुँचाने का काम करते हुए अपनी सेवा को पूरा करो।

० पौलुस गंभीरता से कहता है। कुछ महत्वपूर्ण बातों के बारे में वह सिखा रहा है। यीशु मसीह के दोबारा आने पौलुस का अर्थ उस संपूर्ण जीवन से है

जिसे प्रभु ने शिष्यों के लिए नियुक्‍त किया है। निश्चित रीति से उसी आज्ञा को पकड़े रहना है ।

5.31.  1 तीम. 6:14👇

कि तुम हमारे स्वामी यीशु मसीह के आने तक इस आज्ञा को निष्कलंक और निर्दोष रखो।

5.32.  तीतुस 1:6-16👇

अगुवों (प्राचीनों) को बिना किसी आरोप का और एक पत्नी का पति और संयमी होना चाहिए। इन के बच्चों को मुक्‍ति का अनुभव भी होना चाहिए।

किसी भी रखवाले (अध्यक्ष) को परमेश्‍वर का भण्डारी होने की वजह से निर्दोष होना चाहिए। ज़िद्दी, गुस्सैल, शराबी, झगड़ालू, पैसों का लोभी नहीं होना चाहिए।

8) और आवभगत करने वाला भलाई और अच्छाई का चाहने वाला, सही सोच वाला, खरा, पवित्र और संयमी भी।

9) उसे विश्‍वसनीय वचन को थामे रहना चाहिए जैसा उसे सिखाया गया है, ताकि सही सिद्धान्त की मदद से, वह लोगों को सिखा सके, और वचन के विरोध में बहस करने वालों को यकीन दिला सके।

10) ‍बहुत से अनियन्‍त्रित लोग बहस करने वाले और धोखा देने वाले हैं, खासकर खतना वाले लोगों में से।

11) इन के मुँह बन्द किये जाने चाहिए। ये लोग अपने फ़ायदे के लिए वह सब सिखाते हैं, जो सिखाना नहीं चाहिए और पूरे के पूरे खानदान बर्बाद कर डालते हैं।

12) उन्हीं में से उनके एक भविष्यद्वक्ता ने कहा, “क्रेती लोग हमेशा से झूठे, दुष्ट पशु, आलसी और पेटू होते हैं।”

13) यह बात सच है। इसलिए उन्हें अच्छी तरह से डाँटो, ताकि वे अपने विश्‍वास में मज़बूत रहें।

14) यहूदी कथा-कहानियों और उन मनुष्यों की आज्ञाओं पर ध्यान न दें, जो सच्चाई से भटक चुके हैं।

15) जो लोग शुद्ध हैं, उनके लिए सब कुछ शुद्ध है, लेकिन जो अशुद्ध और अविश्‍वासी हैं, उनके लिए कुछ भी शुद्ध नहीं है। उनकी बुद्धि और विवेक दोनों ही अशुद्ध हैं।

16) वे तो मुँह से परमेश्‍वर को जानने का दावा करते हैं लेकिन उनके कामों को देखकर ऐसा नहीं लगता है।

वे घिनौने, आज्ञा न मानने वाले और अच्छे कामों के लायक ही नहीं हैं।

० बहुत से धार्मिक लोग जो भीतर से भ्रष्ट हैं बाहरी नियमों और रीतियों और शुद्ध अशुद्ध खाने के बारे में बहुत बोलते हैं।

👉मत्ती 23:25-28. पौलुस कहता है कि ऐसे लोगों के लिए कुछ भी पवित्र या शुद्ध नहीं है। जो लोग यीशु का इन्कार करते हैं वे जो कुछ भी छूएँगे, अशुद्ध हो जाएगा।

👉लूका 11:41 लेकिन जो भीतर का (लोभ और दुष्टता) है उसे दान में दे दो, तो तुम्हारे लिए सब कुछ शुद्ध हो जाएगा।

० उन्हें भीतरी लालच और दुष्टात्मा से आज़ादी की ज़रूरत थी। इस से वे गरीबों को मदद कर सकेंगे। यही बात यीशु धनी, नवजवान अधिकारी से कहना चाह रहे थे👉

(मत्ती 19:21-24)। जिन लोगों के मन बदल चुके हैं वे बाहरी रीति विधियों की परवाह नहीं करेंगे।

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Amit kujur: नमस्ते दोस्तों मेरा नाम Amit Kujur हे ,में इंडिया के Odisha States के रहने वाला हूँ | आछा लगता हे जब इन्टरनेट के मदत से कुछ सीखते हैं और उसे website/blog के जरिये आपही जसे दोस्तों के बिच शेयर करना आछा लगता हे और मुझे भी सिखने को बोहुत कुछ मिलता हे | इसी passion को लेकर sikhnaasanhe.com website नाम का ब्लॉग बनाएं जहा हिंदी भाषा के आसान सब्दों में हार तरह के technology और skills related आर्टिकल जरिये मेरा जितना जो experience और knowledge हे शेयर करता हूँ |
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