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Permeswar ka Prem kya hai ?(Jesus Love in hindi)

” अगर हम प्रेम ना करे तो इसमें हमारी भारी नूकसान होती है हमे किसी भी व्यक्ति के लिए प्रार्थना करने में दिक्कते आती  है क्यों कि  हम उस व्यक्ति से खास प्रेम नहीं रख पाते या प्रेम ही नहीं करते हैं !

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प्रेम दूसरों की भलाई सोचता है। प्रेम अपने बारे में नहीं सोचता !   लोग अपने लिए परमेश्वर के प्रेम को महसूस करें।

परमेश्वर पिता का प्रेम हम सब के लिए बहुत कीमती है लेकिन परमेश्वर के लोगों में से कितनो में अभी भी परमेश्वर के प्रेम के बारे में सुनने या मेहसूस करने की शक्ति कम हो चुकी है ,

इसे आप बोल सकते हैं प्रेम का ठंडा हो जाना । मेरे भायों बेहनो आज कल चर्च में जो लोग आते हैं उनके भी प्रेम ठंडी हो चुकी है वे किसी के गलती करने में माफी नहीं  देना या उनकी और मूड के ना देखना उनसे प्रेम से बातें ना करना ये दर्शाती है उनके मनों में कुछ शिकायतें है  उस व्यक्ति  के प्रति इसलिए वह इंसान उस व्यक्ति को प्रेम नहीं कर पाता !

शिकायतें आज आम हो गई हैं, क्योंकि हम एक अधूरे संसार में अपरिपूर्ण लोगों के बीच जी रहे हैं।

शिकायत कैसी भी हो सकती है, अंदरूनी नाराज़गी, दुःख, पीड़ा, या किसी हालात से नफ़रत दिखाने से लेकर किसी पर खुलकर दोष लगाने तक।

ज़्यादातर लोग शिकायत करने और सामना करने से दूर रहना पसंद करते हैं; फिर भी, क्या एक व्यक्‍ति को हमेशा ही चुप रहना चाहिए? इसके बारे में बाइबल का क्या दृष्टिकोण है? हम दूसरो को सीखाते हैं क्या हम वो करते हैं ! यीशु मसीह कुछ इस तरह की बात कहते हैं दूसरों को माफ करने के बारे में।

यीशु ने उससे कहा, “मैं तुझसे कहता हूँ कि सात बार नहीं बल्कि 77 बार  “ 77बार आप कितनों के बुरे बर्ताव या गलतियों को याद रख पाते हैं  ,

में तो समझता हूं  किसी व्यक्ति को अगर यीशु मसीह के सामर्थ से हममें  प्यार करने की शक्ति है ; तो  इस बात की कोई सीमा नहीं की हम उस व्यक्ति को माफ करने में शर्माएं !

मेरे भाई बेहन हम जब झगड़ते या सालों सालों तक किसी इंसान से बाते नहीं कर पाते हैं तो हम में कमी होती है हम माफी नहीं दे पाते तब हमें शर्माने की जरूरत है क्योंकि हम माफ नहीं कर पाते हैं !

प्रेम करने वाले व्यक्ति किसी की गलतियों को याद नहीं रखते हैं जो व्यक्ति  अपने पड़ोसी से प्रेम करता है  वो परमेश्वर से ही प्रेम करता है और  ये दिखता है कि वह परमेश्वर से है ,

तो माफी मांगने या माफ करने में कंजूसी ना करें   खुद पर इतना घमंड करना कितनी शर्म की बात है माफ ना करना भी घमंड की बात है  ये बहुत गंभीर बात है   !

हम अपने चाहने वालों को प्रेम करे ये कोन सी बडी बात है इसमें कोई चुनौती नहीं  ; पर चुनौती इस बात की है कि हम यीशु  के जैसे प्रेम करे ! अपने शत्रुओं से भी प्रेम रखे । आप सोचते होंगे शत्रुओं से केसे प्रेम करे ये बहुत बडी चुनौती है ये केसे करें परमेश्वर के मदद से हो सकता है !

इसके बदले परमेश्वर ने हमें प्रेम किया अपने बेटे को हमारे लिए कुरबान किया ! और ठीक उसी तरह यीशु मसीह ने भी हमसे प्रेम किया और अपनी जान निछावार किया !

घमंडी व्यक्ति कभी माफ नहीं कर पाता क्यों की उसका घमंड सिर पे होता है इस लिए वह माफ नहीं कर पाता या प्रेम नहीं कर पाता !

जरा सोचिए यीशु मसीह यहां होते तो ऐसे करते ? नहीं बिलकुल भी नहीं यीशु मसीह मन के दिन , नम्र , व्यक्ति हैं हमें भी यीशु मसीह के नमूना होने की जरूरत है !

इसिसे हम लोगो को बता सकते हैं और दिखा भी सकते हैं  यीशु  का प्रेम क्या है ! हम अपने परमेश्वर के स्वभाव को ऐसा दिखा सकते हैं !

बहुतों  का मन फिराव में मदद भी कर सकते हैं ! परमेश्वर ने मुझसे कहा “मेरे लोगों से कहो कि मैं उनसे प्रेम करता हूँ।”

क्रोध , और कड़वाहट एक घातक कैंसर की तरह होती है, हमारे पूरे जीवन में खाने के लिए, शरीर, मन और आत्मा को धीरे धीरे खा जाती है !

बाइबिल चेतावनी देता है, “जो भी अपने भाई से नफरत करता है … अंधेरे में घूमता है” (1 यूहन्ना 2:11)।   दूसरा, हमें परमेश्वर की क्षमा का महसुस करने की आवश्यकता है और फिर दूसरों को उसी तरह माफ कर दो परमेश्वर हमें क्षमा क्यों करता है?

ऐसा नहीं है क्योंकि हम इसके लायक हैं, लेकिन क्योंकि मसीह हमें प्यार करता है और हमारे लिए मर गया। इसी तरह, आपकी मां क्षमा करने के लिए “लायक” नहीं हो सकती है

लेकिन परमेश्वर से आपको प्यार करने और उसे माफ करने में मदद करने के लिए कहें, जैसे मसीह आपको प्यार करता है और आपको माफ करता है।

आखिरकार, उसे बताएं कि आपने उसे माफ कर दिया है – और फिर इसे फिर कभी नहीं लाया। इसके बजाय, प्यार के छोटे से व्यवहार के साथ अपने रिश्ते को फिर से नये मोके के साथ शुरू करें ।

जो आपको देखभाल करता है या देखभाल नहीं भी करता है । अपने अच्छे व्यवहार से सब का दिल जीतने की कोशिश करें ! तब आप यीशु के अच्छे बेटे बेटी कहलाएंगे !

यह अलौकिक आसमानी पवित्र प्रेम है (1 कुरि. 13:1) 👈 इसमें पाते हैं यही परमेश्‍वर के पास है और यीशु को मानने वालों को वह देते हैं  इस दुनिया में यह किसी के पास नहीं है।

दोस्तों और पारिवारिक सदस्यों के लिए जो प्रेम होता है, वह यह नहीं है। यह सेक्स वाला प्रेम नहीं है। इस में कोई स्वार्थ नहीं है, यह सेवा करने वाला और भलाई लाने वाला प्रेम है। परमेश्‍वर द्वारा यीशु को भेजे जाने में हम इस प्रेम को देखते हैं।

यह निःस्वार्थ प्रेम है जो दूसरों की भलाई की सोचता है। इस में काम भावना, स्वार्थी इच्छा और दो विपरीत यौन के बीच का आकर्षण सम्मिलित नहीं है।

नए नियम के अनेक पदों के द्वारा इसका अर्थ स्पष्ट हो जाता है -अगापे ईश्‍वरीय प्रेम है। प्यार की ज़रूरत , प्रेम के स्वभाव और प्रेम के स्थायीपन की बात करता है ।

वह इस बात से शुरूआत करता है कि इस पृथ्वी या स्वर्ग की किसी भी भाषा से बढ़कर प्रेम है। बिना प्रेम के, अन्य भाषाओं, या भाषण का उपयोग मात्र हल्ला-गुल्ला है।

स्वर्गदूतों की भाषाएँ वे हैं, जो स्वर्गदूत बोलते हैं। इसलिए मनुष्यों की भाषाएँ वे भाषाएँ हैं जिन्हें मनुष्य बोलते हैं।

👉 [ 1 कुरिन्थ. 13:1 यदि मैं इन्सानों और स्वर्गदूतों की भाषाओं में बोलूँ, लेकिन मेरे पास प्रेम✽ न हो, तो मैं ठन-ठन करने वाला पीतल और झनझनाती झाँझ की तरह हूँ। ]

इस पद में पौलुस यह नहीं कह रहा है कि उसने स्वर्गदूतों की किसी भाषा में बातें की, न ही वह यह कहता है कि उसमें प्रेम नहीं।

स्पष्ट अर्थ है यदि वह स्वर्गदूतों की भाषा में बोले और प्रेम न रखे तो कोई लाभ नहीं।

पूरी बाईबल में यह कहीं नहीं लिखा है कि कोई व्यक्‍ति स्वर्गदूतों की भाषा में बोलता था। जब स्वर्गदूत पृथ्वी पर आए,

तब उन्हों ने मनुष्यों की भाषा में बातचीत की, क्योंकि वे चाहते थे कि लोग उन्हें समझें।

👉 रोमि 13:8 आपसी प्यार के अलावा और किसी बात के कर्ज़दार न हो। जो दूसरों से प्रेम करता है उसने परमेश्‍वर के नियमशास्त्र को पूरा कर लिया है। ]

प्रभु येशु से सच्चे दिल से प्यार करने और तन-मन से उसकी सेवा करने के लिए यह जानना मेरे लिए काफी है कि मैं अपनी ज़िंदगी के लिए परमेश्वर पिता का कर्ज़दार हूँ,

जिसने इंसान को किसी मकसद से बनाया है। प्रेम किसी का नुकसान नहीं करता। इसलिए जिसने प्रेम किया उसने परमेश्‍वर पिता के सारे नियमों का पालन किया।

० सच कहें तो यह बाईबल का हृदय है। परमेश्‍वर ने नाश होने वाले मनुष्य के लिये दया प्रगट की।

वह मनुष्य से इसलिए प्रेम नहीं करते कि वे भले या उस प्रेम के योग्य हैं (वे भले या उस प्रेम के योग्य होते, तो उनका नाश नहीं होता)।

वह उन से प्रेम इसलिए करते है क्योंकि प्रेम करना उसका स्वभाव से है (निर्ग. 34:6-7; 1 यूहन्ना 4:8)। उनका प्रेम केवल शब्द ही में नहीं,

परन्तु काम  के में भी था, परमेश्‍वर ने खुद देह में आने और जी उठने से अपने प्रेम को फिर साबित किया।

परमेश्‍वर का प्रेम मात्र एक राष्ट्र के लिये नहीं था (जैसा कि कई यहूदियों ने सोचा था)। परन्तु संपूर्ण मानवजाति के लिये था।

यहोवा का नाम, यानी एक सच्चे परमेश्‍वर का स्वभाव। जब तक उसके लोग पश्चाताप नहीं करेंगे,

तब तक परमेश्वर उसका मन नहीं बदलेगा और वह जानता था कि वे नहीं करेंगे। और कुछ नहीं आने वाली विपत्ति को टाल सकता है यहोवा।

फिर भी लोग परमेश्वर के प्रेम को नहीं समझ सकते , लोगों को समझना चाहिए कि हम पर जो मुसीबतें आ रही है उसका सीधा मतलब आता है

प्रभु जो हमसे प्रेम करता है वो लौट आने को कहता है इसे हम परमेश्वर पिता का डांट भी केह सकते हैं !

हमारा परमेश्वर जलन रखने वाला परमेश्वर है वो हमे किसी से नहीं बांट सकता ! यहोवा अपने स्वोरूप चेहरा हमारा बनाता है ताकि हम पर यहोवा का चेहरे का रोशनी हमेशा से चमके , और कृपा हम पर हो ।

  • यीशु ने यह दिखा दिया कि परमेश्‍वर दया से भरे हैं। वह प्रेमी परमेश्‍वर हैं। अपने लोगों की ही सोचते हैं। यीशु भी यही करने के लिए कहते हैं।
  • यह एक कानून नहीं है, यहाँ प्रेमी मन की बात है। जो कुछ हम करना चाहते हैं, हमें पहले से वह बनना है।
  • मतलब ये है कि हम दूसरों से जो उम्मीद करते हैं हमसे प्रेम से बात करे तो हमे खुद प्रेम से बातें कर के दिखाना होगा तब लोग हमे देख कर यीशु मस्सी को जानेंगे !
  • ऐसे ही हमें एक दूसरे को काम करके समझाना होगा ! अगर हमारे पास यीशु का प्रेम है तो उसे अंदर छुपा कर नहीं रखना है प्रेम यीशु मस्सी के जैसे दिखाना होगा !
  • तो लोगों को समझने में जादा आसान होगा ! अगर हमें कुछ मिलता है तो यह परमेश्‍वर की कृपा है।
  • यदि हम उनकी आज्ञाओं को अनदेखा करते, तोड़ते हैं, तो उनके नाम में प्रार्थना कैसे कर सकते हैं? हमारे शब्द नहीं, कार्य हमारे प्रेम को दिखाते हैं।
  • आँसू, अच्छी भावनाएँ और प्रेम के बारे में ज्ञान नहीं, किंतु आज्ञाकारिता का सबूत है। यह जानने के लिये कि हम मसीह से क्या सचमुच प्रेम करते हैं
  • हमें उन आज्ञाओं पर दृष्टि डालनी चाहिये जो उन्हों ने दी हैं और यह पूछना चाहिए कि हम क्या उन्हें मानते हैं – आज्ञा मानने का अर्थ है, अभ्यास में लाना।
  • आईये अपने जीवन का हम परीक्षण करें कि सच में हम मसीह से प्रेम करते हैं या नहीं। मसीह के साथ हमारा जो सम्बंध है उसका मुख्य बात ही प्रेम होना चाहिये।
  • सच्चे प्रेम का धारा परमेश्वर पिता से होकर आता है, क्योंकि विश्वासियों का जन्म प्रभु यीशु से होता है, उन्हें प्रेम में प्रभु यीशु के समान होना चाहिए।
  • यह अलौकिक आसमानी पवित्र प्रेम है (1 कुरि. 13:1) 👈 इसमें पाते हैं यही परमेश्‍वर के पास है और यीशु को मानने वालों को वह देते हैं  इस दुनिया में यह किसी के पास नहीं है।
  • दोस्तों और पारिवारिक सदस्यों के लिए जो प्रेम होता है, वह यह नहीं है। यह सेक्स वाला प्रेम नहीं है। इस में कोई स्वार्थ नहीं है, यह सेवा करने वाला और भलाई लाने वाला प्रेम है।
  • परमेश्‍वर द्वारा यीशु को भेजे जाने में हम इस प्रेम को देखते हैं।

👉 रोमि. 5:8 :-

० लोगों ने सचमुच में नया जन्म पाया है, इसका प्रमाण है कि हक़ीक़त से बाहर प्रेम उन में होगा। यदि यह है, दिखाई ज़रूर देगा।

यह निःस्वार्थ प्रेम है जो दूसरों की भलाई की सोचता है। इस में काम भावना, स्वार्थी इच्छा और दो विपरीत यौन के बीच का आकर्षण सम्मिलित नहीं है।

नए नियम के अनेक पदों के द्वारा इसका अर्थ स्पष्ट हो जाता है -अगापे ईश्‍वरीय प्रेम है। प्यार की ज़रूरत ,

प्रेम के स्वभाव और प्रेम का मज़बूती की बात करता है । वह इस बात से शुरूआत करता है कि इस पृथ्वी या स्वर्ग की किसी भी भाषा से बढ़कर प्रेम है।

बिना प्रेम के, अन्य भाषाओं, या भाषण का उपयोग मात्र हल्ला-गुल्ला है। स्वर्गदूतों की भाषाएँ वे हैं, जो स्वर्गदूत बोलते हैं।

इसलिए मनुष्यों की भाषाएँ वे हैं जिन्हें मनुष्य बोलते हैं।

👉1 कुरिन्थ. 13:1 यदि मैं इन्सानों और स्वर्गदूतों की भाषाओं में बोलूँ, लेकिन मेरे पास प्रेम✽ न हो, तो मैं ठन-ठन करने वाला पीतल और झनझनाती झाँझ की तरह हूँ। ]

इस पद में पौलुस यह नहीं कह रहा है कि उसने स्वर्गदूतों की किसी भाषा में बातें की,

न ही वह यह कहता है कि उसमें प्रेम नहीं। स्पष्ट अर्थ है यदि वह स्वर्गदूतों की भाषा में बोले और प्रेम न रखे तो कोई लाभ नहीं।

पूरी बाईबल में यह कहीं नहीं लिखा है कि कोई व्यक्‍ति स्वर्गदूतों की भाषा में बोलता था।

जब स्वर्गदूत पृथ्वी पर आए, तब उन्हों ने मनुष्यों की भाषा में बातचीत की, क्योंकि वे चाहते थे कि लोग उन्हें समझें।

स्वर्गदुत्त भी यही चाहते थे कि इंसान उन्हें समझें !

० विश्‍वासी एक बात के कर्ज़दार हैं, जिसे उनको अदा करना चाहिए – एक दूसरे से प्यार करने की ज़िम्मेदारी ऐसा हम इस पत्री में पाते हैं

👉  रोमि 13:8 :-

आपसी प्यार के अलावा और किसी बात के कर्ज़दार न हो। जो दूसरों से प्रेम करता है उसने परमेश्‍वर के नियमशास्त्र को पूरा कर लिया है। ]

प्रेम किसी का नुकसान नहीं करता। इसलिए जिसने प्रेम किया उसने परमेश्‍वर पिता के सारे नियमों का पालन किया।

० सच कहें तो यह बाईबल का हृदय है। परमेश्‍वर ने नाश होने वाले मनुष्य के लिये दया प्रगट की।

वह मनुष्य से इसलिए प्रेम नहीं करते कि वे भले या उस प्रेम के योग्य हैं (वे भले या उस प्रेम के योग्य होते, तो उनका नाश नहीं होता)।

वह उन से प्रेम इसलिए करते है ;  क्योंकि प्रेम करना उसका स्वभाव से है  इसका सबूत हम इसमें पाते हैं

👉(निर्ग. 34:6-7; 1 यूहन्ना 4:8)। उनका प्रेम केवल शब्द ही में नहीं, परन्तु काम  में भी था,

परमेश्‍वर ने खुद देह में आने और जी उठने से अपने प्रेम को फिर साबित किया।

परमेश्‍वर का प्रेम मात्र एक राष्ट्र के लिये नहीं था (जैसा कि कई यहूदियों ने सोचा था)। परन्तु संपूर्ण मानवजाति के लिये था।

यहोवा का नाम, यानी एक सच्चे परमेश्‍वर का स्वभाव। जब तक उसके लोग पश्चाताप नहीं करेंगे,

तब तक परमेश्वर उसका मन नहीं बदलेगा और वह जानता था कि वे पश्चाताप नहीं करेंगे। और कुछ नहीं आने वाली विपत्ति को टाल सकता है यहोवा।

फिर भी लोग परमेश्वर के प्रेम को नहीं समझ सकते , लोगों को समझना चाहिए कि हम पर जो मुसीबतें आ रही है उसका सीधा मतलब आता है

प्रभु जो हम से प्रेम करता है वो लौट आने को कहता है , इसे हम परमेश्वर पिता का डांट भी केह सकते हैं !

० यीशु ने यह दिखा दिया कि परमेश्‍वर दया से भरे हैं। वह प्रेमी परमेश्‍वर हैं। अपने लोगों की ही सोचते हैं। यीशु भी यही करने के लिए कहते हैं।

यह एक कानून नहीं है, यहाँ प्रेमी मन की बात है। जो कुछ हम करना चाहते हैं, हमें पहले से वह बनना है।

मतलब ये है कि हम दूसरों से जो उम्मीद करते हैं हमसे प्रेम से बात करे तो हमे खुद प्रेम से बातें कर के दिखाना होगा तब लोग हमे देख कर यीशु मस्सी को जानेंगे !

ऐसे ही हमें एक दूसरे को काम करके समझाना होगा ! अगर हमारे पास यीशु का प्रेम है तो उसे अंदर छुपा कर नहीं रखना है प्रेम यीशु मस्सी के जैसे दिखाना होगा !

तो लोगों को समझने में जादा आसान होगा ! अगर हमें कुछ मिलता है तो यह परमेश्‍वर की कृपा है।

० पौलुस ऐसे प्यार की बात करता है, जो दिखता है। पति का प्रेम पत्नी के प्रति बर्ताव में दिखता है। जो पति यहाँ नाकामयाब होते हैं,

वे परिवार की तमाम कठिनाईयों और उदासी का कारण बनते हैं।

“जो प्रेम नहीं… जानता”– परमेश्‍वर के बारे में ज्ञान रखने की लोग डींग मार सकते हैं। लेकिन अगर उनके पास परमेश्‍वरीय प्रेम नहीं है,

तो वे अपने आप को धोखा दे रहे हैं। तमाम अनुभव उनके हो सकते हैं, और भावनाएँ भी।

लेकिन यदि वे मसीह के लोगों को अपना नहीं सकते तो सब कुछ मात्र ढोंग है।

० परमेश्‍वर ही सारे प्रेम के स्त्रोत हैं, मनुष्य नहीं। यदि प्रभु ने दिखाया न होता तो हम ने कभी भी अद्वितीय प्रेम को न जाना होता।

हम उन से प्रेम न करते अगर उनका प्रेम हमारे अन्दर डाला नहीं गया होता।

० परमेश्‍वर पिता ने संसार के लिये मरने हेतु बहुतों में से एक पुत्र को नहीं दिया। उन्हों ने अपना मात्र एकलौता पुत्र दिया।

वह अवर्णनीय और महान कीमत रखने वाला पुत्र था । प्रभु यीशु को संसार में भेजने का परमेश्‍वर का उद्देश्य यहाँ साफ़ है।

मनुष्य अपराध में नाश हो रहे थे और वह उन्हें अनन्त जीवन देना चाहते थे। यह जीवन एक उत्तम जीवन के विषय में बताता है।

केवल सदा के जीवन के विषय में नहीं। अनन्त जीवन पवित्र है और परमेश्‍वर के साथ ऐसा आत्मिक जीवन है जिसे अपराध और मृत्यु छू नहीं सकती।

प्रभु यीशु यही फिर से स्पष्ट शब्दों में बताते हैं कि इस जीवन को पाने का केवल एक ही मार्ग है। यह मार्ग उन पर विश्‍वास रखने के द्वारा ।

हम सदा के लिये नर्क में नाश होंगे, या अनन्तकाल तक परमेश्‍वर के साथ रहेंगे यह हमारे प्रभु यीशु पर हमारे विश्‍वास करने पर निर्भर है।

० इस में संदेह नहीं कि यहाँ पर पौलुस के मन में सब से बड़ा और अवर्णनीय दान था। वह इस वरदान की ओर इशारा करता है

ताकि विश्‍वासी समझ सकें कि देना क्या है और जैसे परमेश्‍वर देते हैं, देना सीखें। यहाँ विश्‍वासियों के देने के सम्बन्ध में सत्य के बारे में संक्षेप में लिखा है।

देना, परमेश्‍वर का दान है, जो उनके मन और जीवन में परमेश्‍वर की दया के कारण है । देना एक अच्छा अवसर है जिसे विश्‍वासियों को चाहना है ।

“देना हमारी आज्ञाकारिता और प्रेम की परीक्षा है” – न देना दिखाता है, प्रेम नहीं है। थोड़ा देना, थोड़ा प्रेम दिखाता है।

अधिक देना अधिक प्रेम दिखाता है । देना परमेश्‍वर का स्वभाव है । यदि मन ठीक है, छोटे दान भी परमेश्‍वर को ग्रहणयोग्य हैं ।

देने से जिन लोगों के पास बहुत है और जो आवश्यकता में हैं उनके बीच की खाई पट जाती है । देना परमेश्‍वर के लोगों की सेवा है ।

देना, आज़ादी और खुशी से होना चाहिए । देने के बदले में प्रतिफल है ।

  • यीशु प्रेम हैं। वह यह भी सिखाता है कि प्रेम करना क्या है। विश्‍वासियों को दूसरे विश्‍वासियों के लिए जान देने तक तैयार होना चाहिए।

यही स्तर परमेश्‍वर दिखाते और सिखाते हैं। अफ़सोस की बात है कि बहुत से अच्छे मसीही कहलाने वाले लोग दूसरों की मदद करने से पीछे हटते हैं।

  • जो प्रेम अच्छे कामों में प्रगट नहीं होता है, वह प्रेम नहीं है। वह धोखे वाला और बेकार का है। जब यीशु लोगों का इन्साफ़ करने आएँगे

उस समय देखा यह जाएगा कि लोगों ने क्या किया है या क्या नहीं किया है। सहानुभूति की भावनाओं और मीठे शब्दों के आधार पर न्याय नहीं होगा । इस में शक नहीं कि जो लोग सचमुच का प्यार दूसरों के लिए दिखाते हैं, उसमें उनका अपना स्वार्थ नहीं होता है। वे मदद सिर्फ़ इसलिए करते हैं, ताकि खुद मदद पा सकें।

  • ऐसे लोग परमेश्‍वर की कारीगरी हैं, जो मसीह में आने पर अब अच्छे काम करने के लिए हैं । अच्छे काम इस सच्चाई के सबूत का हिस्सा हैं कि

हमारा प्रेम खरा है और हमारे मन में प्रभु ने काम किया है । लगातार हमारे जीवन में अच्छे काम नहीं है तो यह सिद्ध करता है कि

हमारा प्रेम सिर्फ़ शब्दों का है। यह भी कि हमारा बदलाव नहीं हुआ है। एक इन्सान की ज़िन्दगी में सच्चा प्रेम एक बड़ी शक्‍ति है।

तो परमेश्‍वर का प्रेम (या अगापे प्रेम) उसके अंदर कैसे रह सकता है? मेरे भायो बहनों , हमारा प्रेम शब्द का नहीं, लेकिन काम में और सच्चाई में दिखे।

  • वह महान परमेश्वर हैं और हमारी  कमज़ोरियों, असफ़लता, गुनाहों को जानने के बावजूद भी हमे अपनी संतान के रूप में अपनाते हैं।

तो हमे भी परमेश्वर के दिखाए हुए मार्ग में चलना चाहिए नमूना होना चाहिए जिससे सिद्ध होता है हम उनके बेटे बेटी कहलाए !

परमेश्वर चाहते हैं कि वह हमेशा तक हमसे प्यार करते रहे। लेकिन हम उसका प्यार पाते रहेंगे या नहीं, ये पूरी तरह हम पर निर्भर होता है।

परमेश्‍वर का वचन हमें यह सलाह देती है, ‘खुद को परमेश्‍वर के प्यार के लायक बनाए रखो जिससे तुम्हें हमेशा की ज़िंदगी मिलेगी।’

👉(यहूदा 21) ‘खुद को लायक बनाए रखो,’ ये शब्द दिखाते  हैं कि परमेश्‍वर के प्यार के लायक बने रहने के लिए हमें कुछ करना चाहते। हमें परमेश्‍वर के लिए अपने प्यार का निश्चित सबूत देना होगा।

  • यह सच है कि यीशु ने बहुत दुःख सहा था, मगर कोई और भी था जिसने उससे भी बढ़कर दुःख झेला था। दरअसल, उसी दिन किसी और ने यीशु से भी बड़ी कुरबानी दी थी।

पूरे दुनिया में किसी ने भी प्यार की खातिर इतनी बड़ी कुरबानी देने की नमूना कायम न की थी। यह नमूना क्या था  ?

यहोवा परमेश्वर अपने आप में पूरा और आत्म-निर्भर है और उसमें ऐसी कोई कमी नहीं है जिसे कोई और पूरा कर सके।

मगर यहोवा परमेश्वर के सबसे खास गुण प्रेम ने उसे  उभारा कि वह दूसरे बुद्धिमान प्राणियों की रचना करे,

जो जीवन के वरदान का आनंद ले सकें और इसकी कदर कर सकें। “परमेश्वर की सृष्टि का मूल” उसका एकलौता बेटा था।

इंसानों के साथ भी ऐसा ही किया गया। शुरू से ही, आदम और हव्वा पर मानो प्रेम की निछावर  की गयी।

और आज परमेश्वर पर प्रेम उपहार के रूप में निछावर करते हैं

  • जी हाँ, यहोवा परमेश्वर ने शुरू से ही इंसान के लिए प्रेम दिखाने में पहला व्यक्ति  है। अनगिनत तरीकों से “पहिले उस ने हम से प्रेम किया।” जहाँ प्रेम होता है वहाँ एकता और खुशी होती है

इसलिए हम ताज्जुब की बात ना समझे यहोवा परमेश्वर को “आनंदित परमेश्वर” क्यों कहा गया है।

👉 हम क्यों यकीन रख सकते हैं कि परमेश्वर पिता की आज्ञाएँ मानने से हमारा  भला होता है, उतना किसी और व्यक्ति के बात को मानने पर भला नहीं हो पाता :

👇 यशायाह 48:17 यहोवा, जो तेरा छुड़ानेवाला और इसराएल का पवित्र परमेश्‍वर है, वह कहता है,

“मैं ही तेरा परमेश्‍वर यहोवा हूँ, जो तुझे तेरे भले के लिए सिखाता हूँ  और जिस राह पर तुझे चलना चाहिए उसी पर ले चलता हूँ।

  • क्या अब भी नहीं समझे ? हमे परमेश्वर यहोवा का भय मानने की जरूरत है परमेश्वर  यहोवा ने हमारे भले  के बारे में सोचकर ही हमें पवित्र शास्त्र के नियम दिए हैं।

वह न सिर्फ अभी के लिए, बल्कि हमेशा-हमेशा के लिए हमारी भलाई चाहता है।परमेश्वर यहोवा हमसे कुछ ऐसा करवाने की बात सोच भी नहीं सकते

जिससे हमारा नुकसान हो। वो आपको ऐसा करने को नहीं कहता जो आप नहीं कर सकते वो आपसे वोही कहता है

जो आप कर सकते हो देखिए हमारे पास बहाने बनाने को कुछ भी नहीं है क्यों की  यहोवा परमेश्वर के पास असीम बुद्धि है,

इसलिए वह जानता है कि हमारे लिए सबसे अच्छा क्या है।

👉परमेश्‍वर की आज्ञा मानने में कामयाब कैसे हो सकते हैं :-

० परमेश्‍वर की आज्ञा मानना आसान है।  “शैतान के वश  में घिरा” ये दुनिया हम पर बुरा असर डाल सकती है, इसलिए हमें इससे मुकावला करना है।

👉 [ 1 यूहन्‍ना 5:19 हम जानते हैं कि हम परमेश्‍वर से हैं, मगर सारी दुनिया शैतान* के कब्ज़े में पड़ी हुई है।]

यहोवा परमेश्वर की आशीष उन लोगों पर उतरती है जो उसकी आज्ञा मानकर अपने प्रेम का पूरा सबूत देते हैं।

जो लोग उसे अपना “सृष्टिकर्ता मालिक ” जान कर  “उसकी आज्ञाऔं को मानते हैं,” उन्हें वह अपनी पवित्र आत्मा‍ देता है।

और वोही पवित्र आत्मा हमे आज्ञाएं मानना सिखाता है ।

👉[ गलातियों 5 : 22 दूसरी तरफ पवित्र शक्‍ति का फल है: प्यार, खुशी, शांति, सब्र, कृपा, भलाई, विश्‍वास, 23  कोमलता, संयम।

ऐसी बातों के खिलाफ कोई कानून नहीं है। ] तो भायों बहनों हम पवित्र आत्मा के सहायता से परमेश्वर पिता के आज्ञाएं मान सकते हैं

और एक दूसरे से प्रेम कर सकते हैं , अच्छे व्यवहार कर सकते हैं । हमे याद रखने  कि जरूरत है के परमेश्वर यहोवा अपने पवित्र शास्त्र के नियमों

और आज्ञाओं को  समझाने-बुझाने के लिए हमारे साथ ज़ोर-ज़बरदस्ती नहीं करता। वह चाहता है कि हम सब ये खुशी-खुशी, दिल से उसकी आज्ञाओं को मानें।

हम यह भी न भूलें कि परमेश्वर पिता हमें जिस तरह जीने के लिए कह रहा है उससे न सिर्फ आज हमें ढेरों आशीषें मिलेंगी बल्कि हम हमेशा की

ज़िंदगी भी पाएँगे। तो भायों बहनों , पूरे दिल से यहोवा की आज्ञाऔं को मानें क्योंकि ऐसा करके ही हम दिखा सकते हैं कि हम उससे कितना प्रेम करते हैं।

सही क्या है, गलत क्या है, इसके बीच का फर्क समझने में परमेश्वर हमारी मदद करने के लिए  हमें परमेश्वर पिता सही ज़मीर जिसे

( विवेक भी कहते हैं ) दे चुका है जो उसके प्रेम का एक और सबूत है।  अगर हम चाहते हैं कि हमारा ज़मीर हमें सही रास्ता  दिखाए और भरोसे के लायक हो, तो हमें अपने विवेक को अभ्यास देने की ज़रूरत है।

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Amit kujur: नमस्ते दोस्तों मेरा नाम Amit Kujur हे ,में इंडिया के Odisha States के रहने वाला हूँ | आछा लगता हे जब इन्टरनेट के मदत से कुछ सीखते हैं और उसे website/blog के जरिये आपही जसे दोस्तों के बिच शेयर करना आछा लगता हे और मुझे भी सिखने को बोहुत कुछ मिलता हे | इसी passion को लेकर sikhnaasanhe.com website नाम का ब्लॉग बनाएं जहा हिंदी भाषा के आसान सब्दों में हार तरह के technology और skills related आर्टिकल जरिये मेरा जितना जो experience और knowledge हे शेयर करता हूँ |

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