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Bible hume aashiso ke vare kya kahti hai ?

Table of Contents

Bible hume aashiso ke vare kya kahti hai ?

यहां पाते हैं हम यीशु मसीह के आशीषित शब्दों को : 👇

मत्ती 5:3-10👇

3) आशीषित (धन्य) वे लोग हैं जो स्वभाव से सीधे सादे (दीन) हैं, क्योंकि स्वर्ग का राज्य उन्हीं का है।

4) आशीषित वे हैं जो दुख मनाते हैं क्योंकि वे शान्ति पाएँगे।

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  • इसका मतलब तो होगा कि “उदास लोग सचमुच में खुश लोग हैं।” यहाँ मालूम पड़ता है कि विलाप करना उस राज्य की नींव है जिसे प्रभु बनाते हैं।

यह पद पिछले पद से जुड़ा है। जो लोग अपनी आत्मिक गरीबी और बुराई देखते हैं, उस पर दुखी होते हैं कि उन में कितनी बुराई भरी पड़ी है।

यह देखकर वे सारी मानव जाति की बुरी दशा पर शोक करते हैं। यहाँ यीशु उस शोक की बातें नहीं कर रहे हैं जो लोगों को इसलिए होता हैं कि उनका कुछ खो गया, बर्बाद हो गया,

आशा पूरी नहीं हुयी। इस तरह का शोक मौत की तरफ़ ले जाता है।👉 2 कुरि. 7:10.

  • परमेश्‍वर के राज्य के लोगों का शोक मन बदलाव को लाता है और परमेश्‍वर के राज्य की खुशी की स्थिति की तरफ़ ले चलता है।

याकूब 4:8-10 से तुलना करें। भजन 51 में परमेश्‍वरीय शोक को देखें। ऐसे लोग कुछ मात्रा में परमेश्‍वरीय शान्ति का एहसास कर सकेंगे।

(यशा. 40:1-2; यूहन्ना 14:1; 16:33; 2 कुरि. 1:3-5), भविष्य में इसे पूरी तरह पाएँगे (लूका 16:25; प्रका. 21:4)।

5) आशीषित वे हैं जो नम्र हैं, क्योंकि वे पृथ्वी के अधिकारी होंगे।

  • नम्रता कमज़ोरी नहीं है। यह चरित्र की खूबी है। यह खुद यीशु मसीह (परमेश्‍वर के बेटे) का गुण है 2 कुरि. 10:1)।

एक ताकतवर सिपाही जो सच्चाई की लड़ाई लड़ रहा है और दुष्टता तथा शैतान का सामना कर रहा हैं, वह नम्र भी रह सकता है। इफ़ि. 6:10-17.

  • परमेश्‍वर द्वारा लायी गयी परिस्थितियों को स्वीकार करना नम्रता है। यह परमेश्‍वर के लिए दुख उठाना है।

तुच्छ समझा जाना व आग बबूला होना बदले का बर्ताव करना है (1 पतर. 2:21-23)। नम्र वे लोग हैं जो परमेश्‍वर के प्रति समर्पित होते हैं,

परमेश्‍वर के शासन को स्वीकार करते हैं और जो कुछ भी उनके लिए सहना पड़ता है, सहते हैं (तुलना👉यूहन्ना 18:11)।

नम्र लोग मसीह की मानने के लिए अपनी गर्दन झुका देते हैं और सीखने के लिए तैयार हैं ( लूका 9:23)।

  • पृथ्वी पर ये लोग आत्मिक रीति से मज़बूत हैं। ये लोग बाद में पूरी पृथ्वी के वारिस (अधिकारी) होंगे। लालची, ज़िद्दी,

कुर्सी या दौलत की चाह करने वाले मान सम्मान चाहने वाले इस पृथ्वी के हिस्सेदार न होंगे। तुलना करें भजन 37:1,11 यह भजन नम्र और घमण्डी के बीच का अन्तर दिखाता है।

  • नम्रता कैसे मिल सकती है? जैसे दूसरे आत्मिक गुण मिलते हैं – जब परमेश्‍वर के प्रति अपने आप को सुपुर्द करते हैं, पवित्र आत्मा इसे लाता है।

लोगों में उनके, दूसरे के और परमेश्‍वर के लिए सही रवैया पैदा कर के पवित्र आत्मा ऐसा करता है।

6) आशीषित वे हैं जो खराई के भूखे और प्यासे हैं, क्योंकि उन्हें भरपूर किया जाएगा।

  • खराई, शब्द उन सब बातों की तरफ़ इशारा है जो परमेश्‍वर की निगाह में सही, उचित और अच्छी हैं। यह खराई सारी बेइन्साफ़ी और टेढ़ी चाल के खिलाफ़ है।

परमेश्‍वर, उनका राज्य, उनका लक्ष्य और उद्देश्य, काम, लोगों के साथ बर्ताव, यह सभी बिना खोट के हैं (एज्रा 9:15; भजन 11:7; 19:9; 36:6; 97:2; 145:17; दानि. 9:14; यूहन्ना 17:25)।

वह चाहते हैं कि अगर इन्सान उनके राज्य और स्वर्ग में रहना चाहता है तो ज़रूरी है कि यीशु की कुर्बानी से निर्दोष ठहराया जाए।

यह पद नहीं कहता कि वे लोग खुश हैं या सुखी हैं जो आमोद प्रमोद (मनोरंजन), धन दौलत या आत्मिक अनुभवों के भूखे प्यासे हैं।

हम सभी स्वभाव से अपराधी स्वभाव रखते हैं, हमें निर्दोषता (क्षमा) की ज़रूरत है। इसी के पीछे लोगों को पहले जाना चाहिए, और उन्हें हमेशा परमेश्‍वर के साथ रहना है।

हम किस बात की चाहत रखते हैं, खोजते हैं, दिखाता है कि हम हैं क्या। जो लोग यीशु को अपना कर परमेश्‍वर के बेटे – बेटी बन गए हैं, वे खराई का जीवन ही चाहेंगे।

वे पृथ्वी पर खराई को ही बढ़ते देखना चाहेंगे। परमेश्‍वर का आत्मा उन में ऐसी इच्छा पैदा करेगा। यदि यह हमारा थोड़ा भी अनुभव है तो हम मान सकते हैं

कि हम परमेश्‍वर के राज्य के बारे में कुछ नहीं जानते। जो इन्सान खाने पीने के लिए चाहत नहीं रखता, बीमार है।

जिनके पास सही चालचलन के लिए मन नहीं है, वे आत्मिक रूप से निष्प्राण (मरे) हैं और ऐसी इच्छाओं को बाईबल नहीं सिखाती है।

इसके विपरीत, यह कि सही इच्छाएँ हों और हम सही बातों के लिए भूख प्यास रखें। परमेश्‍वर का राज्य खुद से सन्तुष्ट लोगों के लिए नहीं, लेकिन उनके लिए भूख रखने वालों के लिए है।

ऐसी भूख, जैसे खाने और पानी के लिए होती है। जो लोग अपने आप में सन्तुष्ट हैं और दुनिया के दूसरे लोगों की तरह जीना चाहते हैं, वे सच्चा सुख और खुशी न जान पाएँगे।

  • भजन 119 में हम देखते हैं उस व्यक्‍ति को जो परमेश्‍वर के सामने निर्दोष ठहराए जाने के अनुभव को जानता है। इसका मतलब है एक निष्कंलक परमेश्‍वर की लालसा रखना।

देखें (भजन 42:1-2; 63:1), उनके साथ बातचीत करना। यह वह भूख है कि हम यीशु की तरह बनना चाहते हैं (प्रे.काम 3:14; 1 पतर. 2:21-22; 3:18; 1 यूहन्ना 2:1)।

यह छिछले, छिपे, अपवित्र जीवन से किनारा करने वाला जीवन है। ऐसे लोग तृप्त हो जाएँगे। कब? धीरे-धीरे इसी जीवन काल में (2 कुरि. 3:18; इफ़ि. 4:24; फ़िलि. 3:12)।

लेकिन यीशु के आने पर पूरी तरह (रोमि. 8:29-30; इफ़ि. 5:25-27; 1 यूहन्ना 3:1-3)।

7 आशीषित वे हैं जो दयालु हैं क्योंकि उन पर दया की जाएगी।

  • परमेश्‍वर हम पर इसलिए कृपा नहीं करेंगे, बचाएँगे, अपने राज्य में लाएँगे क्योंकि हम दयालु हैं। पहले से हमारे कृपालु या दयावन्त होने या न होने से कोई फ़र्क नहीं पड़ता।

देखें प्रे.काम 9:1-6; 1 तीमु. 1:13-14. मुक्‍ति मन बदलाव (एक नया मोड़ पुराने जीवन से) और यीशु पर भरोसे के द्वारा (यूहन्ना 3:16; प्रे.काम 16:31; इफ़ि. 2:8-9; तीतुस 3:3-6)।

  • जो लोग परमेश्‍वरीय दया से मुक्‍ति पा चुके हैं, उन्हें दूसरों को दया दिखानी चाहिए। उनके जीवन पर दया उनका पीछा करती जाएगी (भजन 23:6)।

बाईबल में (6:14-15; भजन 18:25-26; गल. 6:7) परमेश्‍वर के राज्य के बारे में आत्मिक नियम हैं। परमेश्‍वरीय कृपा को चखकर उनके राज्य का हिस्सा बनकर

अगर वे लोग अपनी मर्ज़ी से जीवन जीना चाहेंगे तो यह प्रभु को पसंद नहीं है। अगर लोगों के प्रति करूणामय नहीं हैं, तो वे प्रभु से तरस क्यों चाहते हैं।

क्या गुण होने चाहिए? प्रभु हमें बदलते रहते हैं। अगर हम दयालु नहीं बनते जा रहे हैं तो संभावना है कि उन्हों ने हमें बदला नहीं हैं और अपने राज्य में नहीं लाए हैं।

दयालु होने का मतलब है, मदद देने के वे काम करना, जिसकी लोगों को ज़रूरत है लूका 10:37; इफ़ि. 4:32; इब्रा. 6:10; याकूब 3:17. इसका मतलब है उन्हें माफ़ करना,

जो हमें दुख पहुँचाते हैं, और उनकी भलाई करना। तुलना करें 18:21-35; लूका 10:30-37. यीशु इसके नमूना हैं।

8 आशीषित वे हैं जिन के मन शुद्ध हैं, क्योंकि वे परमेश्‍वर को देखेंगे।

  • मन की शुद्धता का मतलब बुराई की गैरमौजूदगी नहीं है। अगर ऐसा है तो इस दुनिया में कोई भी कभी सृष्टिकर्ता को देख नहीं सकता।

देखें 7:11; रोमि. 7:18; गल. 5:16-17; याकूब 3:2; 1 यूहन्ना 1:8. यीशु ने सिखाया कि अपने गुनाहों की माफ़ी के लिए विनती करें (लूका 11:4)।

उसका मतलब ‘बिना मिलावट का’ भी हो सकता है। शुद्ध अनाज बिना छिलके का होता है। इसका मतलब बिना कपट का भी हो सकता है।

इसलिए शुद्ध का अर्थ होगा, दण्डरहित, ईमानदार, खरा, बिना कपट का, अपने लक्ष्य और उद्देश्य में अविभाजित, बिना धोखे,

और छिपा-चोरी का – याकूब 4:8. यह एक ऐसा मन है जो पूरी तरह से परमेश्‍वर पर और वह क्या चाहते हैं उन बातों पर लगा है (भजन 86:11; 1 राजा 15:14; 2 इति. 16:9)।

अपने जीवन में बाहरी बातों की शुद्धता काफ़ी नहीं है (देखें 23:25-28)। हमें भीतरी शुद्धता की ज़रूरत है (भजन 51:6,10)। ज़रूरत इस बात की है कि परमेश्‍वर और हम खुद भीतर के बदलाव को चाहें।

हमें मन को सुरक्षा पहले देनी है – नीति. 4:23; 2 कुरि. 7:1. यीशु का पूरा संदेश इसी बात का है – शुद्धता और मन की एकता।

मन बदलाव और यीशु पर विश्‍वास से मन की शुद्धता शुरू होती है (प्रे.काम 15:9)। अपनी कुर्बानी के कारण यीशु विवेक को शुद्ध करते और भीतरी भाग को धोते हैं (इब्रा. 9:14; 10:22)।

इसके बाद विश्‍वासी को चाहिए कि सीधी चाल चले और जिन बातों को प्रभु दिखायें उन से किनारा करे (1 यूहन्ना 1:5-7)।

“परमेश्‍वर को देखेंगे” अब मसीह में विश्‍वासियों के पास आत्मिक ज्ञान हैं और परमेश्‍वर को जानते हैं।(यूहन्ना 9:39; 17:2-3, 6; प्रे.काम 26:17-18; 2 कुरि. 4:4-6; 1 पतर. 2:9)।

वे यीशु की अद्वितीय महिमा को बाद में देखेंगे। 1 यूहन्ना 3:1-3; 1 कुरि. 13:12; प्रका. 22:3.

9) आशीषित वे हैं जो मेल कराने वाले हैं क्योंकि वे परमेश्‍वर के बेटे-बेटियाँ कहलाएँगे।

  • पहला यूहन्ना छोड़ कर हर एक पुस्तक में यह आया है। शान्ति कायम करने वालों का मतलब क्या है? यह परमेश्‍वर के तरीके से शान्ति को चाहना है, इसके लिए काम करना है।

इसका मतलब यह नहीं कि सच्चाई, खरेपन या इन्साफ़ को तज कर शान्ति कायम करें। जब सब जगह मन मुटाव है, शान्ति – शान्ति कहना बेकार है (यिर्म. 6:14)।

यह दुष्टता से समझौता नहीं है। इसे खरे जीवन पर आधारित होना है, इसलिए दुष्ट के लिए शान्ति है ही नहीं (भजन 85:10; यशा. 32:17; 48:22)। झगड़े, मारामारी, लोगों के बीच, परिवारों, और देशों में क्यों हैं?

  • बुराई 👉- गल. 5:19-21; याकूब 3:16; 4:1-2. शान्ति कैसे बहाल हो? लोगों के बुरे स्वभाव से आज़ाद होने पर।

जो ऐसी शिक्षा को बढ़ावा दे – परमेश्‍वरीय सत्य को सिखा कर मेल मिलाप को बढ़ावा देने वाली आदि – अगर लोग ऐसा करते हैं तो परमात्मा के साथ मेल,

मन की शान्ति आने से लोगों के साथ अच्छा सम्बन्ध होता है। यीशु सब से बड़े शान्ति स्थापना करने वाले हैं।

देखें 2 कुरि. 5:18-21; इफ़ि. 2:14-18; कुल. 1:21-22. शान्ति बहाल करने वालों को जानना चाहिए कि खास परेशानी बुराई है और यीशु का संदेश उपाय।

ऐसे लोगों में ऊपर बतायी गयी खूबियाँ भी होनी चाहिए। जब ऐसा होगा, वे सच्चाई, सही जीवन और विश्‍वास के लिए जोखिम उठाएँगे (इफ़ि. 6:10-17; 1 तीमु. 6:12; 2 तीमु. 4:7; यहूदा 3)।

लेकिन वे भी सभी के साथ अच्छे से रहेंगे और लोगों में मेल पैदा करेंगे (रोमि. 12:18; 14:19; 1 कुरि. 7:15; इब्रा. 12:14; 1 पतर. 3:11)।

  • शान्ति बहाल करवाने वालों को स्वर्गिक पिता की सन्तान क्यों कहा जाता है? क्योंकि वह स्वयं शान्ति के परमेश्‍वर हैं (रोमि. 15:33; इब्रा. 13:20)।

वह तैयार थे हर तरह की कीमत चुकाने, सही काम करने के लिए कीमत चुकाने के लिए ताकि इन्सान और सृष्टिकर्ता में मेल हो जाए।

जब इस बात में लोग प्रभु की तरह हैं, तो लोग उन्हें शान्ति देने वाले परमेश्‍वर की सन्तान की तरह देखेंगे

10) आशीषित वे हैं जो अपने खरेपन की वजह से सताए जाते हैं, क्योंकि स्वर्ग का राज्य उन्हीं का है।

  • राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक, रंग, जाति, गलती, जोश के आने के कारण नहीं। सही चालचलन की वजह से,

सताव से परमेश्‍वर के बच्चों और दूसरों में अन्तर दिखता है (यूहन्ना 15:20-21; 2 तीमु. 3:12; 1 पतर. 4:14-16)। वे आशीषित इसलिए हैं क्योंकि वे परमेश्‍वर की तरफ़ होने से खुशी की दशा में हैं।

परमेश्‍वर की सच्चाई के लिए खड़े होने और उनके लिए दुख उठाने और मरने के लिए तैयार हैं। यही तो आशीषित स्थिति है।

ऐसे लोगों को क्लेश सहना पड़ता है क्योंकि दुनिया बुरी इच्छाओं, घमण्ड और सच के लिए नफ़रत से भरी है।

  • दुष्ट लोग सही जीवन को नहीं चाहते हैं। जो लोग इस के पक्ष में हैं, वे उन से और परमेश्‍वर से नफ़रत करते हैं 👉- यूहन्ना 3:19-20; 7:7; 15:18, 24; रोमि. 1:29-32; 8:7; 12:2; 1

यूहन्ना 2:16; 3:12; 5:19 (ध्यान दें कि उन्हों ने निष्कलंक यीशु को भी सताया और मार डाला👉 – प्रे.काम 3:12-15)।

यीशु के शिष्य मेल करवाने वाले थे, लेकिन तुच्छ ठहराए गए, मारे गए, पत्थरवाह किए गए, जेल में डाले और मार डाले गए👉

(प्रे.काम 5:40; 7:57-58; 12:1-4; 14:19; 16:22-24; 2 कुरि. 11:23-26; 2 तीमु. 3:10-12)। फिर भी वे पृथ्वी पर आशीषित थे और परमेश्‍वर के राज्य के हिस्सेदार।

उनकी पीड़ा कुछ समय के लिए और सुख हमेशा का था👉 (2 कुरि. 4:17-18)।

लूका 6:22👇

22) जब लोग मेरी खातिर तुम से नफ़रत करें, बहिष्कार करें, बेइज़्ज़ती करें और तुम्हें बुरा ठहराकर ठुकरा दें तब तुम आशीषित हो।

मत्ती 11:6👇

6) आशीषित व्यक्‍ति वह है जो मेरी वजह से ठोकर न खाए (नाराज़ न हो)।”

प्रेरितों 3:25👇

25) तुम भविष्यवक्‍ताओं के वंशज और उस करार के वारिस हो जो परमेश्‍वर ने तुम्हारे पुरखों के साथ किया था। परमेश्‍वर ने अब्राहम से कहा था, ‘तेरे वंश के ज़रिए धरती के सभी परिवार आशीष पाएँगे।’

लूका 1:45👇

45) वह इन्सान सच में सुखी है जिसने प्रभु के दिए हुए वायदों के पूरे होने पर विश्‍वास किया है।

मत्ती 25:34👇

34) तब राजा अपने दाहिने हाथ के लोगों से कहेगा, ‘मेरे पिता के आशीषित लोगो, आओ। जिस राज्य को दुनिया की शुरूआत से तैयार किया गया है, उसमें दाखिल हो।

मत्ती 13:16👇

16) लेकिन तुम्हारी आँखें आशीषित हैं, क्योंकि वे देखती हैं। तुम्हारे कान आशीषित हैं क्योंकि वे सुनते हैं।

  • आत्मिक सच्चाई को सुनना और समझना परमेश्‍वर के तमाम वरदानों में से एक है। आईये हम इसके लिए प्रार्थना करें।

मत्ती 24:46👇

46) वही सेवक आशीषित है जिसका मालिक उसे वैसा ही करते पाएगा।

मत्ती 16:17👇

17) यीशु ने कहा, “हे शमौन, योना के बेटे तुम आशीषित हो क्योंकि तुम ने अपने आप यह नहीं कहा है, लेकिन मेरे पिता ने जो स्वर्ग में हैं, यह तुम पर प्रगट किया है।

  • “आशीषित”- यहाँ यीशु पतरस के बारे में ऐलान करते हैं कि वह ‘आशीषित’ है, क्योंकि उसने यीशु के बारे में बड़ी सच्चाई को जाना था-कि वह मसीह (अभिषिक्‍त) थे, मात्र एक साधारण आदमी नहीं।

तर्क या मनुष्यों के सिखाए जाने से उसने यह नहीं कहा था। यह दिमागी बात नहीं थी। उसे यह सच्चाई परमेश्‍वर ने बतायी थी। तुलना करें 👉मत्ती 11:27 ।

वे सभी आशीषित कहलाए जाएँगे, जिन्हें यीशु के बारे में इस सच्चाई की रोशनी मिली है। तुलना करें 👉1 यूहन्ना 2:23; 5:1, 5.लोग कुछ भी क्यों न कहें,

जो यीशु को परमेश्‍वर की तरह नहीं अपनाता, उसके पास परमेश्‍वर है ही नहीं। यह गलती है अगर हम सोचें कि यीशु को महत्व न दें, लेकिन परमेश्‍वर को अपनाएँ।

जो यीशु पर विश्‍वास लाते हैं, उनके पास परमेश्‍वर पिता भी हैं।

यूहन्ना 20:29👇

29) यीशु ने उससे कहा, “तुम ने तो मुझे देख कर विश्‍वास किया है। आशीषित वे हैं जिन्होंने बिना देखे विश्‍वास किया।”

  • यह देखें कि यीशु किस प्रकार से उसके शब्दों को स्वीकार करते हैं। दूसरे शब्दों में, वह यह मान लेता है, कि यीशु प्रभु और परमेश्‍वर हैं।

यदि यीशु को यह नहीं मालूम था कि वह प्रभु और परमेश्‍वर हैं, तो उन्हों ने खुद के परमेश्‍वर होने को स्वीकार नहीं किया होता।

यदि साधारण मनुष्य भी अच्छे लोग हैं, तो वे परमेश्‍वर की समानता को अपने लिए ले लेना अच्छा नहीं समझते हैं (प्रे.काम 14:13-15 से तुलना करें)।

“आशीषित”- जिस प्रकार से थोमा ने विश्‍वास किया, उस प्रकार से विश्‍वास करने पर यह प्रशंसा मिलती है – वह यह कि यीशु मरे हुओं में से जी उठे और वह प्रभु एवं सच्चे परमेश्‍वर हैं,

और हमारे लिये भी। रोमि. 10:9-10 से तुलना करें (“धन्य” और “आशीष” के सम्बंध में उत्पत्ति 12:3; गिनती 6:23-27; भजन 1:1-3; 119:1; मत्ती 5:3-10 देखें)।

इसके विपरीत सच्चाई यह है कि जो लोग विश्‍वास नहीं करते उन पर वह आशीष की घोषणा नहीं कर सकते। तुलना  करे  👉यूहन्ना 3:18, यूहन्ना 3:36, यूहन्ना 8:24

प्र. व. 1:3👇

3) आशीषित वह व्यक्‍ति है जो इन भविष्यद्वाणी की बातों को पढ़ता, सुनता और मानता है, क्योंकि समय पास है।

  • “आशीषित”-आशीर्वाद वे लोग पाते हैं, जो पढ़ते और मानते हैं। सिर्फ़ इसलिए पढ़ना कि हमें कुछ अजीब सच्चाइयाँ मालूम हो जाएँ, इसका कोई फ़ायदा नहीं है, उन्हें अपने जीवन में लागू करना ज़रूरी है।

प्र. व. 14:13👇

13) फिर मैंने स्वर्ग से सुना, “लिखो, वे धन्य हैं, जो विश्‍वास करने के बाद मरेंगे। पवित्र आत्मा कहता है, हाँ, क्योंकि वे अपनी मेहनत से आज़ाद हो जाएँगे और उनके कामों का हिसाब रखा जाएगा।”

प्र. व. 16:15👇

15) “देखो, मैं चोर की तरह अचानक आ जाऊँगा। वे लोग आशीषित हैं जो मेरा इन्तज़ार करते हैं। जो अपने कपड़ों को तैयार रखते हैं, ताकि उन्हें नंगेपन और शर्मिन्दगी का सामना न करना पड़े।”

प्र. व. 19:9👇

9) और उसने कहा, “लिखो, वे आशीषित लोग हैं जिन्हें मेम्ने के विवाह के खाने पर बुलाया गया है।” उसने मुझे से यह भी कहा, “यह परमेश्‍वर की कही गयी सच्ची बात है”।

प्र. व. 20:6👇

6) आशीषित और पवित्र व्यक्‍ति वह है जो पहले जी उठने में शामिल होगा। ऐसे लोगों पर दूसरी मौत का अधिकार नहीं होगा,

लेकिन वे परमेश्‍वर और यीशु के याजक (पुरोहित) होंगे और एक हज़ार साल तक उनके साथ शासन करेंगे।

  • आशीषित और पवित्र वे लोग हैं जो यीशु के समय से इस युग के आखिरी समय तक होंगे ।

प्र. व. 22:7👇

7) देखो, मैं अचानक आने वाला हूँ। आशीषित व्यक्‍ति वह है जो इस किताब की भविष्यद्वाणी की बातों का पालन करता है”।

  • “आशीषित… है”- देखें कि यह आशीष किस के लिए है – यह उनके लिए नहीं जो इसका अनुवाद करते हैं या इसके संकेतों का मतलब लगाते हैं। लेकिन उनके लिए जो इसे प्रगट की सच्चाई को मानते हैं।

प्र. व. 22:14👇

14) आशीषित वे हैं, जो अपने वस्त्र धोकर शुद्ध हो जाते हैं, ताकि उन्हें जीवन के पेड़ के पास और शहर में जाने के लिए द्वार में से जाने का हक मिले।

इफिसि. 1:3👇

3) हमारे यीशु मसीह के पिता और परमेश्‍वर की बड़ाई हो, जिन्होंने हमें स्वर्गिक स्थानों में सारी आत्मिक आशीषों से भर दिया है।

  • “सारी आत्मिक आशीषों”- यह आत्मिक दायरे की बरकतें हैं। यह परमेश्‍वर की बड़ी कृपा जिससे हम बचते हैं, हमें आत्मिक बनाती है और मसीह के लिए जीने में मदद करती है।

हमेशा के लिए उनके साथ रहने के लिए यह हमें स्वर्ग तक पहुँचाती है। पौलुस यह नहीं कहता है कि स्वर्गिक पिता हम को शारीरिक, भौतिक और मानसिक तरीके से आशीषित नहीं करते हैं।

लेकिन यहाँ उसका ज़ोर इन बातों पर नहीं है। पौलुस इन में से कुछ आत्मिक आशीषों का वर्णन करता है ।

उत्पत्ति 12:1-3; 👇

1) यहोवा ने अब्राम से कहा, “तू अपने पिता के घराने और नाते-रिश्‍तेदारों को और अपने देश को छोड़कर एक ऐसे देश में जा जो मैं तुझे दिखाऊँगा।

2) मैं तुझसे एक बड़ा राष्ट्र बनाऊँगा और तुझे आशीष दूँगा और तेरा नाम महान करूँगा और तू दूसरों के लिए एक आशीष ठहरेगा।

3) जो तुझे आशीर्वाद देंगे उन्हें मैं आशीष दूँगा और जो तुझे शाप देंगे उन्हें मैं शाप दूँगा और तेरे ज़रिए धरती के सभी कुल ज़रूर आशीष पाएँगे।”

गिनती 6:22-27👇

22) फिर यहोवा ने मूसा से कहा,  23) “हारून और उसके बेटों से कहना, ‘तुम्हें इसराएल के लोगों को इस तरह आशीर्वाद देना चाहिए।

तुम उनसे कहना: 24) “यहोवा तुम्हें आशीष दे और तुम्हारी हिफाज़त करे। 25)  यहोवा अपने मुख का प्रकाश तुम पर चमकाए और तुम पर कृपा करे।

26) यहोवा अपना मुख तेरी ओर करे और तुम्हें शांति दे।”’ 27) याजक मेरा नाम लेकर इसराएल के लोगों को आशीर्वाद दिया करें ताकि मैं उन्हें आशीष दूँ।”

रूत 2:4👇

4) तभी बोअज़ बेतलेहेम शहर से बाहर अपने खेतों में आया। उसने अपने कटाई करनेवालों से कहा, “यहोवा तुम्हारे साथ रहे।” उन्होंने भी कहा, “यहोवा तुझे आशीष दे।”

भजन 134:3👇

3) यहोवा, जो आकाश और धरती का बनानेवाला है, तुझे सिय्योन से आशीष दे।

उत्पत्ति 27:29, 30👇

29) देश-देश के लोग तेरी सेवा करें और सभी राष्ट्र तेरे सामने अपना सिर झुकाएँ। तू अपने भाइयों का मालिक हो और तेरे भाई तेरे सामने सिर झुकाएँ।

जो कोई तुझे शाप दे वह शापित ठहरे और जो कोई तुझे आशीर्वाद दे उसे आशीर्वाद मिले। ”30) जैसे ही इसहाक ने याकूब को आशीर्वाद देना खत्म किया और याकूब उसके पास से निकला,

एसाव शिकार से लौट आया।

भजन 22:27👇

27) धरती का कोना-कोना यहोवा को याद करेगा, उसकी तरफ मुड़ेगा। राष्ट्रों के सभी परिवार तेरे सामने झुककर दंडवत करेंगे।

प्रकाशितवाक्य 15:4👇

4) हे यहोवा, सिर्फ तू ही वफादार है, इसलिए कौन तुझसे न डरेगा और तेरे नाम की महिमा न करेगा? सभी राष्ट्र तेरे सामने आएँगे और तेरी उपासना करेंगे क्योंकि उन पर तेरे नेक आदेश ज़ाहिर किए गए हैं।”

भजन 86:9👇

9) हे यहोवा, सब राष्ट्र, जो तेरे हाथ की रचना हैं, तेरे पास आएँगे और तेरे सामने दंडवत करेंगे, तेरे नाम की महिमा करेंगे।

मलाकी 1:11👇

11) सेनाओं का परमेश्‍वर यहोवा कहता है, “पूरब से पश्‍चिम तक सब राष्ट्रों में मेरा नाम महान होगा। जगह-जगह बलिदान चढ़ाए जाएँगे कि उनसे धुआँ उठे

और मेरे नाम से शुद्ध भेंट अर्पित की जाएगी क्योंकि सब राष्ट्रों में मेरा नाम महान होगा।”

भजन 5:12👇

12) क्योंकि हे यहोवा, तू हर नेक जन को आशीष देगा, तेरी मंज़ूरी एक बड़ी ढाल की तरह उनकी रक्षा करेगी।

भजन 67:7👇

7) परमेश्‍वर हमें आशीष देगा और धरती के कोने-कोने में रहनेवाले उसका डर मानेंगे

भजन 3:3👇

3) मगर हे यहोवा, तू मेरे चारों तरफ एक ढाल है, तू मेरी शान है, तू ही मेरा सिर ऊँचा उठाता है।

उत्पत्ति 13:14👇

14) अब्राम से लूत के अलग होने के बाद यहोवा ने अब्राम से कहा, “ज़रा अपनी आँखें उठाकर चारों तरफ देख। जहाँ तू है वहाँ से उत्तर-दक्षिण, पूरब-पश्‍चिम चारों दिशाओं में अपनी नज़र दौड़ा,

उत्पत्ति 13:16👇

16) मैं तेरे वंश को इतना बढ़ाऊँगा कि उनकी गिनती धूल के कणों की तरह अनगिनत हो जाएगी। जैसे कोई धूल के कणों को नहीं गिन सकता, वैसे ही तेरे वंश को भी कोई नहीं गिन पाएगा।

उत्पत्ति 15:1👇

15) इसके बाद अब्राम को एक दर्शन में यहोवा का यह संदेश मिला: “अब्राम, तुझे किसी बात से डरने की ज़रूरत नहीं। मैं तेरे लिए एक ढाल हूँ। मैं तुझे बहुत बड़ा इनाम दूँगा।”

उत्पत्ति 15:5👇

5) फिर परमेश्‍वर ने अब्राम को बाहर लाकर उससे कहा, “ज़रा अपनी नज़रें उठाकर आसमान की तरफ देख।

अगर तू तारों को गिन सके तो गिन।” फिर परमेश्‍वर ने उससे कहा, “तेरे वंश की गिनती भी इसी तरह बेशुमार होगी।”

उत्पत्ति 17:5👇

5) अब से तेरा नाम अब्राम नहीं बल्कि अब्राहम होगा, क्योंकि मैं तुझे बहुत-सी जातियों का पिता बनाऊँगा।

उत्पत्ति 22:17, 18👇

17) कि मैं तुझे ज़रूर आशीष दूँगा और तेरे वंश को इतना बढ़ाऊँगा कि वह आसमान के तारों और समुंदर किनारे की बालू के किनकों जैसा अनगिनत हो जाएगा।

और तेरा वंश अपने दुश्‍मनों के शहरों को अपने अधिकार में कर लेगा। 18और तेरे वंश के ज़रिए धरती की सभी जातियाँ आशीष पाएँगी, क्योंकि तूने मेरी आज्ञा मानी है।’”

व्यवस्थाविवरण 26:5👇

5) फिर तू अपने परमेश्‍वर यहोवा के सामने यह ऐलान करना, ‘मेरा पिता अरामी था और जगह-जगह परदेसी बनकर रहा था।

वह अपने घराने के साथ मिस्र गया और वहाँ परदेसी बनकर रहा। उस वक्‍त उसके घराने में बहुत कम लोग थे।

मगर आगे चलकर वहाँ उसके वंशजों की गिनती बढ़कर बेशुमार हो गयी और उनसे एक महान और ताकतवर राष्ट्र बना।

  • ये उस अपमान के विषय में सत्य है जो मसीह में हमारे विश्‍वासी होने के कारण हमें झेलने पड़ते हैं, न कि दूसरे कष्ट जो दूसरे कारणों से हमारे जीवन में आते हैं।
  • मन की शुद्धता का मतलब बुराई की गैरमौजूदगी नहीं है। अगर ऐसा है तो इस दुनिया में कोई भी कभी सृष्टिकर्ता को देख नहीं सकता।

देखें👉 7:11; रोमि. 7:18; गल. 5:16-17; याकूब 3:2; 1 यूहन्ना 1:8. यीशु ने सिखाया कि अपने गुनाहों की माफ़ी के लिए विनती करें (लूका 11:4)। उसका मतलब ‘बिना मिलावट का’ मन है।

शुद्ध अनाज बिना छिलके का होता है। इसका मतलब बिना कपट का भी हो सकता है। इसलिए शुद्ध का अर्थ होगा, दण्डरहित, ईमानदार, खरा,

बिना कपट का, अपने लक्ष्य और उद्देश्य में अविभाजित, बिना धोखे, और छिपा-चोरी का – याकूब 4:8. यह एक ऐसा मन है जो पूरी तरह से परमेश्‍वर पर

और वह क्या चाहते हैं उन बातों पर लगा है (भजन 86:11; 1 राजा 15:14; 2 इति. 16:9)।

  • अपने जीवन में बाहरी बातों की शुद्धता काफ़ी नहीं है (देखें 23:25-28)। हमें भीतरी शुद्धता की ज़रूरत है👉 (भजन 51:6,10)।

ज़रूरत इस बात की है कि परमेश्‍वर और हम खुद भीतर के बदलाव को चाहें। हमें मन को सुरक्षा पहले देनी है – नीति. 4:23; 2 कुरि. 7:1. यीशु का पूरा संदेश इसी बात का है –

शुद्धता और मन की एकता। मन बदलाव और यीशु पर विश्‍वास से मन की शुद्धता शुरू होती है (प्रे.काम 15:9)।

अपनी कुर्बानी के कारण यीशु विवेक को शुद्ध करते और भीतरी भाग को धोते हैं 👉(इब्रा. 9:14; 10:22)। इसके बाद विश्‍वासी को चाहिए कि सीधी चाल चले और

जिन बातों को प्रभु दिखायें उन से किनारा करे (1 यूहन्ना 1:5-7)। “परमेश्‍वर को देखेंगे” अब मसीह में विश्‍वासियों के पास आत्मिक ज्ञान हैं और परमेश्‍वर को जानते हैं।

(यूहन्ना 9:39; 17:2-3, 6; प्रे.काम 26:17-18; 2 कुरि. 4:4-6; 1 पतर. 2:9)। वे यीशु की अद्वितीय महिमा को बाद में देखेंगे। 1 यूहन्ना 3:1-3; 1 कुरि. 13:12; प्रका. 22:3.

  • भीतरी प्रभु की आशीष के बारे में है। नए नियम में जब इसका इस्तेमाल हुआ तो वह उस आत्मिक आशीष पाए लोगों के बारे में है

(जो परमेश्‍वर के राज्य के (हुकूमत) के हिस्सेदार हैं और परमेश्‍वर की सुनते। वे इस खुशी के हिस्सेदार हैं।

इसका मतलब यह नहीं कि दुनिया में वे दुख महसूस नहीं करेंगे और हमेशा प्रसन्न रहेंगे। खुशी की भरपूरी भविष्य में है।

लेकिन यहाँ पर उसे चखेंगे क्योंकि परमेश्‍वर उसे हमारे साथ बाँटते हैं (यूहन्ना 15:11; 17:13; रोमि. 14:17; 15:13)।

सच में आशीषित होना तभी होता है जब हम सच्चे प्रभु और उनकी आशीषों से जुड़े हैं। बाईबल इसीलिए दी गई है कि लोग यह जानें और बाँटें।

  • इस दुनिया में आशीषित कौन हैं? अमीर लोग? घमण्डी और शक्‍तिशाली? वे जो बड़ी हिम्मत से बोल सकते हैं और अपने आप में बहुत अच्छा महसूस करते हैं?

यह सोचने का मानवीय तरीका है। उनके विचारों और परमेश्‍वर के विचारों में बहुत फ़र्क हैं 👉यशा. 55:8-9; लूका 16:15.

1 पतर. 4:15👇

15) किसी भी तरह से तुम में कोई खूनी, चोर, दुष्टता का काम करने वाला और दूसरों के कामों में दखल देने वाला होने की वजह से दुख न उठाए ।

  • उसके नाम के लिये मसीहियों को दुख क्यों सहना है? हम ऐसे संसार ही में रहते हैं (यूहन्ना 15:18-25; 16:1-4)। संसार जानबूझकर अंधकार में है और आत्मिक प्रकाश से घृणा करता है (यूहन्ना 3:19-20)।

प्रभु यीशु का वचन हमारे लिए बहुत अनमोल रत्न है : 👇

लैव्यव्यवस्था 26:3, 4👇

3) अगर तुम मेरी विधियों पर चलते रहोगे, मेरी आज्ञाओं का पालन करते रहोगे और उनके मुताबिक चलोगे,

4तो मैं तुम्हारे लिए वक्‍त पर बारिश कराऊँगा और देश की ज़मीन पैदावार देगी और मैदान के पेड़ फल दिया करेंगे।

नीतिवचन 10:22👇

22) यहोवा की आशीष ही एक इंसान को अमीर बनाती है और वह उसके साथ कोई दर्द नहीं देता।

यशायाह 1:19👇

19) अगर तुम मेरी बात मानने को राज़ी हो, तो तुम देश की बढ़िया-बढ़िया चीज़ें खाओगे।

व्यवस्थाविवरण 28 :2👇

2) अगर तुम अपने परमेश्‍वर यहोवा की बात हमेशा सुनोगे तो ये सारी आशीषें तुम्हें आ घेरेंगी:

लूका 10:21👇

उसी क्षण यीशु पवित्र आत्मा में होकर खुशी से भर गए और कहा, “हे पिता, स्वर्ग और पृथ्वी के स्वामी, मैं आपका धन्यवाद करता हूँ,

कि आप ने इन बातों को ज्ञानियों और समझदारों से छिपा रखा, और बालकों पर प्रगट किया। हाँ, हे पिता, क्योंकि आपको यही अच्छा लगा।

  • सुसमाचार में दो और जगह मसीह के आनन्द की बात कही गयी है – यूहन्ना 15:11; 17:13. देखें कि उसको किसने प्रसन्न किया –

परमेश्‍वर अपनी सच्चाई को उन्हीं पर प्रगट करते हैं जो नम्र और दीन हैं, न कि घमण्डी।

मत्ती 11:25-26👇

25) उसी समय यीशु ने कहा, “स्वर्ग और पृथ्वी के स्वामी, पिताजी, मैं आपको इसलिए धन्यवाद देता हूँ क्योंकि आप ने इन बातों को ज्ञानियों और बुद्धिमानों से छिपा रखा है, लेकिन शिशुओं से नहीं।

26) ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि यह बात आपको पसन्द आयी।

  • हालाँकि यीशु को तुच्छ ठहराया जाता रहा, फिर भी यीशु के पास ऐसा बहुत कुछ था जिसके लिए वह परमेश्‍वर के प्रति धन्यवादित थे।

यहाँ वह लोगों के साथ परमेश्‍वर की बुद्धिमानी के बर्ताव के लिए उनकी स्तुति करते हैं। बहुत बार परमेश्‍वर उन लोगों को छोड़ कर आगे बढ़ जाते हैं,

जो बड़े समझे जाते हैं या अपने आप को कुछ समझते हैं। ऐसे कुछ लोग उन दिनों में थे जिन्हें फ़रीसी या शास्त्री कहा जाता था।

परमेश्‍वर बहुत बार ऐसों को जो नम्र और दीन हैं और कुछ भी नहीं समझे जाते हैं, चुन लेते हैं, ताकि अपनी सच्चाईयों को लोगों तक पहुँचाएँ।

तुलना करें 18:3; 1 कुरि. 1:19-29; याकूब 2:5. एक नम्र, सीखने वाला बच्चा यह सच ज़्यादा अच्छी तरह से सीखता है,

बजाए अपनी बुद्धि पर घमण्ड करने वाला जो परमेश्‍वर के प्रति समर्पण करने और उनकी मानने के लिए तयार नहीं हैं।

अगर हमें सच्चाई जाननी है, तो परमेश्‍वर हमें ज्ञान दे और हमारे मनों में चमके। 24:45; यूहन्ना 16:13; 2 कुरि. 4:6; इफ़ि. 1:17-18.

  • यह निश्चित मान कर चलिए – जो लोग घमण्डी हैं और अपना नाम चाहते हैं, कभी प्रभु के राज्य में दाखिल नहीं होते हैं (जब तक अपनी बुराई को मान कर छोड़ न दें)।

तुलना करें 5:3-4; 20:25-28; यशा. 57:15; 66:2; नीति. 3:34; लूका 9:23; 18:13-14. परमेश्‍वर की आशीषों के दायरे में प्रवेश करने की शर्त है अपनी खुदी (मनमानापन और घमण्ड) छोड़ना – 16:24-26 देखें।

लोग जो कुछ भी स्वभाव से सोचते हैं यह उस सब के बिल्कुल विरोध में है।

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Amit kujur: नमस्ते दोस्तों मेरा नाम Amit Kujur हे ,में इंडिया के Odisha States के रहने वाला हूँ | आछा लगता हे जब इन्टरनेट के मदत से कुछ सीखते हैं और उसे website/blog के जरिये आपही जसे दोस्तों के बिच शेयर करना आछा लगता हे और मुझे भी सिखने को बोहुत कुछ मिलता हे | इसी passion को लेकर sikhnaasanhe.com website नाम का ब्लॉग बनाएं जहा हिंदी भाषा के आसान सब्दों में हार तरह के technology और skills related आर्टिकल जरिये मेरा जितना जो experience और knowledge हे शेयर करता हूँ |

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