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Satab kya hai ?

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Satab kya hai ?

आज मैंने एक साथ कुछ उत्साहजनक और चुनौतीपूर्ण छंदों को लाने का फैसला किया,

जिनके बारे में हमें सताव, क्लेश ,कष्टों समय के बीच कैसे और कहाँ ताकत मिलनी चाहिए।

मुझे आशा है कि आप इनमें से कुछ सुधार या राहद पा सकते हैं : 👇

क्या आपको पूरा आराम चाहिए जो केवल यीशु मसीह को जानने से आता है ? आज से अपना जीवन शुरू करें :

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सताव में भी  हम प्रभु की सी चाल कैसे चल सकते हैं ?👇(Satab me bhi hum apne Prabhu ki si chal kese chal sakte hein ?)

2 कुरिन्थ. 4:8-9👇

8 हम सभी ओर से सताव सह रहे हैं, लेकिन पिस नहीं गए। उलझन में तो पड़ते हैं, लेकिन निराश नहीं होते।

9 हमें सताया तो जाता है, लेकिन त्यागे नहीं जाते। गिराए तो जाते हैं, लेकिन मिट नहीं जाते।इन दिनों सुर्खियों में रहने वाली बहुत सारी परेशान करने वाली चीजें हैं,

अपने सिर को उनके चारों ओर लपेटना मुश्किल हो सकता है। पागलपन कब खत्म होगा । जो लोग बाइबल के समय में रहते थे, वे अत्याचार के लिए अजनबी नहीं थे।

लेकिन कई लोग भगवान के चरित्र से भी अच्छी तरह परिचित थे – एक प्यार करने वाला, अपने लोगों को सांत्वना देने के लिए पिता की रक्षा करने वाला।

फिर उन्होंने उन्हें दिलासा दिया और अब हमें दिलासा देते हैं। पवित्रशास्त्र के इन अंशों को भिगोने के लिए कुछ क्षण निकालें और उन्हें आने वाले दिनों में चलते रहने दें।

  • पौलुस इन “मिट्टी के बर्तनों” – की कमज़ोरी को दिखाता है जो “खतरे में”, “सताव में” से होकर जाते हैं। लेकिन वह कार्य करने वाली परमेश्‍वर की सामर्थ को भी दिखाता है।

यदि परमेश्‍वर की सामर्थ इन मिट्टी के बर्तनों में कार्यरत नहीं थी, तो वे कुछ बड़ा कार्य नहीं कर सकते थे। वे तो नाश भी हो सकते थे।

  • इस बात से उन्हों ने सुसंदेश से अपना मुँह नहीं मोड़ा। परमेश्‍वर ने जिन्हें चुना है वे लोग अपने मार्ग से कभी नहीं भटकेंगे।

जो लोग सुसंदेश पर विश्‍वास करते हैं, उन्हीं के जीवन में परमेश्‍वर का आत्मा आनन्द उत्पन्न कर सकता है। “हमारी…चाल”– मसीही अगुवों को ऐसे जीना चाहिए कि सभी सावधानी से उनका अनुकरण करें।

  • “जवानी”– इफ़िसुस की मण्डली में दूसरे लोगों की तुलना में तीमु. कम उम्र का रहा होगा। लेकिन परमेश्‍वर ने उसे उस पद पर रखा ताकि अधिकार के साथ वे सच वचन दे

और किसी को भी मौका न दे कि कम उम्र का होने के कारण तुच्छ ठहराया जाए। पौलुस मसीही जीवन के लिये बातों की सूची देता है।

यह संभव नहीं कि इन में से किसी एक को निकाल दिया जाए और फिर भी उस प्रकार का जीवन रहे। दुख की बात यह है कि कुछ प्रचारक एक या दो में रुचि दिखाते हैं, किंतु दूसरों की अनदेखी करते हैं।

प्रत्येक मसीही अगुवे को आदर्श होना चाहिये👉 (1 पतर. 5:3; 1 कुरि. 11:1; फ़िलि. 3:17; 1 थिस्स. 3:7)। यदि वह एक अच्छा नमूना नहीं है, तो उसे अगुवा नहीं बनना चाहिये।

  • कष्टों और सताव में भी जब एक इंसान अपने विश्‍वास की परीक्षा में सफ़ल हो गया और इसलिए सिद्ध कर दिया कि वह सच्चा विश्‍वाशी है 👉(1 पतर. 1:6-7)।

“जीवन के मुकुट” के बारे में हैं। यह फिर उन्हीं के लिए है जो ईमानदारी और धीरज से परीक्षाओं में खरे उतरेंगे। दूसरे शब्दों में जिनके पास सच्चा विश्‍वास है, वे अपने धीरज से अपने विश्‍वास का सबूत देते हैं।

  • राजाओं के मुकुट की बात नहीं कर रहा है। यह एक पत्तियों से बनी माला हुआ करती थी, जो उन दिनों प्रतियोगिता में जीतने वालों को दी जाती थी।

अपनी दौड़ के अन्त में पौलुस उसी की प्रतीक्षा में था। 👉1 कुरि. 9:25 से तुलना करें। धार्मिकता के मुकुट का अर्थ है, एक मुकुट जो खरे जीवन जीने से मिलता हैं।

अधार्मिकता के विरोध में लड़ने, अच्छी दौड़ दौड़ने और खरे विश्‍वास को बनाए रखने से यह मिलता है। मुकुट के सम्बन्ध में ऊपर दिए पदों को देखें।

समस्याओं के बीच प्रेम ही लोगों को बने रहने के लिए प्रेरित करता है।👉 (1 कुरि. 13:6) यह बना रहना ही प्रेम का सबूत है।

  • प्रभु का प्रेम कमज़ोर, दिखावटी और गलत बातों के प्रति भावनाहीन नहीं होता है। यह बुराई से समझौता नहीं करता है।

दुष्टता को देखकर यह मुस्कुराता नहीं है। बुराई को देखकर खुश न होने का मतलब हुआ हर बुराई पर दुख मनाना। जब सत्य की जीत होती है तब बहुत आनन्दित होता है।

प्रेम और सत्य गहरे दोस्त हैं। यहाँ सत्य को दुष्टता के विरोध में रखा गया है। दुष्टता का मतलब है अंधकार, झूठ, धोखा, और परमेश्‍वर के सत्य को दबा देना

(यूहन्ना 3:19-20; रोमि. 1:18; 2 थिस्स. 2:10, 12)। पौलुस यहाँ जिस सत्य की बात करता है उसका सम्बंध प्रकाश, सच्चाई और परमेश्‍वर से है।

यह वह सत्य है जिसका मसीह में साक्षात् दर्शन होता है 👉(यूहन्ना 14:6)। यदि हम इस सत्य में आनन्दित नहीं होते हैं तो हमें बेकार में यह कल्पना नहीं करना चाहिये,

कि जिस प्रेम की बात पौलुस करता है, वह हमारे पास है। इसके बगैर, हम हैं क्या?

  • चिंता करना छोड़ दो: यहाँ यूनानी क्रिया जिस काल में लिखी है उससे पता चलता है कि एक व्यक्‍ति जो कर रहा है उसे रोकने की आज्ञा दी गयी है।

“चिंता” के लिए जो यूनानी शब्द है उसका मतलब ऐसी चिंता हो सकता है जिसकी वजह से एक इंसान एक बात पर ध्यान नहीं दे पाता बल्कि कई बातों के बारे में सोचता रहता है और उसकी खुशी छिन जाती है।

  • यहाँ मसीह के प्यार का अर्थ है विश्‍वासियों के लिए उनका प्रेम न कि उनका मसीह के लिए। क्या दुष्टता के कारण मसीह का विश्‍वासियों के लिए प्रेम समाप्त हो जाता है?

उनका प्रेम कभी समाप्त नहीं होता। यह सदा का है (यिर्म. 31:3)। इस पृथ्वी पर उनके आने से पहले यह शुरू हुआ और सदा तक रहेगा।

पहले ही से वह उनके अपराध और गंदगी को जानते थे और उन्हों ने उनको अपने प्रेम का लक्ष्य बनाया। मसीह का प्रेम ज्ञान से परे है

(इफ़ि. 3:19) (यह सब रूकावटों को लाँघकर अन्त में लोगों को उनकी प्रिय उपस्थिति में लाता है (श्रेष्ठ. 8:6-7 से तुलना करें)।

  • यहाँ पौलुस समस्याओं और खतरों की बात क्यों करता है? इसलिए कि सभी के जीवन में यह आम बात है (यूहन्ना 16:33; प्रे.काम 14:22 आदि)।

विश्‍वासियों पर जीत हासिल करने के लिए शैतान उन्हें इस्तेमाल करता है। वह उनके भीतर यह विचार डाल सकता है कि यीशु उन से प्रेम करते हैं या नहीं।

ऐसे स्थिति में वे बुराई में गिर कर कुछ समय के लिए सन्देह में पड़े रह सकते हैं। क्या ऐसा होने पर मसीह उन्हें छोड़ देंगे?

क्या उनका प्रेम समाप्त हो जाएगा? नहीं, कभी नहीं, जीवन के सभी मुश्किल अनुभवों के बाद वे सुरक्षित पहुँचेंगे।

  • “क्लेश”– वह स्पष्ट रीति से उन से कहते हैं कि शिष्यता का जीवन इस संसार में आराम और मज़े का नहीं है। मसीह ने यह कभी नहीं कहा कि विश्‍वासी क्लेश और संकट से बच जाएँगे।

उन्होंने उन्हें उनके लिये सताव एवं मौत के बारे में चेतावनी दी थी। उनके विश्‍वासयोग्य सेवकों को इस बात में उनकी पैरवी करनी चाहिये और उसी सत्य का संदेश देना चाहिये, जैसा उन्हों ने दिया था।

प्रे.काम 14:22 और 1 थिस्स. 3:3-4 से तुलना करें।

  • यीशु और उनके भेजे गए संदेशवाहकों ने यह बतला दिया था कि इस दुनिया में यीशु के लोगों को तकलीफ़ होगी।

यीशु ने यह भी बताया कि हम लोगों का रवैया कैसा होना चाहिए (मत्ती 5:10-12; 1 पतर. 4:13)। जब यीशु की वजह से हमें क्लेश दिया जाता है, यह सवाल नहीं पूछना चाहिए क्यों ऐसा हो रहा है?

इसके उल्टा जब सताव नहीं होता हैं हमें पूछना चाहिये कि ऐसा क्यों नहीं हो रहा है। यहाँ पौलुस कुछ इस तरह से कहता है,

जैसे कि परमेश्‍वर का शासन आने वाले समय में होगा- उसका मतलब है कि जब शासन पूरी शान के साथ सब के सामने आता है। मत्ती 4:17 ।

  • राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक, रंग, जाति, गलती, जोश के आने के कारण नहीं। सही चालचलन की वजह से,

सताव से परमेश्‍वर के बच्चों और दूसरों में अन्तर दिखता है (यूहन्ना 15:20-21; 2 तीमु. 3:12; 1 पतर. 4:14-16)। लोग इसलिए आशीषित हैं क्योंकि वे परमेश्‍वर की तरफ़ होने से खुशी की दशा में हैं।

परमेश्‍वर की सच्चाई के लिए खड़े होने और उनके लिए दुख उठाने और मरने के लिए तैयार हैं। यही तो आशीषित स्थिति है।

ऐसे लोगों को क्लेश सहना पड़ता है क्योंकि दुनिया बुरी इच्छाओं, घमण्ड और सच के लिए नफ़रत से भरी है।

  • ध्यान दें कि उन्हों ने निष्कलंक यीशु को भी सताया और मार डाला । यीशु के शिष्य मेल करवाने वाले थे, लेकिन तुच्छ ठहराए गए, मारे गए, पत्थरवाह किए गए, जेल में डाले और मार डाले गए ।

फिर भी वे पृथ्वी पर आशीषित थे और परमेश्‍वर के राज्य के हिस्सेदार। उनकी पीड़ा कुछ समय के लिए और सुख हमेशा का था।

  • गलत बात (असत्य) का सामना जब पढ़े लिखे धार्मिक लोग करते हैं, वे किसी भी दूसरे इन्सान की तरह उद्दण्डी और हिंसात्मक रवैया अपनाते हैं।

जिस यीशु से ये लोग नफ़रत करते थे उनके सम्मान में कहे गए शब्दों को ये लोग सह नहीं पा रहे थे (यूहन्ना 15:18-25)।

इसलिए जिन बातों को उन्हें सुनकर विश्‍वास करना चाहिए था, उन्हों ने सुनना मंजूर नहीं किया।

  • ऐसा विश्‍वास किया जाता है कि पौलुस सात बार जेल में डाला गया था। यहूदी कानून के अनुसार कोड़े को 40 से अधिक बार नहीं मारा जाता था।

व्यव. 25:1-3.

साधारणतया यहूदी 39 कोड़े मारा करते थे – वे इस बात से डरते थे कि कहीं गलती से 40 के बजाए

41 न हो जाएं और व्यवस्था का उल्लंघन हो जाए, इसलिए

39 बार ही मारा करते थे। ये कोड़े मारा जाना बहुत गंभीर हुआ करता था और कभी-कभी लोग इस से मर भी जाया करते थे।

मसीह के लिए किसी व्यक्‍ति का प्रेम इस से नापा जाता था, कि वह कितना दुःख उठाने के लिए तैयार है । “जहाज़ टूट गए”- (प्रे.काम 27:27-44) में एक का वर्णन है।

बहुत से वे दुःख, परेशानी, जिसमें से होकर पौलुस गया, उनका वर्णन बाईबल में नहीं हैं।

  • “जोखिमों में”– मसीह के लिए एक व्यक्‍ति क्या सहने के लिए तैयार है, उस से उसके मसीह के लिए प्रेम को मापा जा सकता है। कुरिन्थ में झूठे शिक्षक घमण्ड की बातें कह सकते थे।

उन्हों ने क्या-क्या सहा था? मसीह के लिए वे कौन-कौन से खतरे झेलने के लिए तैयार थे?

  • पौलुस स्वयं के लिए आदर और प्रशंसा नहीं चाह रहा था। वह इस प्रकार इसलिए कहता है क्योंकि वह जानता था कि जग के स्वामी ने उसे विश्‍वासियों

और मसीह सेवकों के लिए एक नमूना बनाया ताकि वे और तीमुथियुस उसके समान जीवन जिएं (पद 14; 1 कुरि. 11:1; फ़िलि. 3:17; 2 थिस्स. 3:7; प्रे.काम 20:18-35)

  • “मसीह के”- सताव, एक स्थान का दूसरे स्थान से एक समय का दूसरे समय से, भिन्न हो सकता है। कभी-कभी शारीरिक दुःख

और कभी-कभी तुच्छ ठहराया जाना एक दूसरे के बीच पक्षपात करने के रूप में हो सकता है। सभी विश्‍वासी कभी न कभी किसी रूप में इसका सामना करेंगे।

सताव के आयतें :👇(Satab ke ayete)

मत्ती 5:10-12

10 आशीषित वे हैं जो अपने खरेपन की वजह से सताए जाते हैं, क्योंकि स्वर्ग का राज्य उन्हीं का है।

11 आशीषित हो तुम जब लोग मेरे नाम की खातिर तुम्हें तुच्छ समझें, सताएँ और झूठ बोल-बोलकर तुम्हारे खिलाफ़ (विरोध) सब तरह की गंदी बातें कहें।

12 खुश और मगन होना, क्योंकि तुम्हारे लिए स्वर्ग में बड़ा ईनाम (फल) हैः इसलिए कि उन्हों ने तुम से पहले आए नबियों को भी सताया था।

प्रे.काम 16:22-24

22 भीड़ उनके खिलाफ़ उठ खड़ी हुयी और मजिस्ट्रेट ने उनके कपड़े फाड़े और उनकी पिटाई की।

23 ✽जब वे उन पर खूब बेतें लगा चुके, तब उन्हें जेल में डाल दिया और जेलर को हुक्म दिया कि उनकी रक्षा की जाए।

24 ऐसा हुक्म पाकर उसने उन्हें भीतरी कोठरी में डाल दिया और उनके पैरों को लकड़ी  में जड़ दिया।

प्रे.काम 14:19

19 अन्ताकिया और इकुनियुम से आए हुए यहूदियों ने लोगों को अपनी तरफ़ कर लिया। पौलुस को पत्थरवाह करने के बाद वे उसे मरा हुआ समझकर खींचते हुए शहर के बाहर तक ले गए।

2 कुरिन्थ. 11:23-26

23 क्या वे मसीह के सेवक हैं? – मैं पागल की तरह कह रहा हूँ। मैं उन से बढ़कर हूँ। ज़्यादा मेहनत करने में , बार-बार जेल जाने में , कोड़े खाने में, बार-बार मौत के जोखिमों में

24 यहूदियों द्वारा मैंने पाँच बार उन्तालीस, उन्तालीस कोड़े खाए।

25 मुझ पर तीन बार डंडे पड़े, मुझ पर एक बार पथराव किया गया , तीन बार जहाज़ टूट गए थे, एक रात मैंने समुद्र में बितायी।

26 बार-बार यात्रा में, नदियों के जोखिमों में , डाकुओं के जोखिमों में, अपनी जाति वालों से जोखिमों में, अन्य जातियों से जोखिमों में, शहर के खतरों में, जंगल के खतरों में, समुन्दर के खतरों में, झूठे भाइयों से खतरों में।

यूहन्ना 16:33

33 मैंने ये बातें तुम से इसलिए कही हैं कि तुम्हें मुझ में शान्ति मिले। दुनिया में तुम्हें क्लेश होता है, परन्तु धीरज रखो , मैंने दुनिया को जीत लिया है।”

प्रे.काम 14:22

22 शिष्यों की हिम्मत बढ़ाने और उन्हें विश्‍वास में बने रहने के साथ सिखाया, “बड़ी समस्याओं (क्लेशों) में से होकर हमें परमेश्‍वर के राज्य में दुनिया को छोड़ने के बाद दाखिल होना है।”

1 थिस्स. 1:6

6) तुम बड़े सताव में पवित्र आत्मा के आनन्द के साथ वचन को मानकर हमारी और प्रभु की सी चाल चलने लगे।

प्रे.काम 3:12-15

12 पतरस ने यह सब देखकर लोगों से कहा, “हे इस्त्राएलियो, तुम अचम्भा क्यों कर रहे हो? या हमारी तरफ़ टकटकी लगाकर क्यों देख रहे हो,

जैसे कि हम ने अपनी ताकत या अच्छाई की वजह से इस व्यक्‍ति को चलने के लायक बना दिया है?

13 अब्राहम, इसहाक और याकूब के परमेश्‍वर, हमारे पुरखों के परमेश्‍वर ने अपने बेटे को इज़्ज़त (महिमा) दी है।

तुम ने उन्हें उस समय पिलातुस के हवाले किया और उनका इन्कार किया , जब वह उन्हें छोड़ देना चाहता था।

14 लेकिन तुम ने उस पवित्र और सज्जन व्यक्‍ति को चाहने के बजाए एक हत्यारे की आज़ादी की माँग की।

15 तुम ने जीवन के कर्ता को मार डाला, जिन्हें परमेश्‍वर ने मरे हुओं में से जिला दिया। इस सच्चाई के हम गवाह भी हैं।

प्रे.काम 7:57-58

57 तब वे अपने-अपने कान बन्द कर के ज़ोर से चिल्लाए और एक साथ मिलकर उस पर झपटे। 58 उसे शहर से बाहर घसीटते ले गए, और पत्थर से मारने लगे।

वहाँ पर शाऊल नामक एक व्यक्‍ति के पैरों के पास गवाहों ने अपने कपड़े रखे थे।

इब्रानि. 6:12

12) ताकि तुम आलसी न हो जाओ वरन् उनको नमूना बनाओे जो विश्‍वास और धीरज के द्वारा वायदों के वारिस होते हैं।👇 p`

  • “आलसी”- मत्ती 25:26; नीति. 18:9; 24:30-34. आत्मिक बातों में आलस्य विनाशकारी है, जैसा दूसरे क्षेत्रों में भी होता है।

2 तीम. 3:10-12

10 किन्तु तुम ने मेरी शिक्षा, लक्ष्य, विश्‍वास, धीरज, प्यार और सहनशीलता को देखा है।

11 अन्ताकिया, इकुनियुम और लुस्त्रा में मुझे किन-किन सताव और कठिनाईयों का सामना करना पड़ा? मैंने क्या-क्या न सहा ? लेकिन यीशु ने मुझे उन सब से छुड़ा लिया।

12 जो लोग यीशु मसीह के होने के कारण खरा जीवन जीना चाहते हैं, वे सताए जाएँगे।

1 तीम. 4:12

12) कोई तुम्हारी जवानी को तुच्छ न समझने पाए, लेकिन बातचीत, चाल-चलन, प्रेम, आत्मा में, विश्‍वास और पवित्रता में विश्‍वासियों के लिए नमूना बन जाओ।

1 थिस्स. 3:7

7) इसलिये हे भाइयो बहनो, हम ने अपने सारे कष्टों और सताव में तुम्हारे विश्‍वास से तुम्हारे विषय में शान्ति पाई।

प्रे.काम 12:1-4

1 उसी समय हेरोदेस राजा ने चर्च के कुछ लोगों को परेशान करने (सताने) के लिए अपने हाथ को बढ़ाया।

2 उसने यूहन्ना के भाई याकूब को तलवार से मरवा डाला।

3 क्योंकि उसके ऐसा करने से यहूदी खुश हुए, उसने पतरस के साथ भी यही करना चाहा। ये अखमीरी रोटी के दिन थे।

4 उसने उसे हिरासत में लेकर जेल में डाल दिया और सैनिकों के चार झुण्डों की पहरेदारी में रखा, ऐसा इसलिए ताकि फ़सह के त्यौहार के बाद उन्हें लोगों के सामने ले आए।

2 कुरिन्थ. 1:8-9

8 हे भाइयो, बहनो हम यह नहीं चाहते हैं कि तुम उस सताव के बारे में अनजान रहो, जो हम ने एशिया में सहा था। हमारे ऊपर ऐसा दबाव आ पड़ा था, जिसको सहना बहुत मुश्किल था।

हमें तो ऐसा लगा था कि हम ज़िन्दा ही नहीं बचेंगे।

9 हमें ऐसा लगता था कि हम पर मौत की आज्ञा हो चुकी थी, ताकि हम अपने ऊपर भरोसा न रखें, लेकिन केवल परमेश्‍वर पर जो मरे हुओं को ज़िन्दा करते हैं,

यीशु मसीह को अपना नमूना बनने पर हमे क्या हासिल होगा ? प्रभु यीशु मसीह हमें क्या देते हैं ?👇

हम ताकत कहाँ से पाते हैं ?(Hum takat kaha se pate hein ?)

व्यवस्थाविवरण 31:8

8 यहोवा खुद तेरे आगे चलेगा और तेरे साथ-साथ रहेगा। वह तेरा साथ कभी नहीं छोड़ेगा और न ही तुझे त्यागेगा। इसलिए तू डरना मत और न ही खौफ खाना।”

1 पतर. 5:4

4) जब प्रधान रखवाले का आना होगा, तुम्हें इतना शानदार ताज दिया जाएगा, जो कभी मुरझाता नहीं है।

2 तीम. 4:8

8) धार्मिकता का वह मुकुट मेरे और उन सब के लिए रखा है जिसे, सच्चे जज (न्यायी) यीशु मुझे देंगे और केवल मुझे ही नहीं बल्कि यीशु के आने की चाहत रखने वाले सभी लोगों को उस दिन देंगे।

भजन 62:6

6 वही मेरी चट्टान और मेरा उद्धार है, मेरा ऊँचा गढ़ है, मुझे कभी हिलाया नहीं जा सकता।

यशायाह 12:2

2 देखो, परमेश्‍वर मेरा उद्धारकर्ता है, मैं उस पर भरोसा रखूँगा और मुझे कोई डर नहीं सताएगा। याह यहोवा मेरी ताकत है, मेरा बल है, वही मेरा उद्धारकर्ता है।”

भजन 62:6

6 वही मेरी चट्टान और मेरा उद्धार है, मेरा ऊँचा गढ़ है, मुझे कभी हिलाया नहीं जा सकता।

यशायाह 12:2

2 देखो, परमेश्‍वर मेरा उद्धारकर्ता है, मैं उस पर भरोसा रखूँगा और मुझे कोई डर नहीं सताएगा। याह यहोवा मेरी ताकत है, मेरा बल है, वही मेरा उद्धारकर्ता है।”

नहूम 8:10

10 नहेमायाह ने उनसे कहा, “जाओ और जाकर चिकना-चिकना खाना खाओ और कुछ मीठा पीओ। और उन लोगों को खाने की चीज़ें भेजो जिनके पास खाने को कुछ नहीं है।

यह दिन हमारे प्रभु के लिए पवित्र है। दुखी मत हो क्योंकि जो खुशी यहोवा देता है वह तुम्हारे लिए एक मज़बूत गढ़ है।”

‍नीत 18:10

10 यहोवा का नाम एक मज़बूत मीनार है, जिसमें भागकर नेक जन हिफाज़त पाता है।

भजन 18:2

2 यहोवा मेरे लिए बड़ी चट्टान और मज़बूत गढ़ है, वही मेरा छुड़ानेवाला है। मेरा परमेश्‍वर मेरी चट्टान है जिसकी मैं पनाह लेता हूँ, वह मेरी ढाल और मेरा उद्धार का सींग है, मेरा ऊँचा गढ़ है।

भजन 91:14

14 परमेश्‍वर ने कहा है, “वह मुझसे गहरा लगाव रखता है, इसलिए मैं उसे बचाऊँगा। मैं उसकी रक्षा करूँगा क्योंकि वह मेरा नाम जानता है।

उत्पत्ति 15:1

1 इसके बाद अब्राम को एक दर्शन में यहोवा का यह संदेश मिला: “अब्राम, तुझे किसी बात से डरने की ज़रूरत नहीं। मैं तेरे लिए एक ढाल हूँ। मैं तुझे बहुत बड़ा इनाम दूँगा।”

2 शमूएल 22:2-4

2 दाऊद ने कहा, “यहोवा मेरे लिए बड़ी चट्टान और मज़बूत गढ़ है, वही मेरा छुड़ानेवाला है।

3 मेरा परमेश्‍वर मेरी चट्टान है जिसकी मैं पनाह लेता हूँ, वह मेरी ढाल और मेरा उद्धार का सींग है, मेरा ऊँचा गढ़ है, वह मेरे लिए ऐसी जगह है जहाँ मैं भागकर जा सकता हूँ, वह मेरा उद्धारकर्ता है।

तू ही मुझे ज़ुल्म से बचाता है।

4 मैं यहोवा को पुकारता हूँ जो तारीफ के काबिल है और मुझे दुश्‍मनों से बचाया जाएगा।

भजन 43:5

5 मेरे मन, तू क्यों इतना उदास है? तेरे अंदर यह तूफान क्यों मचा है? परमेश्‍वर का इंतज़ार कर, क्योंकि मैं उसकी तारीफ करता रहूँगा कि वह मेरा महान उद्धारकर्ता और मेरा परमेश्‍वर है।

1 पतरस 5:6, 7

6 इसलिए परमेश्‍वर के शक्‍तिशाली हाथ के नीचे खुद को नम्र करो ताकि वह सही वक्‍त पर तुम्हें ऊँचा करे।

7 और इस दौरान तुम अपनी सारी चिंताओं का बोझ उसी पर डाल दो क्योंकि उसे तुम्हारी परवाह है।

भजन 55:22

22 अपना सारा बोझ यहोवा पर डाल दे, वह तुझे सँभालेगा। वह नेक जन को कभी गिरने नहीं देगा।

मत्ती 6:25

25 इसलिए मैं तुमसे कहता हूँ, अपने जीवन के लिए चिंता करना छोड़ दो कि तुम क्या खाओगे या क्या पीओगे, न ही अपने शरीर के लिए चिंता करो कि तुम क्या पहनोगे।

क्या जीवन भोजन से और शरीर कपड़े से अनमोल नहीं?

इफिसियों 3:16

16 मैं प्रार्थना करता हूँ कि परमेश्‍वर जिसके पास अपार महिमा है अपनी पवित्र शक्‍ति से तुम्हें वह ताकत दे जिससे तुम्हारे अंदर का इंसान शक्‍तिशाली होता जाए।

उत्पति1:26

26 फिर परमेश्‍वर ने कहा, “आओ हम इंसान को अपनी छवि में, अपने जैसा बनाएँ। और वे समुंदर की मछलियों, आसमान के पंछियों,

पालतू जानवरों और ज़मीन पर रेंगनेवाले सभी जंतुओं पर और सारी धरती पर अधिकार रखें।”

रोमियों 8:35

35 कौन हमें मसीह के प्यार से अलग कर सकता है? क्या संकट या दुख या ज़ुल्म या भूख या नंगापन या खतरा या तलवार?

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Amit kujur: नमस्ते दोस्तों मेरा नाम Amit Kujur हे ,में इंडिया के Odisha States के रहने वाला हूँ | आछा लगता हे जब इन्टरनेट के मदत से कुछ सीखते हैं और उसे website/blog के जरिये आपही जसे दोस्तों के बिच शेयर करना आछा लगता हे और मुझे भी सिखने को बोहुत कुछ मिलता हे | इसी passion को लेकर sikhnaasanhe.com website नाम का ब्लॉग बनाएं जहा हिंदी भाषा के आसान सब्दों में हार तरह के technology और skills related आर्टिकल जरिये मेरा जितना जो experience और knowledge हे शेयर करता हूँ |

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