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Dhan ke vare Permeswar kya kehta hai ?

Table of Contents

1.  Dhan ke vare Permeswar kya kehta hai ?

1 तीमुथियुस 6:9, 10👇

9) लेकिन जो लोग हर हाल में अमीर बनना चाहते हैं, वे परीक्षा और फंदे में फँस जाते हैं और मूर्खता से भरी और खतरनाक ख्वाहिशों में पड़ जाते हैं जो इंसान को विनाश और बरबादी की खाई में धकेल देती हैं।

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10) पैसे का प्यार हर तरह की बुराई की जड़ है और इसमें पड़कर कुछ लोग विश्‍वास से भटक गए हैं और उन्होंने खुद को कई दुख-तकलीफों से छलनी कर लिया है।

० बिली ग्राहम ने कहा था “जब धन खो जाता है, तो कुछ भी नहीं खोया; जब स्वास्थ्य खो जाता है, तो कुछ खो जाता है; जब चरित्र खो जाता है, तो सब कुछ खो जाता है।” 2. “मेरा घर स्वर्ग में है !

याकूब 5:1👇

1) हे अमीर लोगो सुनो, तुम्हारे भविष्य में तुम्हारे ऊपर जो भयंकर परेशानियाँ आने वाली हैं, उनकी वजह से रोओ और विलाप करो।

० यहाँ याकूब उन धनी और स्वार्थी लोगों से कहता है जो गरीबों को चूसते हैं। उन्हें यह फ़िकर नहीं कि धन बटोरने के बारे में प्रभु क्या कहते हैं 👉(भजन 37:16; 52:6-7; 62:10; नीति. 11:28;)

० यहाँ याकूब पुराने समय (भूतकाल) की बात कर रहा है। इसलिए नहीं कि यह संपत्ति नष्ट हो चुकी है, लेकिन यह दिखाने के लिए कि ऐसा होगा ही।

वह दुनिया के अन्त में धन-दौलत के बेकार होने को दिखाता है,वह चाहे कुछ भी क्यों न हो। लोग उन चीज़ों को यहीं छोड़ कर खाली हाथ यहाँ से जाएँगे।

याकूब को मालूम था कि सोने में काई नहीं लगती है। वह एक सच्चाई बता रहा है कि जो कुछ धनी लोग बटोरते हैं, चाहते हैं, उसमें से कुछ भी बचा न रहेगा।

० जब कि दुनिया में कितने लोग गरीब हैं, असहाय हैं भूखे मर रहे हैं, जमाखोरी अपराध है। जो पीड़ा परमेश्‍वर इन धनी लोगों पर भेजेंगे वह उनकी मज़दूरी होगी।

बाईबल गरीब, परिश्रमी और पिसे हुए लोगों के पक्ष में है। “प्रभु के कान में ”- परमेश्वर  एक ईमानदार जज है, धनी द्वारा शोषित लोगों की दोहाई उनके कान तक जाती है। परमेश्वर न्याय करेंगे ।

मत्ती 6:19-21👇

19) अपने लिए पृथ्वी पर धन सम्पत्ति मत बटोरो, जहाँ दीमक और फफूँद बिगाड़ते हैं, और जहाँ चोर सेंध लगाते और चुराते हैं।

20) लेकिन अपने लिए स्वर्ग में दौलत इकट्ठा करो, जहाँ न तो दीमक और फफूँद बिगाड़ते हैं, न चोर सेंध लगाते और न चुराते हैं।

21) क्योंकि जहाँ तुम्हारा धन है वहीं तुम्हारा मन भी लगा रहेगा।

० “दौलत”- यह एक ऐसा शब्द है जो इन्सान इस दुनिया में चाहता है, जैसे पैसा, जयवन्त या कुछ और। यह रवैया जो इन चीज़ों की तरफ़ लोगों का होना चाहिए,

“दीमक फफ़ूँद और चोर” ये शब्द चीज़ों के बर्बाद होने के स्वभाव को दिखाते हैं। ये आज यहाँ और कल कहीं और हो सकते हैं।

अगर ये चीज़ें भविष्य में न भी रहें तौभी हम स्वर्ग में किन चीज़ों को रख रहे हैं जो हमेशा ठहरने वाली हैं?

यीशु लोगों को सख्त हिदायत देते हैं कि उन्हें यहाँ जमाखोरी नहीं करनी चाहिए। ऐसा करना कहना नहीं मानना है और बेवकूफ़ी भी है।

० अफ़सोस उन पर जो अपनी हर चाह पूरा करते हैं। तुलना करें लूका 9:23 से। स्वार्थ हमेशा बर्बादी की तरफ़ ले जाता है।

० वह सब प्रतिफल जो परमेश्‍वर अपने सेवकों को देते हैं (5:12)। लोगों के लिए हमारे कृपा के काम और प्रभु की आज्ञापालन द्वारा हम उन्हें जमा करते हैं

( भजन 112:9; नीति. 19:17; ) इस धरती पर हम ऐसा कुछ कर सकते हैं जिसके प्रभाव हमेशा के होंगे। हम यहाँ के बजाए अनन्त काल के लिए जी सकते हैं।

० यीशु नहीं चाहते कि हम इस संसार और इसकी चीज़ों से प्यार करें लेकिन यह कि आसमानी बातों पर मन लगाएँ।

कुल. 3:1; 1 यूहन्ना 2:15-17 से तुलना करें। इस दुनिया में दो तरह के खज़ाने ही हमें दिखते हैं, बर्बाद होने वाले और आसमान (स्वर्ग) के खज़ाने जो नाश न होने वाले हैं। एक समझदार इन्सान क्या करेगा ?

कुलुस्सि. 3:1👇

1) इसलिए कि तुम मसीह के साथ जिलाए गए हो, तो स्वर्गिक वस्तुओं को चाहो , जहाँ परमेश्‍वर के अधिकार के साथ मसीह हैं।

० जब कि मनुष्य की ज़रूरत है नया आत्मिक जीवन  विश्‍वासी मसीह में मर चुके हैं, जिन्होंने सभी के लिए अपने प्राण दिए थे।

विश्‍वासी उनके साथ जिलाए गए। यह एक जीवित अनुभव हो गया, जब उन्हों ने विश्‍वास से यीशु को स्वीकार किया और नया जन्म पाया –

यूहन्ना 1:12-13. मसीह पूरे अधिकार के साथ स्वर्ग में हैं – इफ़ि. 1:20; फ़िलि. 2:9; इब्रा. 1:3. वहीं पर प्रत्येक विश्‍वासी के विचार और इच्छाएँ होनी चाहिए।

यीशु को खुश करने और पवित्र जीवन जीने का एक यही एक तरीका है। फ़िलि. 4:8; रोमि. 8:5 👇

फ़िलिप्पि. 4:8👇

8) अन्त में भाइयो-बहनो, जो कुछ सच है, जिन बातों में ईमानदारी है, इन्साफ़ है, जो बातें शुद्ध, प्यारी और सुनने में अच्छी हैं, उन पर ध्यान लगाओ।

यदि कोई भली और तारीफ़ के लायक बात है, उसी पर मनन करो।

० हमारे आत्मिक जीवन का हमारे दिमाग या सोचने विचारने का बड़ा सम्बन्ध है। उन्हीं पर हमारे काम निर्भर होते हैं।

उनका लगातार नवीनीकरण ज़रूरी है 👉 – रोमि. 12:2. उनके ख्याल आसमानी बातों पर होने चाहिए। देखें 👉 भजन 1:1-2. बुरी बातें, बुनियादी बातें हमारे बुरे स्वभाव को आकर्षित करती हैं।

👉गल. 5:16-17. यदि हम ऐसी बातों पर अपना सोच विचार रखेंगे, तो हमें उनकी इच्छा होगी। यदि हमारे विचार हमेशा सच्ची,

पवित्र और अच्छी बातों पर टिके रहेंगे तो हम आसानी से बुरी इच्छाओं को रद्द कर पाएँगे। हमें सावधान होना चाहिए कि हम क्या पढ़ते हैं,

क्या देखते हैं, कैसा संगीत सुनते हैं या कैसी कल्पनाएँ करते हैं जो हम यीशु के लोगों के लायक नहीं है, तो इसका असर हमारे बर्ताव और कामों पर होगा।

गलाति. 5:16-17👇

16) इसलिए मैं कहता हूँ आत्मा के द्वारा जीवन जियो तब तुम अपनी इच्छाओं के अनुसार नहीं जीओगे।

17) क्योंकि पुराना स्वभाव पवित्र आत्मा के विरोध में इच्छा रखता है और पवित्र आत्मा पुराने स्वभाव के विरोध में। ये एक दूसरे के विरोधी हैं, ताकि तुम वह सब न कर सको, जो तुम चाहते हो।

० “जीवन जियो” या “बर्ताव” या “आगे बढ़ना”- यहाँ  तक यह पौलुस का विषय है। आत्मा से उसका इशारा पवित्र आत्मा की तरफ़ है।

वही है जो मसीहियों को मसीह की तरह जीवन जीने के लिए ताकत देता है। 👉रोमि. 8:4-14 से तुलना करें।

पौलुस इन्कार नहीं करता कि बुरे स्वभाव की इच्छाएँ हम में नहीं हैं। 👉 रोमि. 7:14-25; 13:14; 👉1 यूहन्ना 1:8 भी देखें। इन बुरी इच्छाओं को काबू में किया जा सकता है।

रोमि 7:14-25👇

14) हम जानते हैं कि नियमशास्त्र आत्मिक है, किन्तु मैं आत्मिक नहीं हूँ, और अपराध के हाथ गुलाम के रूप में बिका हुआ हूँ।

15) मुझे समझ नहीं आता कि क्या करता हूँ, क्योंकि जो कुछ मैं करना चाहता हूँ वह नहीं कर पाता। लेकिन वही करता हूँ जिससे मुझे नफ़रत है ।

16) यदि मैं वह करता हूँ जो करना नहीं चाहता, मैं यह मान लेता हूँ कि मूसा द्वारा दिए नियम और आज्ञाएँ अच्छी हैं।

17) ऐसी स्थिति में इसका करने वाला मैं नहीं, लेकिन मुझ में बसा हुआ पुराना स्वभाव है । 18) मैं जानता हूँ कि मुझ में अर्थात् मेरी देह में कुछ भी अच्छा नहीं है।

जिस अच्छे काम की मैं चाह करता हूँ, वह नहीं कर पाता हूँ, जो बुरा मैं नहीं करना चाहता हूँ, वही करता रहता हूँ।

19) यदि मैं वह करता हूँ जो नहीं चाहता, तो उसका करने वाला मैं नहीं हूँ,  20) लेकिन मुझ में बसा हुआ बुरा स्वभाव है।

21) मैं यह प्रवृत्ति (गतिविधि) अपने भीतर पाता हूँ कि जब मैं भला करना चाहता हूँ, तो बुराई मुझे धर-दबोचने के लिए तैयार है।

22) मैं अपने भीतर परमेश्‍वर की बातों से खुश रहता हूँ, 23) किन्तु मेरी देह के अंगों में दूसरे कामों को देखता हूँ,

जो मेरे मन के विचारों से लड़ाई कर के मुझे मेरे अंगों में कार्य करने वाली बुरी कार्य प्रणाली का गुलाम बनाती है।

24) मैं कैसा असहाय मनुष्य हूँ, मुझे इस मौत की देह से कौन आज़ाद करेगा?

25) मैं अपने स्वामी यीशु मसीह परमेश्‍वर का धन्यवाद करता हूँ। मैं अपने मन में तो नियम और आज्ञाओं का गुलाम हूँ किन्तु बुरे स्वभाव में अपराध की प्रणाली का गुलाम हूं।

लूका 12:16-21👇

16) तब यीशु ने उन से एक दृष्टान्त कहा, “किसी रईस की ज़मीन में बड़ी फ़सल हुई।

17) तब वह सोचने लगा, कि मैं क्या करूँ, क्योंकि मेरे यहाँ जगह नहीं, जहाँ अपनी उपज रखूँ।”

18) उसने कहा, ‘हाँ, मैं एक काम कर सकता हूँ। वह यह कि मैं अपनी बखारियाँ तोड़कर बड़ी बखारियाँ बनाऊँगा और वहीं अपना सारा अनाज और सारी दौलत रखूँगा।’

19) फिर मैं अपने आप से कहूँगा, “ऐ मेरी जान, तेरे पास बहुत सालों के लिए बहुत दौलत रखी है, चैन से खा पी और सुखी रह।”

20) लेकिन परमेश्‍वर ने उससे कहा, ‘हे बेवकूफ़! इसी रात तुम मर जाओगे, तब जो कुछ तुम ने इकट्ठा किया है, वह किसका होगा?’

21) ऐसा ही वह व्यक्‍ति भी है जो अपने लिए दौलत बटोरता है, लेकिन परमेश्‍वर की निगाह में दौलतमंद नहीं है।”

० इन्सान का चालचलन उसके शब्दों से पता चल जाता है। यहाँ परमेश्‍वर के लिए कोई धन्यवाद की बात नहीं है, न ही परमेश्‍वर के काम के लिए।

दूसरों की मदद करने की भी कोई बात नहीं है। मनुष्य स्वार्थी, अपनी ही सोचने वाला और अपने मज़े की सोचने वाला है।

० वह सोचता था कि बुद्धिमान है- परमेश्‍वर उसे बेवकूफ़ समझते हैं 👉(यशा. 55:8-9)। जिन बातों को दुष्ट इन्सान अच्छा समझता है परमेश्‍वर की निगाह में वह सब घिनौना है👉 (लूका 16:15)।

स्वार्थ बेवकूफ़ी है। अपने विचारों और योजनाओं में से परमेश्‍वर को हटाना बेवकूफ़ी है। यह सोचना कि बहुत सालों तक हम अपनी मर्ज़ी से जी सकते हैं,

बेवकूफ़ी है 👉(याकूब 4:13-17)। जैसा यीशु ने कहा वैसा करना बुद्धिमानी है, 👉मत्ती 6:19-21.

लूका 16:15👇

15) तब यीशु ने उन से कहा, “तुम लोगों के सामने बहुत धार्मिक बनने की कोशिश करते हो, लेकिन परमेश्‍वर तुम्हारे मन को जानते हैं।

जिसे यह दुनिया इज़्ज़त देती है, वह परमेश्‍वर की निगाह में घिनौना है।

० यह आश्चर्य की बात है कि लोग समझते हैं कि कुछ भी करने और सोचने के लिए वे आज़ाद हैं और प्रभु जान भी नहीं पाएँगे (भजन 10:11; 64:5; 73:11; 94:7-11)।

इस आयत के आखिर हमें एक सिद्धान्त दिखता है जो तब तक सच रहेगा, जब तक बुरे लोग दुनिया में रहेंगे। परमेश्‍वर की निगाह में वे बातें घिनौनी हैं जिन्हें वे अच्छा समझते हैं।

यह विषय है -‘दौलत से प्यार’- इस रवैये से परमेश्‍वर नफ़रत करते हैं -लेकिन दूसरे अन्य दायरों में भी इस सिद्धान्त को लागू किया जा सकता, जिन्हें लोग बहुत अहमियत देते हैं।

याकूब 4:13-17👇

13) तुम जो कहते हो कि इन्हीं दिनों में और आने वाले दिनों में हम किसी दूसरे शहर जाकर एक साल व्यापार कर के कुछ कमाएँगे।

14) सच्चाई तो यह है कि तुम्हें नहीं मालूम कि कल क्या होगा, तुम्हारा जीवन है ही क्या? यह भाप की तरह है कुछ पल दिखती है, फिर गायब हो जाती है।

15) इसके बजाए तुम्हें यह कहना चाहिए कि अगर यीशु चाहें तो हम ज़िन्दा रहेंगे और यह या वह काम करेंगे।

16) लेकिन तुम तो अपनी योजनाओं के सिलसिले में घमण्ड करते हो । हर तरह का घमण्ड बुरा है। 17) इसलिए जो भलाई करना जानता है, लेकिन करता नहीं, यह गुनाह है।

० मसीहियों मे भी पायी जाती है। कुछ लोग बिना परमेश्‍वर की परवाह किए योजना बनाते हैं। यह भी कि वे बिना प्रभु की मदद अपने जीवन को बना सकते हैं।

अय्यूब 7:7; भजन 39:5; 102:3; 144:4; नीति. 27:1; 1 पतर. 1:24; लूका 12:16-20. हमें नहीं मालूम कि कल क्या होने वाला है

कौन सी प्राकृतिक मुसीबत आ जाएगी या दुर्घटना हो जाएगी और कल का दिन हमारा आखिरी दिन है। ये बिना सोचे समझे अपनी योजनाओं को पूरा करने में ध्यान लगातें हैं ।

बल की आजका दिन हमारे लिए विशेष या महत्व होना चाहिए । कल की चिंता हमें नहीं करनी चाहिए। हमें नहीं पता हमारा जीवन कब भांप की भांति चले जाए ।

आज के दिन के लिए परमेश्वर पिता जो कहते हैं उसी आज्ञा को पूरा करना चाहिए ।

याकूब 5:3👇

3) तुम्हारे सोने-चाँदी में ज़ंग लग गया है और उनका ज़ंग तुम्हारे खिलाफ गवाही देगा और तुम्हें खा जाएगा। तुमने जो बटोरा है वह आखिरी दिनों में आग जैसा होगा।

मत्ती 13:22👇

22) जो काँटों के बीच बोया गया है, यह वह इंसान है जो वचन को सुनता तो है, मगर इस ज़माने की ज़िंदगी की चिंता और धोखा देनेवाली पैसे की ताकत वचन को दबा देती है और वह फल नहीं देता।

लूका 12:20👇

20) मगर परमेश्‍वर ने उससे कहा, ‘अरे मूर्ख, आज रात ही तेरी ज़िंदगी तुझसे छीन ली जाएगी। फिर जो कुछ तूने बटोरा है वह किसका होगा?’

मत्ती 19:21👇

21) यीशु ने उससे कहा, “अगर तू चाहता है कि तुझमें कोई कमी न हो, तो जा और अपना सबकुछ बेचकर कंगालों को दे दे, क्योंकि तुझे स्वर्ग में खज़ाना मिलेगा और आकर मेरा चेला बन जा।”

मरकुस 10:21👇

21) यीशु ने प्यार से उसे देखा और कहा, “तुझमें एक चीज़ की कमी है: जा और जो कुछ तेरे पास है उसे बेचकर कंगालों को दे दे क्योंकि तुझे स्वर्ग में खज़ाना मिलेगा और आकर मेरा चेला बन जा।”

लूका 12:33, 34👇

33) इसलिए अपनी चीज़ें बेचकर गरीबों को दान कर दो। अपने लिए पैसे की ऐसी थैलियाँ बनाओ जो कभी पुरानी नहीं होतीं, यानी स्वर्ग में ऐसा खज़ाना जमा करो जो कभी खत्म नहीं होता,

जहाँ न कोई चोर पास फटकता है, न कोई कीड़ा उसे खाता है। 34) क्योंकि जहाँ तुम्हारा धन होगा, वहीं तुम्हारा मन होगा।

लूका 18:22👇

22) यह सुनकर यीशु ने उससे कहा, “तुझमें अब भी एक चीज़ की कमी है: जा और जो कुछ तेरे पास है सब बेचकर कंगालों में बाँट दे और तुझे स्वर्ग में खज़ाना मिलेगा और आकर मेरा चेला बन जा।”

1 तीमुथियुस 6:17👇

17) जो इस ज़माने में दौलतमंद हैं उन्हें हिदायत दे कि वे घमंडी न बनें और अपनी आशा दौलत पर न रखें जो आज है तो कल नहीं रहेगी,

बल्कि परमेश्‍वर पर रखें जो हमें बहुतायत में वह सारी चीज़ें देता है जिनका हम आनंद उठाते हैं।

० यह एक अजीब और भयानक सच्चाई है कि लोग जो आज यहाँ हैं, कल नहीं रहेंगे वे पैसा या जायदाद हासिल करने के लिए किसी भी परमेश्‍वर के नियम को अपने पैरों से कुचल सकते हैं।

सच पूछें तो उनके मन में पागलपन है (सभो. 9:3)।

लूका 9:23👇

23) तब यीशु ने सब लोगों से कहा, “अगर कोई मुझे मानना चाहे, तो अपनी मनमानी करना छोड़ दे, हर दिन अपना क्रूस उठाए और मेरे कहने अनुसार करे।

सभोपदेशक 9 : 4,5,6👇

4) जब तक एक इंसान ज़िंदा है, तब तक उसके लिए उम्मीद है क्योंकि एक ज़िंदा कुत्ता मरे हुए शेर से अच्छा है।

5) जो ज़िंदा हैं वे जानते हैं कि वे मरेंगे, लेकिन मरे हुए कुछ नहीं जानते। और न ही उन्हें आगे कोई इनाम मिलता है क्योंकि उन्हें और याद नहीं किया जाता।

6) उनका प्यार, उनकी नफरत, उनकी जलन मिट चुकी है और दुनिया में जो कुछ किया जाता है उसमें अब उनका कोई हाथ नहीं।

० परमेश्वर पिता के वचन हमें यह आदेश देती है हमें  कड़ी मेहनत करने की जरूरत है । क्यों कि हमें अपनी और अपने घर परिवार वालों के जरूरतें पूरी कर सकें।

इसलिए हमें जब मौका मिलता है ईमानदारी से काम करे अपने सम्मान की रक्षा के लिए , इस रीति से हमें आत्मा के अंदर से संतुष्टी भी मिलती है और इससे सुरक्षित भी मेहसुस कर सकते हैं हम ।

1 तीमुथियुस 5:8👇

8) बेशक अगर कोई अपनों की, खासकर अपने घर के लोगों की देखभाल नहीं करता, तो वह विश्‍वास से मुकर गया है और अविश्‍वासी से भी बदतर है।

सभोपदेशक 3:12, 13👇

12) मैं इस नतीजे पर पहुँचा हूँ कि इंसान के लिए इससे अच्छा और कुछ नहीं कि वह ज़िंदगी में खुश रहे और अच्छे काम करे।

13) साथ ही, वह खाए-पीए और अपनी मेहनत के सब कामों से खुशी पाए। यह परमेश्‍वर की देन है।

2.  हम धन से खुद को केसे बचा सकते हैं ? और यीशु मसीह के पक्के दोस्त केसे बन सकते हैं  ? 👇

लूका 14:26-27👇

26) “जो कोई मेरा शिष्य बनना चाहता है, उसे चाहिए कि वह अपने पिता, माता, पत्नी, बच्चों या भाईयों यहाँ तक कि अपने जीवन से ज़्यादा मुझ से लगाव रखे – नहीं तो वह मेरा शिष्य नहीं हो सकता।

27) जो कोई अपना क्रूस उठा कर मेरी सुनकर जीना नहीं चाहता, वह मेरे लायक नहीं हैं।

० शिष्य के मन में यीशु पहली जगह चाहते हैं।👉 देखें मत्ती 10:37. क्रम इस तरीके का है। पहले मसीह, फिर दूसरे और आखिर में खुद स्वयं। बहुत से यीशु के लोगों में यह क्रम बिल्कुल उल्टा है।

पहले खुद, फिर अन्य लोग, और सब से आखिर में यीशु, या यीशु की कोई जगह नहीं।  “अपने पिता , माता, पत्नी, बच्चों या भाईयों यहाँ तक कि

अपने जीवन से ज़्यादा  मुझ से लगाव  रखे ”  ज़रूरत पड़ने पर यीशु की बातों को मानने की वजह से हमें अपने रिश्तेदारों को छोड़ना पड़ सकता है।

वह मेरा शिष्य नहीं हो सकता ऐसा सोचना है। एक सच्चा विश्‍वासी ही सच्चा शिष्य हो सकता है। जो लोग बिना शिष्य बने, विश्‍वासी ही बने रहना चाहते हैं, वे न यीशु और न उनकी शिक्षा से प्रेम रखते हैं।

अगर वे यीशु और उनकी शिक्षा से प्रेम नहीं रखते हैं, क्या अपने आप को विश्‍वासी कहना बेकार नहीं है ? इसे हम इस अध्याय में पाते हैं 👉 1 कुरि. 16:22

० प्रभु के लिए प्रेम का अभाव आत्मिक मृत्यु का सबूत है। यदि हम मसीह से प्रेम नहीं कर सकते या नहीं करते, तो हम दिखाते हैं कि हम भ्रष्ट हैं। हम अपने अपराधों में फँसे हैं और परमेश्‍वर की सज़ा के लायक हैं। प्रभु यीशु मसीह के सम्बंध में हमारे मनों की स्थिति सब से अधिक मायने रखती है।

लूका 9:25,26👇

25) यदि इन्सान सारी दुनिया को पा ले और अपनी आत्मा को खो दे या उसका नुकसान उठाए, तो उसे क्या फ़ायदा होगा।

26) जो कोई मुझ से और मेरी बातों से इस दुनिया में शर्माएगा, मैं भी अपनी, अपने पिता और पवित्र स्वर्गदूतों की शान के साथ आऊँगा, तो उससे शर्माऊँगा।

परमेश्वर पिता को किस बात से ख़ुशी मीलती है ? और हमें क्या करने की जरूरत है ? आईए देखते हैं ?👇

2 कुरिन्थ. 9:7👇

7) हर एक जन जैसा मन में इरादा करता है, उसी तरह से दान दे, न ही कुढ़-कुढ़ के, न दबाव से, क्योंकि परमेश्‍वर प्रसन्नता से देने वाले से प्रेम करते हैं।

० यदि हम किसी को कुछ देते हैं तो ; हमारा हांथ खुला होना चाहिए आनंद से देना है दुःखी होकर नहीं या किसी के दबाव में आकर बिलकुल भी नहीं देना है ।

परमेश्वर पिता को सब कुछ पता चल जाता है। क्यों की हमें रचने वाले परमेश्वर को हमारी दिल की हालत के बारे में सब पता चल जाता है।

हमे अफ़सोस करके कुछ भी नहीं देना है परन्तु खुले दिल से देना होगा। आज हमारे पास जो भी कुछ है वो परमेश्वर के बदलोत मिलता है।

इसलिए मेरे भायों बहनों हमें जरूरत मंदी लोगों को देना है और प्रभु को आनंदित करना है । पर हमें एक और बात पर ध्यान देना होगा जब हम किसी को मदत करते हैं

प्रभु यीशु के नाम से  मदत करे ना की अपनी तारिफ पाने के लिए । हम चाहे भेंट दे या धन से मदत करे प्रभु की महीमा के लिए करे ।

अगर हम में प्रभु का प्रेम है तो दान देना सांस लेने से भी ज्यादा आसान होगा ।

3.  भले आदमी के पास धन की कमी क्यों नहीं होती ? और वो कोन से व्यक्ति हो सकतें हैं ?👇

2 कुरिन्थ. 9:8👇

8) परमेश्‍वर सब तरह का अनुग्रह तुम्हें भरपूरी से दे सकते है। तब हर समय, सब कुछ जो तुम्हारी ज़रूरत है, पूरी होगी और हर एक भले काम के लिए तुम्हारे पास बहुत कुछ होगा।

० जो लोग अपनी खुशी से दूसरों को देते हैं उनके पास धन की कमी नहीं होती है। ऐसे इंसान कभी नूकसान नहीं उठाएंगे ।

परमेश्वर पिता दुनिया के शासक हैं । मनुष्य की योजनाएँ, लक्ष्य, भूमि, मौसम, अर्थव्यवस्था और दूसरी बातें जो आर्थिक रीति से किसी को बना सकती हैं और तोड़ सकती हैं उनके हाथों में हैं।

वह उन परिस्थितियों को उन लोगों की भलाई के लिए उपयोग कर सकते हैं, जिनसे वह प्रेम करते हैं। यदि वह चाहें, उनके लिए आश्चर्यकर्म कर सकते हैं – 1 राजा 17:10-16; 2 राजा 4:1-7.

० साधारणतया वह लोगों को सामान्य तरीकों से आशीष देते हैं। वह लोगों और परिस्थतियों का इस्तेमाल उनकी सम्पन्नता बढ़ाने के लिए और ऐसी मुसीबतों से रक्षा करने में जो गरीबी लाती हैं, करते हैं।

वह यह जानते हैं कि अपनी दया किस प्रकार उण्डेलें  ताकि वे आत्मिक और भौतिक रीति से तरक्‍की करें।

० आशीष देने के पीछे उनका उद्देश्य यह है, ताकि उनके पास दूसरों के लिए बहुत कुछ हो। आशीषित होने पर यदि वे ऐसा रवैया नहीं रखते तो परमेश्‍वर उन से वे आशीषें छीन सकते हैं।

4.  बाईबल के मुताबिक परमेश्वर पिता किस तरह के लोगों के कामों को हमेशा से याद रखते हैं ? 👇

2 कुरिन्थ. 9:9👇

9) जैसा कि लिखा है, “उसने बहुत दूर बिखराया, उसने गरीबों को दिया, उसके अच्छे कामों को हमेशा तक याद किया जाएगा।

० आनन्द से और बड़े मन से देने वाले व्यक्ति से परमेश्‍वर कभी उनके कामों को नहीं भूलेंगे। परमेश्‍वर उन्हें भौतिक रीति से आशीष देंगे उनके द्वारा परमेश्‍वर के लोगों की आवश्यकताएँ पूरी होंगी ।

वे मसीह के सुसमाचार के प्रति आज्ञाकारिता का सबूत देंगे । अपनी प्रार्थनाओं में दूसरे लोग बड़े प्रेम से याद करेंगे उनके कारण परमेश्‍वर को धन्यवाद और स्तुति मिलेगी।

यह तीसरा परिणाम, जिसे तीन बार दोहराया गया है पौलुस के लिए सब से अधिक महत्वपूर्ण था। प्रत्येक बात में परमेश्‍वर को इज़्ज़त मिलना उसका सब से बड़ा लक्ष्य था (1 कुरि. 10:31)।

परमेश्‍वर को आदर तब मिलता है, जब उनके लोग वैसा जीवन जीते हैं, जैसा जीना चाहिए, वैसी स्तुति करते हैं जैसी करनी चाहिए।👉

1 कुरिन्थ. 10:31 इसलिए जो तुम खाओ, पियो या करो सब कुछ परमेश्‍वर के सम्मान (प्रशंसा, इज़्ज़त) को बढ़ाने के लिए करो।

० पौलुस एक सिद्धान्त देता है जिससे विश्‍वासी के प्रत्येक कार्य को दिशा मिलनी चाहिये। यहाँ पर सर्वोच्च संभव उद्देश्य को बताया गया है।

यदि सभी विश्‍वासी इस सिद्धान्त के अनुसार जियें तो चर्च में पार्टीबाज़ी और फूट नहीं होगी; दूसरों पर दोष लगाना, अनैतिकता, बिना विचार किए कोई कार्य करना,

जिससे दूसरों को चोट लगे, आदि भी नहीं किया जाएगा। यदि हमारे जीवन के प्रत्येक कार्य को हम इस पद के आधार पर मापें, तो जिन बातों को हम नुकसान रहित समझते थे, हम नहीं करेंगे।

परमेश्‍वर जो बोनेवाले को बहुतायत में बीज देता है और खानेवाले को रोटी देता है, वही तुम्हें बोने के लिए बहुतायत में बीज देगा और तुम्हारी नेकी की फसल खूब बढ़ाएगा।

० परमेश्‍वर ऐसा कर सकते हैं। पौलुस कहता है, कि यदि वे खुश रहेंगे, दिल से देंगे, परमेश्‍वर आशीष देंगे। 👉 1 तीमु. 6:6-8 के आधार पर हमें स्वार्थ के लिए धनी नहीं होना है।

यदि हम सम्पन्नता की कामना करते हैं तो इसलिए कि हम परमेश्‍वर और उनके लोगों के लिए अधिक कर सकें।

5.  परमेश्वर पिता ने हमें कोन बातों में सन्तोष करने को कहा है ? 👇

1 तीम. 6:6-8👇

6) लेकिन शान्ति (सन्तोष) के साथ आत्मिक जीवन बड़ी कमाई है।

7)  क्योंकि न हम जगत में कुछ लाए हैं और न कुछ ले जा सकते हैं।

8)  यदि हमारे पास खाने और पहनने को हो, तो इन्हीं पर सन्तोष करना चाहिए।

० मसीह के विश्‍वासी को पहले भौतिक वस्तुओं में नहीं, किंतु आत्मिक बातों में धनी होना चाहिये। इसी में उनका अनन्तकालीन लाभ👉 (मत्ती 6:19-21) है।

परमेश्‍वर पर भरोसा रखने से संतोष मिलता है। सन्तुष्ट रहने का मार्ग यह है कि हम भरोसा करें कि परमेश्‍वर ने हमें सर्वोत्तम स्थान, पद और परिस्थिति में रखा है।

उन्हों ने हमें वह सब दिया है, जिसकी हमें ज़रूरत है, न कम, न अधिक।

संतोष हमें शिकायत करने और लोभी इच्छाओं के (जो मूर्ति पूजा के बराबर है) पीछे जाने से बचाता है – 👉इफ़ि. 5:5; 👉कुल. 3:5. इस से हम भौतिक वस्तुओं के द्वारा नियंत्रित नहीं किये जाएँगे।

परमेश्‍वर के जन के लिये संतोष एक आवश्यक तत्व है। संतोष नहीं रखना हमारे प्रति परमेश्‍वर के मार्गों और व्यवहार की आलोचना करता है।

यह परमेश्‍वर के प्रति कुड़कुड़ाने के अपराध की ओर ले जाता है (निर्ग. 14:11-12; 15:22-24; 16:2-3,8; गिनती 14:3)।

० पौलुस का अर्थ उन बातों से है जो जीवन के लिये सचमुच में ज़रूरी हैं। यहाँ वह अपने घर होने तक की बात नहीं करता है

संभवतः इसलिए कि इस पृथ्वी पर व्यक्‍ति सारे जीवन भर बिना घर के रह सकता है। उनके दिल खोल कर देने से उनका प्रेम और आज्ञाकारिता दिखायी दी। न देना इसके विपरीत की स्थिति दिखाता है।

नीतिवचन 3:9👇

9) अपनी अनमोल चीज़ें देकर यहोवा का सम्मान करना, अपनी उपज का पहला फल* चढ़ाकर उसका आदर करना,

6.  परमेश्वर पिता धन को दूसरों के फायदे के लिए  किस तरह इस्तेमाल करने को केहते हैं ? 👇

लूका 16:9👇

यह सीखो, अपने संसारिक साधनों का इस्तेमाल दूसरों के फ़ायदे के लिए और दोस्त बनाने के लिए करो। ताकि जब-जब तुम्हारी दुनियावी दौलत खत्म हो जाए, वे लोग स्वर्ग में तुम्हारा स्वागत करें।

० यहाँ यीशु चाहते हैं कि हम एक सीख हासिल करें। रोशनी के लोगों को चाहिए कि अपनी सांसारिक चीज़ों का इस्तेमाल बुद्धिमानी से करें ताकि दूसरों की मदद हो सकें।

जिनकी हम यहाँ मदद करेंगे, वही स्वर्ग में हमारा स्वागत करेंगे। इसका मतलब यह नहीं है कि हम दूसरों की आर्थिक मदद करने से गुनाहों की माफ़ी

और स्वर्ग को प्राप्त कर सकते हैं (देखें इफ़ि. 2:8-9; तीतुस 3:5-6)। इसका मतलब यह भी नहीं है कि हम स्वर्ग में दौलत जमा कर सकते हैं (तुलना करें मत्ती 6:19-21; 25:34-40; भजन 112:5-6,9; इब्रा. 6:10)।

“दुनियावी दौलत (अधर्म का धन)”- यहाँ अनुचित तरीके से कमाए धन की बात नहीं की जा रही है। यहाँ इसका मतलब है वह दौलत जो इस बुरे संसार में हासिल की जाती है।

हर चीज़ जो इस बुरी दुनिया से जुड़ी है, किसी न किसी सीमा तक इस दुनिया के बुरेपन से जुड़ी है।

7.  परमेश्वर पिता हमें किन बातों में ईमानदार होने को केहते हैं ? और कैसे ? 👇

लूका 16:10👇

10) अगर तुम छोटी बातों में ईमानदार हो, तो बड़ी बातों में भी रहोगे। लेकिन अगर तुम छोटी बातों में बेईमान हो तो, तुम्हें बड़ी ज़िम्मेदारियाँ कौन देगा?

लूका 16 :11👇

11) अगर तुम धन दौलत के मामले में भरोसेमंद नहीं हो, जो प्रायः गलत तरीके से कमाया जाता है, तो सच्ची दौलत के लिए तुम पर कौन भरोसा करेगा?

० ऐसा कोई न समझे कि यीशु बेईमानी के पक्ष में कहते रहे थे, यीशु एक खास सिद्धान्त सामने लाते हैं।

एक व्यक्‍ति का चालचलन बड़ी-बड़ी बातों के साथ छोटी-छोटी बातों में भी दिखता है। देखे 👉 मत्ती 25:21-23 में किस तरह से यीशु हमारी ज़िन्दगी में लागू करते हैं।

हम पैसे का क्या करते हैं इस सम्बन्ध में सदा हमारी परख होती है। कुछ मसीही सोचते हैं कि अगर वे सही सिद्धान्तों को जानते हैं, यही काफ़ी है, चाहे वे चोरी करें, झूठ बोलें या धोखा दें।

यह खतरनाक सोच है। अगर किसी की ज़िन्दगी में बेईमानी है, तो क्या हम मानेंगे कि सच्चे यीशु से उसका सम्बन्ध है – 👉यूहन्ना 14:6? यीशु से प्यार का मतलब सच से प्रेम।

यीशु पूरी ईमानदारी और सच्चाई से खुश होते हैं – 👉1 कुरि. 4:1-2. भविष्य में परमेश्‍वर के राज्य में एक विश्‍वासी का पद इस बात पर निर्भर है कि इस दुनिया में वह कैसे जी रहा है।

जो लोग अभी धन के सम्बन्ध में बेईमान हैं, उन्हें काफ़ी नुकसान भविष्य के राज्य में उठाना पड़ सकता है।

० सच्ची दौलत आत्मिक उन्नति को कहते  हैं, हमेशा की है, परमेश्‍वर के राज्य की है। जो उन्हें सुपुर्द करता है या नहीं, वह परमेश्‍वर ही है।

अगर हमारे पास धन की कमी नहीं है तो वो धन परमेश्वर पिता ने दी है ; अगर जरूरत से कम धन है वो भी परमेश्वर पिता ने हमें दी है ।

इस लिए अपने पास जो धन है उसिमें संतोष करने की जरूरत है।

6.  पैसे के लोभ से केसे बचे रहे ? और परमेश्वर पिता के बुद्धि पैसों के तुलना में क्यों बड़ कर है ? 👇

1 तीमुथियुस 6 :10 👇

10 पैसे का प्यार हर तरह की बुराई की जड़ है और इसमें पड़कर कुछ लोग विश्‍वास से भटक गए हैं और उन्होंने खुद को कई दुख-तकलीफों से छलनी कर लिया है।

लूका 16:13👇

13) कोई नौकर दो मालिकों की सेवा नहीं कर सकता, क्योंकि या तो वह एक को कम चाहेगा, दूसरे को ज़्यादा, या एक से मिला रहेगा और दूसरे को तुच्छ समझेगा।

तुम परमेश्‍वर और दौलत, दोनों ही की सेवा नहीं कर सकते।”

० यहाँ लूका में दुनियावी चीज़ों के सही इस्तेमाल और विश्‍वासयोग्यता की बात है। ईमानदार और अक्लमन्द होने का एक रास्ता है।

यह कि परमेश्‍वर को अपनी ज़िन्दगी का मालिक बनाएँ, दौलत को मालिक न बनाएँ।  “दौलत” यह उस शब्द से अनुवादित है जिसका मतलब है, खज़ाना या धन।

यह उस तरफ़ इशारा है जिसे लोग इस दुनिया में कीमती समझते हैं। इसी वजह से लोग झूठ बोलते, धोखा देते, चोरी करते और अपनी जान खो देते हैं।

सिर्फ़ दो ही मालिक हैं – शैतान या परमेश्‍वर। जो यीशु मसीह का कहलाने वाला, धन या दुनियावी दौलत की किसी तरह सेवा करता है

और मसीह की सेवा करने का दावा करता है, धोखे में है या झूठा है। परमेश्‍वर की सेवा हमेशा के लिए पूरी तरह से किसी और सेवा के खिलाफ़ है।

अलग-अलग देशों में अलग परमेश्‍वर और मूर्तियाँ हैं लेकिन दौलत सभी का परमेश्‍वर है। सब जगह लोग इसे पसन्द करते, शीश नवाते, और सेवा करते हैं।

जिस तरह से दूसरे लोग मूर्तियों को पूजते हैं, यीशु के शिष्यों को नहीं करना चाहिए (तुलना करें👉 कुल. 3:5; 1 यूहन्ना 5:21; लूका 14:33)।

लूका 16:14👇

14) फ़रीसियों ने जब यह बातें सुनीं, जिनका धन दौलत से बहुत ज़्यादा लगाव था, तो यीशु की हँसी उड़ाने लगे।

० जैसा कि आज भी बहुत से लोग हैं, ये फ़रीसी परमेश्‍वर के बेटे से सीखने के बजाए यीशु से खिसिया रहे थे। दौलत उनका मालिक बन चुकी थी।

वे सोचते थे कि यह अच्छी बात है। पैसा अच्छा नौकर है लेकिन बुरा मालिक।

1 तीमुथियुस 6 : 11 👇

11 मगर हे परमेश्‍वर के सेवक, तू इन बातों से दूर भाग। इसके बजाय नेकी, परमेश्‍वर की भक्‍ति, विश्‍वास, प्यार, धीरज और कोमलता का गुण पैदा करने में लगा रह।

० मसीही के प्रत्येक सेवक को धन संपत्ति लोभ की परीक्षा से भागना चाहिये। यदि ऐसा नहीं होता है तो वे शैतान के चंगुल में फँस जाएँगे ।

हम सभी अपनी पीठ उसकी ओर करें और उस धन संपत्ति की – परमेश्‍वर के आत्मा के फल👉(गल. 5:22-23) लालसा करें को जिसकी बात पौलुस करता है।

यदि हम ऐसा करेंगे तो हमें जीवन की ज़रूरतों के विषय में परेशान नहीं होना पड़ेगा👉 (मत्ती 6:23; फ़िलि. 4:19)। हमें संतोष भी मिलेगा।

सभोपदेशक 5:10👇

10 जिसे चाँदी से प्यार है उसका मन चाँदी से नहीं भरता, वैसे ही दौलत से प्यार करनेवाले का मन अपनी कमाई से नहीं भरता।+ यह भी व्यर्थ है।

० संतुष्टि लाने के बजाय, अधिक से अधिक धन अधिक से अधिक चिंता पैदा करता है। ये शब्द किसी गरीब व्यक्ति द्वारा नहीं, जो अमीरों को ईर्ष्या करते थे,

बल्कि एक सबसे अमीर व्यक्ति द्वारा लिखा गया था।

सभोपदेशक 5:12,13👇

12) मज़दूरी करनेवाले को मीठी नींद आती है फिर चाहे उसे थोड़ा खाने को मिले या ज़्यादा। लेकिन रईस की बेशुमार दौलत उसे सोने नहीं देती।

13) दुनिया में मैंने एक ऐसी बात देखी जो बड़ा दुख पहुँचाती है: जमा की गयी दौलत अपने ही मालिक के लिए मुसीबत बन जाती है।

० धन इस दुनिया में भी स्थायी नहीं है, और जब आदमी मर जाता है तो दुनिया से कुछ भी नहीं निकाल के ले जा सकता है।

एकमात्र धन जिसे हम हमेशा के लिए रख सकते हैं, वे हैं जो हम दूसरो को देते हैं।👉 मत्ती 6: 19-20 देखें; लूका 12:33; 18:22)।

स्वार्थ का विनाश आत्म-विनाश में होगा और स्वार्थी मनुष्य की हर चीज का नुकसान खुद के लिए ही होता है।

भजन 49:6, 7👇

6) जो अपने धन पर भरोसा रखते हैं, अपनी दौलत के अंबार पर शेखी मारते हैं, 7) उनमें से कोई भी अपने भाई को हरगिज़ नहीं छुड़ा सकता, न ही उसके लिए परमेश्‍वर को फिरौती दे सकता है ।

० कोई भी धन किसी व्यक्ति को स्थायी रूप से जीवित नहीं रखेगी, कोई जमा किया हुआ धन मृत्यु से दूसरे को भुना नहीं सकती है।

फिर इन दुष्टों के धन का क्या मूल्य है? यद्यपि यह उन्हें पृथ्वी पर उनके संक्षिप्त समय के लिए और अधिक आरामदायक बना सकता है, यह अनंत काल में उनकी मदद नहीं कर सकता है।

पैसों के लोभ इंसान को परमेश्वर के बिना मंजूरी पर हर बुरी आदतें इच्छाएं पूरी कर लेतें हैं ।

यहोशू 7:1👇
  • इसराएलियों ने नाश के लिए ठहरायी चीज़ों के बारे में परमेश्‍वर की आज्ञा तोड़कर विश्‍वासघात किया। आकान ने उन चीज़ों में से कुछ चीज़ें ले ली थीं।
  • इसलिए यहोवा का क्रोध इसराएलियों पर भड़क उठा। आकान यहूदा गोत्र से था, वह करमी का बेटा था, करमी जब्दी का और जब्दी जेरह का।

० “अनुचित तरीके से काम किया” – एक व्यक्ति ने पाप किया लेकिन परमेश्वर ने पूरे देश को जिम्मेदार ठहराया। परमेश्वर अपने लोगों को एक एकता के रूप में देखता है।

एक का पाप सभी और सभी की जिम्मेदारी को प्रभावित करता है । कोई भी अपने लिए अकेला नहीं रहता।

हमारे कार्य हमेशा दूसरों को अच्छे या बुरे के लिए प्रभावित करते हैं (तुलना करें👉  रोम, 7, 13; 1 कुरिं 5: 1-2, 6; 12; 26-27)।

2 तीमुथियुस 3:1, 2👇
  • यह भी जान लो, कि अन्‍त के दिनों में बहुत विपत्ति के दिन आयेंगे। 2 ✽लोग स्वयं से प्रेम करने वाले✽ और धन के लोभी✽,
  • अपनी ही डींग हाँकने वाले, घमण्डी, परमेश्‍वर के विरोध में कहने वाले, माता-पिता की बात टालने वाले, धन्यवाद न देने वाले और अशुद्ध,

० इस युग के अन्त का समय। आरम्भ से ही भयंकर समय रहे हैं।  लोग इस पृथ्वी पर रहे हैं।👉 रोमि. 1:28-32 से तुलना करें।

पौलुस का मतलब यह है कि दिन और बुरे हो जाएँगे और इस तरह के लोग पृथ्वी पर कलीसिया में दिखेंगे।

इन भयानक समयों में खतरनाक लोग होंगे, लेकिन गलत बातों के प्रेमी उनका चरित्र परमेश्‍वर के वचन की सत्य शिक्षा के विरोध में होगा “वे अपने आप के प्रेमी होंगे”।

० धन के सम्बन्ध में आज्ञाकारिता को अपनाने और किसी बात को त्यागने में रूचि नहीं होगी। वे अपने रवैये और

कामों से दिखा देंगे कि उन में परमेश्‍वर का प्रेम नहीं है👉 (1 यूहन्ना 2:15-16; मत्ती 22:37-40; 1 कुरि. 13:1-3; 16:22. इस कारणवश वे सब

और दूसरी बुराईयाँ जिनका यहाँ वर्णन है उनके मन में भरी रहेंगी। वे इन पर घमण्ड करेंगे। उनके डाँटे जाने पर वे गाली देंगे।

रोमि. 1:21 के समान उन में भी धन्यवाद नहीं होगा। दूसरों को माफ़ न करने से वे दिखाऍगे कि उनके भीतर सृजनहार की सी क्षमा नहीं है।

विश्‍वासी लोग उन पर और उनकी बातों पर भरोसा न रख सकेंगे। हालाँकि वे आत्मिक रीति से अन्धे और अज्ञान होंगे वे सोचेंगे कि उन्हें सब आता है। वे सच्चे सिखाने वालों की न सुनेंगे।

1 तीम. 6:10👇

10) क्योंकि पैसों का लोभ सब तरह की बुराइयों की जड़ है, जिसे पाने की कोशिश करते हुए कई लोग विश्‍वास से भटक गए और अपने आप को तरह-तरह के दुखों से पीड़ित कर दिया है।

० धन का प्रेम सारी बुराइयों की जड़ है। क्योंकि यह परमेश्‍वर और आत्मिक बातों से हटाकर भौतिक बातों में लगा देता है।

मत्ती 6:22-24. धन से प्रेम परमेश्‍वर से घृणा करना है। यदि हम मत्ती 22:37 में दी गई आज्ञा को मानें तो हमारे मन में धन के प्रति कोई स्थान नहीं होगा।

दूसरी ओर, यदि हम धन के प्रेम को अपने ऊपर शासन करने देंगे, तो हमारे भीतर परमेश्‍वर के प्रति प्रेम के लिये कोई स्थान न होगा।

अनेक बुराइयों में एक (सब से प्रमुख) दुष्टात्माओं के रूप में यहूदा इस्करियोती को भी धन के प्रेम ने गिराया👉 (यूहन्ना 6:70-71; 12:6; मत्ती 26:14-16)।

नीतीवचन 2:12👇

12)  क्योंकि जिस तरह पैसा हिफाज़त करता है, उसी तरह बुद्धि भी कई चीज़ों से हिफाज़त करती है। मगर ज्ञान और बुद्धि इस मायने में बढ़कर हैं कि वे अपने मालिक की जान बचाते हैं।

नीतिवचन 3:18👇

18) जो बुद्धि को थामते हैं, उनके लिए यह जीवन का पेड़ है, जो इसे थामे रहते हैं, वे सुखी माने जाएँगे।

धन के प्रेमी किस तरह के परीक्षा या प्रलोभन में पड़ सकता है ?👇

मत्ती 26:14-16👇

14) तब यहूदा इस्करियोती, जो उन बारहों में से एक था, प्रधान पुरोहित के पास जाकर कहने लगा, 15) “मैं खुद यीशु को तुम्हारे हाथों में सुपुर्द कर दूँगा, तुम मुझे क्या दोगे?”

उन्हों ने उसे चाँदी के तीस सिक्के देना मंज़ूर कर लिया। 16) उसी समय से वह यीशु को पकड़वाने का मौका ढूँढने लगा।

० अचानक ही यहूदा इस प्रलोभन (लालच) में नहीं फँस गया। वह समझबूझ कर योजना बना रहा था। इसका मतलब यह है कि कोई भी इंसान पहले पाप नहीं गिरता

उस पाप को करने के लिए मन ही मन विचार करता है उसके बाद योजनाएं बनाता है ; फिर उस पाप को अंजाम देता है ।

इसलिए प्रभु यीशु ने आज्ञा दी है सबसे पहले अपनी मन की रक्शा कर क्यों की मूल पाप का जड़ उस हृदय की कोठरी में योजनाएं शुरू होती है।

लूका 16 : 19-31👇

19) यीशु ने कहा, “एक अमीर आदमी था जो बढ़िया और मँहगे कपड़े पहनता और ऐश किया करता था।

20) और लाज़र नाम का एक भिखारी भी था जिसकी देह पर फोड़े ही फोड़े थे और वह अमीर आदमी के दरवाज़े पर पड़ा रहता था।

21) उस अमीर आदमी की मेज़ से गिरी जूठन खा कर लाज़र अपना पेट भर लिया करता था।

22) वह समय आया, जब वह गरीब इस दुनिया से चल बसा और फ़रिश्तों (स्वर्गदूतों) ने उसे अब्राहम की गोद (स्वर्ग) में पहुँचा दिया। अमीर आदमी भी मर गया। और दफ़ना दिया गया।

23)  वह नरक की पीड़ा से तड़प उठा और उसने आँख उठायी तो लाज़र को स्वर्ग में बैठा देखा।

24) चिल्लाते हुए उसने अब्राहम से कहा, “पिता अब्राहम, मुझ पर कृपा करें और लाज़र को भेजें कि वह पानी से भीगी अपनी उँगली मेरी जीभ पर रख कर उसे ठंडा करे,

क्योंकि मैं आग की सी लपटों में झुलस रहा हूँ।”

25) लेकिन अब्राहम ने कहा, “बेटा, तुम्हारे जीवन काल में तुम ने अच्छी चीज़ों का मज़ा उड़ाया और लाज़र तंगी और अभाव में जीता रहा लेकिन अब वह मज़े में है और तुम तकलीफ़ में।

26) इसके अलावा तुम्हारे और हमारे बीच में एक बड़ी दूरी है, इस वजह से, उधर से इधर कोई आ जा नहीं सकता।”

27,28) तब उसने कहा, “मैं आप से याचना करता हूँ कि आप लाज़र को मेरे घर भेज कर पाँच भाइयों को चिताएँ, ताकि वे इस पीड़ा की जगह आने का फ़ैसला न करें।”

29) अब्राहम ने उससे कहा, “उनके पास मूसा और भविष्यद्वक्‍ताओं की तालीम है। वे उन को सुनें।”

30) तब वह बोला, “नहीं, पिता अब्राहम, अगर मरे हुओं में से कोई उनके पास जाएगा तो वे उसकी सुनेंगे।”

31) तब अब्राहम ने अमीर व्यक्‍ति से कहा, “जब वे मूसा और नबियों की बातें नहीं सुनते, तो यदि मरे हुओं में से कोई जी उठ कर उन्हें बताएगा, तो वे उसकी क्यों सुनेंगे?”

० “एक अमीर आदमी”- उन लोगों की तरफ़ इशारा है, जो दी गयी चीज़ों के लिए वफ़ादार नहीं हैं , जिन्होंने दौलत से प्रेम किया है, उन बातों से प्रेम किया जो घिनौनी हैं ।

जो दौलत परमेश्‍वर ने इस इन्सान को दी थी, उसे हर दिन अपने ऊपर उड़ाने का वह अपराधी था। यह धन का दुरुपयोग था। गरीबों की मदद करने की कोई इच्छा उस में नहीं थी ।

० लाज़र पूरी तरह से बेसहारा था, अमीर आदमी ने उसकी बिल्कुल परवाह नहीं की। उसने स्वार्थ, कठोर मन और परमेश्‍वर की मर्ज़ी के खिलाफ़ रवैया दिखाया,

जब कि प्रभु ने वचन में हर जगह गरीबों की मदद की बात कही है। लैव्य. 19:10; व्यव.👉15:7-8; भजन 41:1; 82:3; 112:9; नीति. 19:17; मरकुस 10:21.

० सभी अमीर वहाँ नहीं जाते हैं, अब्राहम खुद अमीर था👉 (उत्पत्ति 13:2)। लेकिन अमीर लोगों के लिए मुक्‍ति पाना आसान नहीं है

अमीर आदमी सज़ा की जगह इसलिए गया क्योंकि उसने अपने अविश्‍वास को अपनी जीवन शैली से दिखाया ।

वह इन्सान की तरह था और उनकी तरह जिनके बारे में 👉याकूब 5:1-5 में लिखा है। वह मत्ती 25:41-46 और 1 तीमु. 6:9-10 की तस्वीर को दिखाता है।

ध्यान दें कि अब्राहम से अमीर आदमी बहुत दूर था। स्वर्गलोक और नरक लोक में एक बड़ी दूरी थी, लेकिन लोग एक जगह से दूसरी जगह देखने के साथ वहाँ के लोगों को सुन सकते थे।

० जिसने कोई दया नहीं दिखायी थी अब दया की भीख माँग रहा है। लेकिन उसे दया मिली नहीं – 👉मत्ती 5:7; 7:2; भजन 18:25-26; गल. 6:7. ध्यान दें कि मौत के बाद अमीर आदमी

और लाज़र (और अब्राहम भी) पूरी तरह से होश में थे। मौत के बाद आत्मा सोती नहीं है, सिर्फ़ देह खत्म हो जाती है। मौत के बाद और इन्साफ़ किए जाने के बाद बहुत सी बातें उलट पुलट हो जाएँगी।

० मौत के बाद ज़्यादा कुछ नहीं किया जा सकता है। सज़ा वाली जगह के बाहर भी नहीं आया जा सकता।

तुलना करें  मत्ती 25:46. ध्यान दें, कि यहाँ पुनर्जन्म के सिद्धान्त के विपरीत यीशु सिखा रहे हैं। देखें 👉अय्यूब 11:12; यूहन्ना 3:3; 9:3; इब्रा. 9:27. एक बार लोग मृत्यु लोक चले गए,

फिर वापस पैदा नहीं होंगे -जब तक उनको देह न दी जाए, आत्माएँ इन्तज़ार करेंगी। यूहन्ना 5:28-29.

० जो लोग नरक में जा चुके हैं वे इस  दुनिया में रहने वाले अपने रिश्तेदारों की मुक्‍ति की लालसा रख सकते हैं, लेकिन उनकी बिनती सुनी नहीं जाएगी।

अब्राहम कहता है, यह बेकार आशा है। लोगों का बुरा मन और अविश्‍वास जल्दी नहीं जाता है।

० जिन लोगों ने परमेश्‍वर की कही बातों को ठुकरा दिया था, वे यीशु के जी उठने के बाद भी कायल नहीं थे (मत्ती 28:11-15)।

8.   हमें पैसों से लालच करने से क्यों दूर रहना जरूरी है ?👇

मरकुस 10:23,25👇

20) उसने यीशु से जवाब में कहा, “गुरु जी! यह सब तो मैं बचपन से करता आया हूँ।” 21)यीशु प्रेम से भर गए और उससे कहा, “तुम में एक कमी है।

जाओ जो कुछ तुम्हारे पास है, बेच दो और गरीबों में बाँट दो। अपना क्रूस उठा कर मेरी बातें मानकर जीवन जीओ, तब तुम स्वर्ग की दौलत पाओगे।”

22) यह सुन वह दुखी हुआ और वैसी ही हालत में घर चला गया, क्योंकि वह बहुत अमीर था।

23) चारों तरफ़ देखकर यीशु ने अपने शिष्यों से कहा, जो लोग अमीर हैं, उनके लिए स्वर्ग में दाखिल होना कितना मुश्किल है।

24) शिष्य यीशु के बातों पर आश्चर्य कर रहे थे लेकिन यीशु ने फिर उत्तर में कहा, “बच्चो , जो दौलत पर भरोसा रखते हैं उनके लिए स्वर्ग के राज्य में दाखिल होना कितना मुश्किल है।

25) एक ऊँट सुई के छेद में से गुज़र सकता है पर एक अमीर का स्वर्ग में प्रवेश करना कठिन है।

26) आपस ही में वे बहुत ज़्यादा आश्चर्य में पड़ कर कहने लगे, “मुक्‍ति फिर कौन पा सकता है?”

27) उनकी तरफ़ देखते हुए यीशु बोले, “इन्सान के लिए यह काम मुश्किल है लेकिन परमेश्‍वर तो कुछ भी कर सकते हैं।”

० यीशु मसीह और अनन्त जीवन से बढ़कर यह व्यक्‍ति अपने पास जो कुछ था, उस पर भरोसा किए हुए था।

परमेश्‍वर किसी को भी कीमती चीज़ क्यों दें यदि वे उसकी कीमत को नहीं समझते? (तुलना करें 👉नीति. 4:7; लूका 14:33)

० यीशु को अपनाकर आगे बढ़ते हैं, उनके जीवन में क्लेश होगा 👉मत्ती 11:19; लूका 11:29; 3:4; 2 तीमु. 3:12) लेकिन उसकी तुलना उस बड़ी शान के जीवन से नहीं की जा सकती है

जो भविष्य में हमारे लिए है👉 रोमि. 8:18; 2 कुरि. 4:17.

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Amit kujur: नमस्ते दोस्तों मेरा नाम Amit Kujur हे ,में इंडिया के Odisha States के रहने वाला हूँ | आछा लगता हे जब इन्टरनेट के मदत से कुछ सीखते हैं और उसे website/blog के जरिये आपही जसे दोस्तों के बिच शेयर करना आछा लगता हे और मुझे भी सिखने को बोहुत कुछ मिलता हे | इसी passion को लेकर sikhnaasanhe.com website नाम का ब्लॉग बनाएं जहा हिंदी भाषा के आसान सब्दों में हार तरह के technology और skills related आर्टिकल जरिये मेरा जितना जो experience और knowledge हे शेयर करता हूँ |
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