Advertisement

Prarthna kya hai aur kyun karte hein ?

Table of Contents

1.  Prarthna kya hai aur kyun karte hein ?

इफिसि. 3:20👇

20 अब जो ऐसे सामर्थी हैं कि हमारे जीवन में काम करने वाली शक्‍ति के द्वारा हमारे माँगने या सोचने से कहीं अधिक करने के योग्य हैं,

Advertisement
  • अद्भुत बातें हमारे लिए संभव हैं, निश्चित रीति से। अगर संभव नहीं होतीं तो परमेश्वर पिता हमारे सामने रखते ही नहीं ।

परमेश्‍वर ये हमारे जीवन में कर सकते हैं, हमारी कल्पना से बढ़कर भी। तो फिर सभी विश्‍वासियों का यह अनुभव क्यों नहीं है?

इसलिए कि परमेश्‍वर चाहते हैं कि हम इन्हें चाहें अपना समर्पण करें, सब बातों में उनकी मानें, भरोसा रखें और करते रहें।

यूहन्ना 14:21; रोमि. 12:1-2; यिर्म. 29:13; यशा. 57:15) प्रभु यीशु विश्‍वासियों और उसके और पिता के बीच के सम्बंध पर ज़ोर डाल रहे हैं।

यह प्रेम का एक सम्बंध है जो उनके द्वारा आज्ञाकारिता में प्रगट होता है और उनकी ओर से उनके स्पष्ट प्रकाशन के रूप में।

केवल वे लोग जो इसका अनुभव करते हैं, वे जानेंगे कि यह सम्बन्ध क्या है। परमेश्‍वर के पास उसके आज्ञाकारी प्रेमी बच्चों के लिये विशेष प्रेम है।

वह उन से असीमित, पूर्ण और अनन्तकाल का प्रेम करते है। हमारे प्रति उनके सभी विचार प्रेम के होते हैं।

  • हमारे प्रति उनके सभी काम सिद्ध प्रेम में किए गये हैं। यह प्रेम का एक पारिवारिक सम्बंध है, इस प्रेम को करने में आनन्द है।

परमेश्‍वर ने दुनिया से ऐसा प्रेम किया कि उसने अपना पुत्र भेजा और उन्होंन पास अपराध में खोए हुए लोगों के लिये बड़ी दया है।

जैसा वह अपने आज्ञाकारी लोगों को आशीष देते हैं, बलवा करने वालों को नहीं दे सकते।

  • उसे पढ़ने के बाद यदि वैसा न करें, जीवन न बदले, तो क्या फ़ायदा? सब से पहले हमें पूरी तरह से स्वयं को दे देना है।

पुराने समय में इस्राएल के पुरोहित पशुओं को वध कर के बलिदान चढ़ाते थे अब यीशु के बलिदान के बाद यीशु के लोग पुरोहित हैं

(प्रका. 1:6; 1 पतर. 2:5, 9; इब्रा. 13:15-16) अवश्य है कि वे अपनी देह को परमेश्‍वर की सेवा के लिए दें (रोमि 6:13, 19; 1 कुरि. 6:13, 19, 20)।

मात्र शब्दों को नहीं, किन्तु इस तरह की उपासना प्रभु को चाहिए। इस प्रकार का बलिदान “पवित्र” और स्वीकार योग्य है।

2.  प्रार्थना क्या करती है ? प्रार्थना होती क्या है ? 👇

  • बिली ग्राहम ने कहा है इससे पहले प्रार्थना दूसरों को बदले उससे पहले प्रार्थना तुम्हें बदलती है ।

मेरे भायाे बहनों आज प्रार्थना को टालोगे कल प्रार्थना को टालोगे परसों प्रार्थना को टालोगे में आपको सच कहता हूं आपको लगेगा सब कुछ ठीक है ;

सब अच्छा है कोई प्रोब्लेम नहीं है ; लेकिन आने वाले दिनों में आपको कोई एक बार डाटेंगा कोई एक बात सुनाएगा आप ऐसा गुस्सा कर बैठोगे की आप हैरान हो जाओगे के ये में था ।

और ये फल है उन लोगों का जिनका प्रार्थना में परमेश्वर के साथ कोई संबंध नहीं। कितने लोग हैं परमेश्वर पिता को ये कहते हैं पिता मुझे बदलदे मेरी घमंड को तोड दे।

पर आज के समय में लोग खुद को बदलने के बारे में नहीं पर उनकी परिस्थितियों को बदलने के बारे में प्रार्थनाएं करते हैं।

यीशु मसीह कहते हैं धन्य है वे जो मन के दिन है वे परमेश्वर को देखेंगे । अगर आप अपने मन की दिशा ही नहीं जानेंगे तो सुध क्या है केसे समझेंगे ।

परमेश्वर दाऊद के बारे में कहते हैं ये व्यक्ति मेरे मन के या दिल के अनुसार जीता है। दाऊद का दिल केसा था ?

एक आदमी दाऊद को परेशान करता रहा अन्त तक दाऊद के मुंह से उसके लिए एक बार भी बददुआ नहीं निकलता था उल्टा उस आदमी को आदर करता था ।

और प्रभु उन दिनों में से हम से नई वाचा बांध रहा है के  वो हमारे अंदर से पत्थर का दिल निकाल के मांस का हृदय देगा नये नियम के अंदर हम विश्वासियों से परमेश्वर ने प्रतिज्ञा की है के परमेश्वर दाऊद से दस गुना अच्छा हृदय देगा ।

परमेश्वर ने जो वादे किए थे क्यों उन दिनों में प्रेरीतो के पास जो दिल था और आज के कलीसिया के पास वो दिल नहीं है क्यों कि उन्होंने अपना प्रार्थना जीवन खो दिया है ।

प्रार्थना वे लोग नहीं करते ; जिन्हें परमेश्वर पिता से प्रेम नहीं है जिन्होंने ये याद नहीं रखा के यीशु ने उनके लिए  क्या किया है , वे कभी प्रार्थना नहीं करते ।

जो व्यक्ति यीशु से प्रेम करता है वो प्रार्थना भी करता है। बहुतों को religious यीशु दिखता है जो 2000 साल पहले उनके लिए मरा लेकिन यीशु का प्यार को नहीं पिया ।

सारे लोग यीशु मसीह के क्रॉस को जानते हैं लेकिन बहुत सारे कम लोग यीशु मसीह के गशमनी के प्रेम को जानते हैं

यीशु मसीह जब गश्मनी के बाग को गया तब क्या प्रार्थना की के पिता ये प्याला मुझ पर से हट जाए इसका क्या मतलब है इसका मतलब ये है

कि ये प्याला भी में पियुं और पिता के साथ सहभागिता भी ना टूटे पर जब जब यीशु आंखे बंद करके प्रार्थना करते थे तब तब संसार के सभी लोगों को  नरक में जलते पाया तब एक स्वर्ग दुत आता है

और कहता है यीशु आप बिलकुल सुद्ध और पवित्र हैं आप सीधे स्वर्ग जा सकते हैं पर परमेश्वर के बहुत सारे बच्चे नरक के आग में जल जाएंगे तब यीशु ने कहा ठीक है पिता में चला जाता हूं उनके लिए ।

जरा सोचिए यीशु ने हमसे केसे प्रेम किया है यहां तक हमारे लिए नरक तक जाने को राजी हो गया और हम प्रार्थना के जरिए यीशु से बात तक नहीं करते हैं ।

बाईबल किन के लिए बोरिंग है जो बाईबल को हिस्ट्री के तरह पढ़ते हैं।

3.  प्रार्थना की सामर्थ क्या है ? हमें प्रार्थना करने की जरूरत क्यों होती है ?👇

  • लूका 18:1👇

1 लोगों को यह सिखाने के लिए कि उन्हें कभी मायूस नहीं होना चाहिए, लेकिन परमेश्‍वर पिता से प्रार्थना करते रहना चाहिए,

  • बिनतियों के सम्बन्ध में “हताश नहीं होना चाहिए।” देखें लूका 11:3, 5-10; 1 थिस्स. 5:17; इफ़ि. 6:18. जब हमें हमारे निवेदन का जवाब वैसा नहीं मिलता है,

जैसा हम चाहते हैं, या उसमें देरी होती है, हम हताश होकर प्रार्थना करना बन्द कर सकते हैं।

अगर ऐसा हमारे मन में नहीं होता है तो भी शैतान हमारे भीतर वैसा ख्याल डालना चाहता है। हम ऐसे प्रलोभन में न फँस जाएँ।

प्रार्थना बन्द कर देने से हमारी ज़िन्दगी में हार आ सकती है और हमारे काम में असफ़लता। चाहे हमारे पास कैसी निराशा क्यों न आए हमें हिम्मत नहीं हारनी चाहिए।

चाहे पुरानी गलतियों की याद सताए, वर्तमान समय की भूल चूक भी हमारे भीतर हो। चाहे ऐसे ख्याल हों कि प्रार्थना करते रहने से कोई फ़ायदा नहीं।

चाहे हमारी परिस्थितियाँ, मानसिक दशा और आत्मिक संघर्ष कैसा भी क्यों न हो, प्रार्थना छोड़ देना गलती है और बुराई की तरफ़ ले जाती है।

इसी से जीवन में निराशा और आत्मिक बर्बादी आती है।

  • लूका 11:5-10👇

5 तब यीशु ने उन से कहा, “तुम में से कौन है जिसका एक दोस्त हो, और वह आधी रात को उसके पास जाकर उससे कहे, ‘हे दोस्त, मुझे तीन रोटियाँ चाहिए,

6 क्योंकि एक मुसाफ़िर दोस्त मेरे पास आया है और उसे खिलाने के लिए मेरे पास कुछ भी नहीं है।

7 और वह अन्दर ही से कहे, मुझे परेशान मत करो, दरवाज़ा बन्द है, और मेरे बच्चे मेरे पास बिस्तर पर हैं, मैं उठ कर तुम्हें कुछ नहीं दे सकता।

8 मैं तुम से कहता हूँ कि हालाँकि दोस्त होने के नाते वह न भी उठे और उसे कुछ भी न दे फिर भी उसके गिड़गिड़ाने की वजह से वह उतनी ज़रूर देगा, जितनी ज़रूरत होगी ।

9 मैं तुम से कहता हूँ, माँगो, तो तुम्हें दिया जाएगा, चाहत रखो, तो पा जाओगे, खटखटाओगे तो तुम्हारे लिए खोला जाएगा।

10 क्योंकि जो कोई माँगता है, उसे मिलता है, और जो ढूँढता है, वह पा लेता है, और जो खटखटाता है, उसके लिए खोला जाएगा।

  • यह कहानी प्रार्थना की ज़रूरत पर ज़ोर देती है और प्रार्थना के एक खास पहलू पर – वह है हिम्मत न हारना। अपने आप में हम वह हैं, कि किसी की मदद नहीं कर सकते हैं।

हम उन के पास आते हैं, जो सब कुछ हैं। जो लोग प्रभु के पास आते हैं, उन्हें मदद करने में प्रभु पीछे नहीं हैं। (जैसा कि इस दृष्टान्त में दोस्त था), लेकिन वह हमारे विश्‍वास को परखेंगे।

मत्ती 15:21-28; 1 पतर. 1:7-8; इब्रा.11:6; यिर्म. 29:13. वह चाहते हैं कि हम उन्हें चाहें। उन्हें चाहने के द्वारा और हमारी लगातार की प्रार्थना से हम उस स्थिति में पहुँचेंगे कि उनकी इच्छा के अनुसार प्रार्थना करें।

  • यह वायदे यीशु मसीह अपने बच्चों को देते हैं। इस उपदेश के संदर्भ वे लोग ही हैं जिन्हें बताया गया है कि हम कौन सी बातों को चाहें (मत्ती 6:9-15, 33)।

उसी के समानान्तर हमारी बिनतियाँ होनी चाहिए। बाईबल कहीं ऐसा नहीं बताती कि हम जो चाहें, हमें मिलेगा, चाहे वह हमारे लिए नुकसानदायक क्यों न हो।

हमें वे चीज़ें माँगनी चाहिए जो उनकी इच्छा के अनुसार जीने में हमारी मदद करेंगी। इसके लिए हमें पवित्र आत्मा की ताकत, बुद्धि और बिना बँटा हुआ मन चाहिए।

  • खटखटाने और खोजने का मतलब प्रार्थना में बने रहना है। हमें तब तक लगे रहना चाहिए जब तक पाएँ न, तब तक खटखटाना चाहिए जब तक रास्ते खुल न जाएँ।

ये पद नहीं सिखाते कि हम लोगों से माँगें। हमें सिर्फ़ प्रभु से कहना है और मांगना है । देखें 👉 भजन 34:10; 69:32; यिर्म. 29:13; होशे 10:12; लूका 11:5-11; 18:1-8; 1 थिस्स. 5:17.

4.  हमे क्यों सचेत रहना चाहिए और प्रभु से निरंतर प्रार्थना करना चाहिए ? देखे ? 👇

  • 1 पतर. 5:8👇

8 अपने आपको काबू में रखो और सचेत रहो, क्योंकि तुम्हारा दुश्मन शैतान गर्जने वाले शेर की तरह इस तलाश में रहता है, कि किसको अपना निशाना बनाए।

  • ऐसी बात से प्रभावित नहीं होना जो मसीही जीवन के प्रतिकूल है । शैतान उन लोगों को पकड़ सकता है जो आत्मिक रीति से सो रहे हैं या अपने में लिप्त हैं। मत्ती 4:1 में शैतान पर टिप्पणी देखें।

इसलिए कि परमेश्‍वर के समान एक ही समय में वह सब जगह नहीं हो सकता, उसे इधर उधर भ्रमण करना पड़ता है।

हालांकि वह शेर के समान आता है, किंतु जब विश्‍वासयोग्य विश्‍वासियों का साम्हना करता है तब वह डर जाता है देखे👉(याकूब 4:7) और वे उसे पैरों से रौंद सकते है देखे👉(भजन 91:13)।

5. परमेश्वर पिता के मर्जी के अनुसार प्रार्थना क्या है ? और कैसे करते हैं ? 👇

  • इफिसि. 1:17-18👇

17) मेरी बिनती यह है कि हमारे प्रभु यीशु के परमेश्‍वर, महिमा के पिता तुम्हें आत्मिक ज्ञान और प्रकाश और परमेश्‍वर के ज्ञान में तुम्हें बुद्धि और ज्योति दें।

18) मैं प्रार्थना करता हूँ कि तुम्हारे मन (समझ) की आँखें खुल जाएँ ताकि तुम जानो कि तुम्हारे बुलाए जाने की आशा और पवित्र लोगों के लिए उनकी महिमामय मीरास की दौलत क्या है।

  • इस प्रार्थना का मतलब यह है पौलुस की यह बिनती पवित्रात्मा से प्रेरित थी । वह उन चीजों को प्रगट करता है, जिन्हें परमेश्‍वर चाहते हैं कि वे लोगों के पास हों।

यह दिखाता है कि हम क्या कर रहे है। अभी उसने कहा था कि उन लोगों ने पवित्र आत्मा पाया है । इसलिए वह यह प्रार्थना क्यों करता है कि पवित्रआत्मा पाएँ ?

वह प्रार्थना करता है कि जो पवित्रात्मा उन में है वह बुद्धि की आत्मा दे। वह यह दुआ करता है कि पवित्रआत्मा जो उन में है,

उन्हें बुद्धि की आत्मा (योग्यता) दे – जिससे वे परमेश्‍वर के वचन की गहरी सच्चाई जानें। उसने प्रार्थना इसलिए की क्योंकि वह चाहता था, कि वे परमेश्‍वर को बेहतर तरीके से जानें।

  • परमेश्‍वर को खुद जानना विश्‍वासियों का बड़ा खज़ाना है । उनका आत्मिक जीवन इसी से शुरू होता है और इसी के साथ बढ़ता है

👉यूहन्ना 17:3; 2 कुरि. 4:6; इफ़ि. 4:13; फ़िलि. 3:8, 10; कुल. 1:10; 2 पतर. 3:18 पौलुस को यह मालूम था कि पिता को व्यक्‍तिगत तरीके से जानने और जानते रहना परमेश्‍वर से रोशनी मिलने पर है।

ज़रूरी है कि परमेश्‍वर अपने आप को ज़ाहिर करें, नहीं तो हम कभी उन्हें जान नहीं सकते, मत्ती 11:27; 1 कुरि. 2:10-11.

  • परमेश्‍वर सिर्फ़ यह नहीं चाहते कि हम उन्हें जानें, लेकिन यह कि विश्‍वासियों के लिए जो कुछ तैयार किया है, वह जानें।
  • “आँखें”- दो तरह की आँखें हैं – शारीरिक जो दिखने वाली चीजों के लिए हैं। आत्मिक जो अनदेखी बातें देखती हैं (2 कुरि. 4:18; इब्रा. 11:13; यूहन्ना 4:35)।
  • अविश्‍वासियों की भीतरी आँखें बन्द और अन्धी हैं 👉- मत्ती 13:15; 2 कुरि. 4:4; 1 यूहन्ना 2:11; प्रका. 3:18. परमेश्‍वर ने विश्‍वासियों की आँखों को खोला है

👉- प्रे.काम 26:18; यूहन्ना 9:39; 2 कुरि. 4:6. जब ऐसा होता है, वे आत्मिक सच्चाई समझने लगते हैं, जिसे वे किसी और तरह से नहीं समझ सकते हैं।

वे अपने आप को समझने लगते हैं और अपने परमेश्‍वर को भी और यह भी कि मुक्‍ति है क्या। लेकिन एक ही पल में विश्‍वासी सब कुछ समझते नहीं हैं।

परमेश्‍वर ने शुरूआत में उन्हें रौशन किया था और लगातार करते रहते हैं।इसलिए पौलुस ने यह बिनती की – एक ऐसी बिनती जिसे अपने लिए और दूसरों के लिए हमें करनी चाहिए।

बिना आत्मिक रोशनी पाए हुए वे चाहे बाईबल कितनी पढ़ें वे ज़्यादा बुद्धिमान नहीं बनेंगे। 2 कुरि. 3:15 से तुलना करें।

पौलुस ने प्रार्थना की थी कि वे तीन बातें समझेंः आशा, परमेश्‍वरीय मीरास और उनकी शक्‍ति।

  • “आशा”- रोमि. 5:2; 8:23-25. विश्‍वासियों की उम्मीद यह है कि मसीह की तरह बनें और हमेशा तक उनके साथ रहें – रोमि. 8:29; 2 कुरि. 3:18; 1 यूहन्ना 3:2-3; यूहन्ना 17:24.
  • “मीरास”- परमेश्‍वर के द्वारा मसीह में विश्‍वासियों के पास मीरास है । परमेश्‍वर के पास संतों में हम उनकी मीरास हैं।

और उसकी कीमती सम्पत्ति और दौलत हैं। वह लोगों को इतना चाहते थे कि अपने बेटे की जान की बाज़ी लगा दी ।

मरे हुओं में से जी उठने के समय वह अपनी मीरास को दावे के साथ ले लेंगे। 👉1 थिस्स. 4:16-18.

6.  प्रभु की प्रार्थना क्या है ? और कैसे प्रभु यीशु ने सिखाया है ? हमारी प्रार्थना अज्ञानता या रटी-रटायी क्यों नहीं होनी चाहिए ?👇

मत्ती 6:9-13👇

9 इसलिए, तुम इस तरह प्रार्थना करना:‘हे हमारे पिता तू जो स्वर्ग में है, तेरा नाम पवित्र किया जाए।  10 तेरा राज आए। तेरी मरज़ी जैसे स्वर्ग में पूरी होती है, वैसे धरती पर भी पूरी हो।

11 आज के दिन की रोटी हमें दे।

12 जैसे हमने अपने खिलाफ पाप करनेवालों को माफ किया है, वैसे ही तू भी हमारे पाप माफ कर।  13 जब हम पर परीक्षा आए तो हमें गिरने न दे, मगर हमें शैतान से बचा।’

  • प्रार्थना सृष्टिकर्ता के कानों के लिए होती है। ढोंगी लोग जग के मालिक की परवाह नहीं करते। वे लोगों को दिखाना चाहते हैं।

ऐसा लग सकता है कि वे प्रभु की उपासना कर रहे हैं, लेकिन अपनी ही आराधना करते हैं। सार्वजनिक प्रार्थना अच्छी है, लेकिन खतरनाक है।

कभी-कभी यह मुश्किल है कि बिना लोगों को दिखाए हम प्रभु से प्रार्थना करें। शायद यही कारण है कि व्यक्‍तिगत प्रार्थना पर यीशु ज़्यादा ज़ोर डालते हैं।

इस में किसी को दिखाने का सवाल ही नहीं है। देखें 👉 मत्ती 6:9-13 हमारी प्रार्थना अज्ञानता या रटी-रटायी नहीं होनी चाहिए। कोई सूत्र या रटी प्रार्थना का असर कुछ नहीं है।

हमारे गिड़गिड़ाने से प्रभु नहीं देते हैं। हमें उन्हें जगाने की ज़रूरत नहीं 👉(भजन 34:15; 121:2-5; 2 इति. 16:9)।

हमें परमेश्‍वर को हुक्म देने की ज़रूरत भी नहीं। ज़्यादा बोलने से सुनी जाएगी ऐसी बात बिल्कुल नहीं है। हर बात के लिए हमें परमेश्वर पिता पर टिके हुए रहना चाहिए ।

कुछ लोग कह सकते हैं, अगर प्रभु को मालूम है कि हमें क्या चाहिए, तो क्यों माँगे? ऐसा बोलना मूर्खता है क्यों कि ;

प्रार्थना एक तरीका है जिस से उनके लोग उन से संगति करते हैं या बातें करते हैं जिससे परमेश्वर पिता को खुशी मिलती है।

  • बहुत से लोग कहते हैं कि परमेश्वर हमारी प्रार्थना के उत्तर क्यों नहीं देते वो इसलिए होता है ?

कि हम प्रभु के इच्छा के अनुसार प्रार्थना नहीं करते इसलिए हमे प्रार्थना के उत्तर नहीं मिलता है ।

यह प्रार्थना एक नमूना है कि वे क्या माँगें और कैसे।

“इस दिन” और “आज ” में दिखाता है कि यह प्रार्थना प्रतिदिन करने योग्य है, केवल कलीसिया में कभी-कभी करने के लिए नहीं।

प्रभु के लोगों को परमेश्‍वरीय केन्द्रित प्रार्थना करनी चाहिए। हमें अपने प्रिय परमेश्‍वर के पास आना चाहिए 👉(मत्ती 7:9-11)।

शब्द “स्वर्ग में” परमेश्‍वर की महानता को दिखाता है। परमेश्‍वर सब प्रार्थना सुनकर उत्तर दे सकते हैं। “नाम पवित्र माना जाए” – नाम का मतलब है,

परमेश्‍वर का स्वभाव या चालचलन या वह क्या हैं? हर शिष्य के मन में परमेश्‍वर के सम्मान व इज़्ज़त का ध्यान होना चाहिए,

इसके पहले कि अपनी मर्जी के मुताबिक कुछ माँगे। हम में से हर एक की प्रार्थना, इच्छा, काम और शब्द सभी मसीह की तरह होने चाहिए (5:16; यूहन्ना 8:29; 17:4; 1 कुरि. 10:31)।

क्या शायद इसीलिए हमारी प्रार्थनाओं का जवाब नहीं मिलता है क्योंकि हम परमेश्‍वर की इज़्ज़त को अपने ख्यालों और ख़्वाइश में नहीं लाते हैं।

7.  प्रार्थना करने से हम परमेश्वर पिता की बड़ाई कैसे करते हैं ? हमें अच्छे काम करने की क्यों जरूरत है ?👇

मत्ती 5:16👇

16 इसी तरह तुम्हारी रोशनी इन्सानों के सामने चमके, कि वे तुम्हारे स्वर्गिक पिता की बड़ाई करें।

  • जब विश्वासी परमेश्वर पिता के इच्छा के अनुसार प्रार्थना करते हैं और प्रभु अपने प्यारे बच्चों को खुशी से देते हैं ;

इसी तोफे को हम गवाही के तौर पर बोलते हैं या करके दिखाते हैं और यह कहते हैं प्रभु यीशु  ने हमे दिया और इस गवाही रोशनी के जैसे काम करती है इंसानों के सामने ;

इसी से परमेश्वर पिता की बड़ाई भी होती है ।  रोशनी के लिए यही एक बढ़िया तरीका है – मीठी-मीठी बातें नहीं, अच्छी नियत नहीं लेकिन सही काम।

बहुत से लोग बड़े अलौकिक ज्ञान की डींग मारते हैं, लेकिन किसी के लिए मददगार नहीं हैं, कृपालु नहीं हैं, न ही अपने कामों से प्रभु की बड़ाई करते हैं।

ऐसे लोगों का घमण्ड परमेश्‍वर की निगाह में घिनौना है। “पिता”- तकरीबन 170 बार यह नाम परमेश्‍वर के लिए यीशु ने इस्तेमाल किया।

यह दिखाता है कि परमेश्‍वर एक व्यक्‍ति हैं जो इंसानों से प्यार करते, देखभाल करते, रक्षा करते और ज़रूरत पूरा करते हैं।

यह नाम यह भी दिखाता है कि उनके आत्मिक बच्चे हैं 👉( यूहन्ना 1:12-13)। हम अच्छे काम इसलिए करें ताकि लोग परमेश्‍वर की बड़ाई करें। (तुलना 👉1 कुरि. 10:31)।

8.  परमेश्वर हमें प्रार्थना के जरीए मांगने को जोर क्यों देते हैं ? 👇

  • मत्ती 7:9-11👇

9 तुम में से ऐसा कौन इन्सान है, कि अगर उसका बेटा उस से रोटी माँगे, तो वह उसे पत्थर देगा?

10 या मछली माँगे, तो उसे साँप देगा?

11 इसलिए जब तुम बुरे होने के बावजूद , अपने बच्चों को अच्छी चीज़ें देना जानते हो, तो तुम्हारे स्वर्गिक पिता अपने माँगने वालों को अच्छी चीज़ें क्यों न देंगे?

  • पहले के युगों में किसी विश्वासी को कुछ चाहिए था तब धेरिय के साथ परमेश्वर पिता को मांगा करते थे यीशु के नाम से पर आज के समय के विश्वासी परमेश्वर पिता से पहले इंसानों को मांगते हैं

उनके सामने गिड़गिड़ाते हैं प्रभु के सामने नहीं जाते ।  ऐसा करने से हम परमेश्वर पिता का अपमान करते हैं उनके होते हुए हमें दूसरों के सामने गिड़गिड़ाने की कोई जरूरत नहीं है ;

परमेश्वर पिता योग्य हैं सब कुछ देने में हमें गलत तरीका इस्तमाल कर ने की कोई जरूरत नहीं है । हम बुरे लोगों के सामने झूकतें है

इससे प्रभु यीशु को बुरा लगता है और शैतान को अच्छा लगता है ; शैतान यही चाहता है  इंसान परमेश्वर के सामने गिड़गिड़ाने के वजा  किसी व्यक्ति के सामने गिड़गिड़ाये ।

“तुम बुरे होने के बावजूद”- यह यीशु के शब्द इन के शिष्यों से कहे गये थे। वे अच्छे लोग थे। लेकिन परमेश्‍वर की दृष्टि में क्या थे, यह यीशु बताते हैं (तुलना करें👉 मत्ती 19:17; भजन 14:1-3)।

यीशु अपने लोगों के साथ ही सारी दुनिया के लोगों की सही हालत पर रोशनी डालते हैं। बुरे विचार, बुरी इच्छाएँ, बेवकूफ़ी के और अनुचित काम,

परमेश्‍वर की न मानने की आदत – यह सब बुरे स्वभाव/मन के लक्षण हैं। शिष्य भी अपने मन के ख्यालों, बातचीत और कामों में सिद्ध नहीं थे।

अगर कोई सोचता है कि वह शुरू के इन शिष्यों से अच्छा है तो क्या वह गलती नहीं कर रहा है? तुलना करें

👉मत्ती 6:12; रोमि. 3:9; 7:18, 25; गल. 5:17; 1 तीमु. 1:15; याकूब 3:2; 1 यूहन्ना 1:8; 1 राजा 8:46.

  • जब हम प्रार्थना करते हैं हमें अपने को सद्गुणी नहीं समझना चाहिए, जैसा फ़रीसी 👉लूका 18:10-12 में करता है।

लेकिन अपनी असफ़लता और कमज़ोरी का एहसास करते हुए कि अगर हमें कुछ मिलता है तो यह परमेश्‍वर की कृपा है। एक बात और देखें।

यीशु ने अपने शिष्यों को ‘कुकर्मी’ नहीं कहा, जैसे झूठे नबियों को कहा था । यह कहना कि शिष्यों के अन्दर बुरा मन (स्वभाव) है, का मतलब यह नहीं कि वे जानबूझ कर बुराई में हैं।

हमारे स्वभाव बुरे होने के बावज़ूद, हम कुकर्मी नहीं कहलाए जाएँगे। बुरे स्वभाव के साथ ही यीशु के शिष्यों के पास नया (अच्छा स्वभाव) भी है।

👉 इफ़ि. 4:22-24. बुरे स्वभाव पर जीत हासिल कर के जीवन जिया जा सकता है (रोमि. 6:12-14)।

9.  प्रार्थना करने के लिए प्रभु ने मध्यस्ती क्यों ठहराया है ? हम विश्‍वासियों में परमेश्‍वर का आत्मा क्यों कराहता है?👇

  • रोमि 8:26-28👇

इसी प्रकार से पवित्र आत्मा हमारी कमज़ोरियों में सहायता करता है, क्योंकि हम नहीं जानते कि हमें क्या और कैसे माँगना चाहिए।

किन्तु परमेश्‍वर का आत्मा स्वयं हमारे लिए ऐसी आहें भर कर प्रार्थना करता है, जिसे शब्दों में नहीं कहा जा सकता।

जो दिलों को परखते हैं, जानते हैं कि पवित्र आत्मा क्या चाहता है, क्योंकि वह अलग किए हुए लोगों के लिए परमेश्‍वर की इच्छा के अनुसार प्रार्थना करता है।

हम जानते हैं कि जिन्हें परमेश्‍वर के उद्देश्य को पूरा करने के लिए बुलाया गया है, और जो उन से प्यार करते हैं, उनके लिए सब कुछ भले के लिए होता है।

  • विश्‍वासियों के पास दो बुद्धिमान मध्यस्थ हैं उनका नाम यीशु और पवित्र आत्मा है ।

उनके पास एक सब से अधिक ताकतवर है और उनका नाम यहोवा परमेश्वर पिता है ; जो इन दो मध्यस्थों की सुनते हैं ।

इसलिए कि वे दोनों परमेश्‍वर की इच्छा में बिनती करते हैं, पिता सदैव पुत्र और आत्मा की प्रार्थना सुनते हैं 👉(1 यूहन्ना 5:14-15 से तुलना करे)।

विश्‍वासियों की कमज़ोरी में संसार बुरे स्वभाव और शैतान पर जीत के लिए त्रिएक परमेश्‍वर लगे हुए हैं। इसलिए कि विश्‍वासी स्वयं में पूरी तरह कमज़ोर हैं

👉रोमि 7:14-25), आत्मा की मदद और मध्यस्थी बहुत आवश्यक हैं। परमेश्‍वर से कैसे और क्या बातचीत करनी चाहिए, वे नहीं जानते।

हमारी कमज़ोरियों को मज़बूती में बदलने के लिए परमेश्‍वर का आत्मा हम में काम करता है।👉 (2 कुरि. 12:9-10) उसके द्वारा ही हम अपनी कमज़ोरी में मज़बूत होते हैं।

सृष्टि, विश्‍वासी और परमेश्‍वर का आत्मा, सभी एक साथ कराह रहे हैं। पवित्र आत्मा हमारी भलाई चाहता है। वह हमारी बुद्धि और पवित्रता में तरक्‍की और यीशु की समानता में रूचि रखता है।

वह भरसक प्रयत्न करता  है कि हम अपराध के दलदल और शैतान के प्रभाव से बचें। वह हमें मज़बूत बनाने और पिता की फलदायक सन्तान बनाने के लिए कोशिश करता है।

पौलुस की आत्मा प्रेरित प्रार्थनाओं से तुलना करें 👉कुल. 1:9-12.

10.  प्रार्थना के आयतें :-👇

  • 1 थिस्स. 5:17-18👇

17 निरन्तर प्रार्थना में लगे रहो। 18 हर बात में आभार प्रकट करते रहो, क्योंकि तुम्हारे लिये मसीह यीशु में परमेश्‍वर की यही इच्छा है।

  • रोमि 1:9-10👇

9 परमेश्‍वर, जिनकी सेवा मैं अपनी आत्मा से उनके बेटे यीशु के आनन्द के समाचार के विषय करता हूँ, इस बात के गवाह हैं, कि अपनी प्रार्थनाओं में तुम्हें याद करता रहता हूँ।

10 यह भी बिनती करता हूँ कि मुझे परमेश्‍वर की इच्छा से तुम्हारे पास आने कामयाबी मिल सके।

  • इफिसि. 6:18👇

18 सब तरह की बिनतियों (प्रार्थनाओं) के साथ हर समय पवित्र लोगों के लिए निरन्तर धीरज से प्रार्थना करते रहो।,

  • कुलुस्सि. 1:3👇

3 हम प्रभु यीशु मसीह और उनके पिता को धन्यवाद देते हैं और तुम्हारे लिए बिनती करने में लगे हुए हैं।

  • 2 तीम. 1:3👇

3 मैं अपने उस परमेश्‍वर का आभारी हूँ , जिसकी सेवा मैं शुद्ध विवेकों से करता हूँ जैसी मेरे पूर्वज ने की। मैं रात-दिन अपनी प्रार्थनाओं में तुम्हें निरन्तर याद करता हूँ।

  • मत्ती 6:5-13👇

5 जब तुम प्रार्थना करो, तो ढोंगियों की तरह न बनो। लोगों को दिखाने के लिए सभाओं में और सड़कों के मोड़ पर खड़े होकर प्रार्थना करना उनको बड़ा अच्छा लगता है।

मैं तुम से सच कहता हूँ कि उन्हें उनका प्रतिफल मिल चुका। 6 लेकिन जब तुम प्रार्थना करो, तो अपने भीतरी कमरे में जाओ, दरवाज़ा बन्द कर के अपने स्वर्गिक पिता से अकेले में प्रार्थना करो।

तब तुम्हारे पिता जो सब कुछ देखते हैं, तुम्हें प्रतिफल देंगे। 7 प्रार्थना करते समय दूसरे लोगों की तरह, जो अविश्‍वासी हैं, बकबक मत करो।

क्योंकि वे समझते हैं कि उनके बहुत बोलने से उनकी सुनी जाएगी। 8 इसलिए उनकी तरह मत बनो क्योंकि तुम्हारे स्वर्गिक पिता तुम्हारे माँगने से पहले जानते हैं कि तुम्हारी क्या-क्या ज़रूरतें हैं।

9 इसलिए इस तरह से प्रार्थना करो, “हे हमारे स्वर्गिक पिता, आप जो स्वर्ग में हैं, आपका नाम पवित्र माना जाए। 10 आपका राज्य आए ।

जैसे आपकी इच्छा स्वर्ग में पूरी होती है, इस पृथ्वी पर भी हो । 11 हमारे हर दिन की रोटी (खाना और ज़रूरत की चीज़ें) आज हमें दें।

12 जिस तरह हम ने अपने अपराधियों को माफ़ किया है, वैसे ही हमारे अपराधों को माफ़ करें । 13 हमें प्रलोभन में पड़ने न दें ,

लेकिन बुराईं से (शैतान से) बचाएँ; क्योंकि राज्य और पराक्रम और शान (महिमा) हमेशा आपकी ही हैं। ऐसा ही हो।

  • मरकुस 11:24👇

24 “यहाँ से हट कर समुद्र में जा गिरो, और यह विश्‍वास करे कि जैसा कहता है वैसा हो जाएगा। वह मुँह माँगा पाएगा।

  • लूका 11:1-13👇

1 किसी जगह पर यीशु के प्रार्थना करने के बाद शिष्यों में से एक ने उन से कहा, “हे स्वामी, जैसे यूहन्ना ने अपने शिष्यों को प्रार्थना करना सिखलाया था, वैसे ही हमें भी सिखा दीजिए।”

  • लूका 18:1-8👇

1 लोगों को यह सिखाने के लिए कि उन्हें कभी मायूस नहीं होना चाहिए, लेकिन परमेश्‍वर पिता से प्रार्थना करते रहना चाहिए,

2 यीशु ने यह बताया कि, “एक शहर में एक जज था जो न इस दुनिया के मालिक से डरता था और न इन्सान की इज़्ज़त करता था।

3 एक बार उसी शहर की रहने वाली एक विधवा उसके पास आकर कहने लगी, “मेरे दुश्मन के खिलाफ़ मुझे इन्साफ़ दिलाओ।”

4 कुछ समय तक उस जज ने उसकी बिनती की परवाह नहीं की, लेकिन बाद में उसने अपने आप से कहा, “हालाँकि न ही मैं परमेश्‍वर से डरता हूँ और न इन्सान की इज़्ज़त करता हूँ,

5 फिर भी क्योंकि यह विधवा मुझे परेशान करती रहती है, मैं उसे इन्साफ़ दिला कर रहूँगा।”

6 यीशु ने कहा, “देखा तुम ने कि उस जज का रवैया कैसा था?

7 ✽इसलिए जो लोग सब्र से सहते रहते हैं और जो दिन रात परमेश्‍वर को पुकारते हैं, उन्हें क्या वह इन्साफ़ नहीं दिलाएँगे?

8 ✽मैं तुम को बताए देता हूँ, कि वह बहुत ही जल्दी उनके लिए इन्साफ़ का काम करेंगे। फिर भी जब मैं दोबारा आऊँगा तो कितने लोगों को पा सकूँगा जिनमें विश्‍वास होगा?”

  • रोमि 8:26-27👇

26 इसी प्रकार से पवित्र आत्मा हमारी कमज़ोरियों में सहायता करता है, क्योंकि हम नहीं जानते कि हमें क्या✽ और कैसे माँगना चाहिए।

किन्तु परमेश्‍वर का आत्मा स्वयं हमारे लिए ऐसी आहें भर कर प्रार्थना करता है, जिसे शब्दों में नहीं कहा जा सकता।

27 जो दिलों को परखते हैं, जानते हैं कि पवित्र आत्मा क्या चाहता है, क्योंकि वह अलग किए हुए लोगों के लिए परमेश्‍वर की इच्छा के अनुसार प्रार्थना करता है।

  • इफिसि. 1:17👇

17 मेरी बिनती यह है कि हमारे प्रभु यीशु के परमेश्‍वर, महिमा के पिता तुम्हें आत्मिक ज्ञान और प्रकाश और परमेश्‍वर के ज्ञान में तुम्हें बुद्धि और ज्योति दें।

  • कुलुस्सि. 1:9👇

9 इसी कारणवश, हम ने भी जिस दिन से यह सुना है, तुम्हारे लिए लालसा करने और प्रार्थना में नहीं चूकते ,

ताकि तुम यीशु की इच्छा की पहचान जो पूर्ण ज्ञान और आत्मिक समझ के साथ है, भरपूर होते जाओ।

  • इब्रानि. 11:6👇

6 विश्‍वास बिना उन्हें खुश करना असंभव है , क्योंकि परमेश्‍वर के पास आने वाले को विश्‍वास करना चाहिए कि वह हैं और अपने चाहने वालों को जवाब देते हैं (खोजने वालों को पुरस्कार देते हैं)।

  • याकूब 1:5-8👇

5 अगर तुम में से किसी को बुद्धि की कमी हो, तो परमेश्‍वर से माँगे, उसे मिलेगी । वही हैं जो सब को बिना किसी नाराज़गी के उदारता से बुद्धि देते हैं।

6 लेकिन बिना शक किए हुए विश्‍वास से माँगे , क्योंकि शक करने वाला समुद्र की लहर की तरह है, जो हवा से बहती और उछलती रहती है।

7 शक्की इन्सान यह न समझे, कि उसे प्रभु कुछ देंगे।

8 ऐसा व्यक्‍ति शक्की होने की वजह से अपने सारे जीवन में डावाँडोल रहता है।

  • याकूब 5:16-18👇

16 दूसरों के विरोध में किए गए गुनाहों को मान लो , एक दूसरे के लिए परमेश्‍वर से माँगो, ताकि तुम स्वस्थ हो जाओ। करने जीवन जीने वाले व्यक्‍ति की प्रार्थना से बहुत असर होता है।

17 एलिय्याह भी तो हमारी तरह एक इन्सान था। उसने लौ लगाकर माँगा कि बरसात न हो और ऐसा ही हुआ। लगभग साढ़े तीन साल तक पानी नहीं बरसा।

18 जब फिर से उसने प्रार्थना की, तो बारिश हुयी और उपज भी।

  • 1 यूहन्ना 5:14-15👇

14 उनके सम्बन्ध में हमें यह हिम्मत है, कि यदि हम उनकी योजना (इच्छा) के अनुसार कुछ माँगते हैं, वह हमारी सुनते हैं।

15 यदि हम को मालूम है कि जो कुछ हमारी बिनती होती है, वह सुनते हैं तो हमें यह भी मालूम है कि जो कुछ हम ने माँगा, हमें मिल चुका है।

  • अय्यूब 27:8, 9👇

8 क्योंकि जब परमेश्‍वर भक्‍तिहीन की जान लेता है, उसे मिटा देता है, तो क्या उसके लिए कोई आशा रह जाती है?9जब उस पर मुसीबतें आती हैं, तो क्या परमेश्‍वर उसकी दुहाई सुनता है?

  • नीतिवचन 15:29👇

29 यहोवा दुष्ट से दूर रहता है, मगर वह नेक जन की प्रार्थना सुनता है।

  • नीतिवचन 28:9👇

9 जो परमेश्‍वर का कानून मानने से इनकार करता है, उसकी प्रार्थना तक घिनौनी है।

  • यशायाह 1:15👇

15 जब तुम मेरे आगे हाथ फैलाओगे, तो मैं अपनी आँखें फेर लूँगा। तुम चाहे जितनी भी प्रार्थना कर लो, मैं तुम्हारी एक न सुनूँगा, क्योंकि तुम्हारे हाथ खून से रंगे हैं।

  • यूहन्‍ना 9:31👇

31 हम जानते हैं कि परमेश्‍वर पापियों की नहीं सुनता, लेकिन अगर कोई उसका डर मानता है और उसकी मरज़ी पूरी करता है, तो वह उसकी सुनता है।

Advertisement
Amit kujur: नमस्ते दोस्तों मेरा नाम Amit Kujur हे ,में इंडिया के Odisha States के रहने वाला हूँ | आछा लगता हे जब इन्टरनेट के मदत से कुछ सीखते हैं और उसे website/blog के जरिये आपही जसे दोस्तों के बिच शेयर करना आछा लगता हे और मुझे भी सिखने को बोहुत कुछ मिलता हे | इसी passion को लेकर sikhnaasanhe.com website नाम का ब्लॉग बनाएं जहा हिंदी भाषा के आसान सब्दों में हार तरह के technology और skills related आर्टिकल जरिये मेरा जितना जो experience और knowledge हे शेयर करता हूँ |

View Comments (0)

Advertisement