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Aatmic Bikash kya Hai (What is spiritual growth in hindi ) aur Bible Hume kya batati hai

Aatmic  Bikash kya Hai (What is spiritual growth in hindi )aur Bible Hume kya batati hai   जो लोग परमेश्‍वर की बातों के अभ्यास और आत्मिक समझ में दृढ़ हो गये हैं।

प्रायः भले और बुरे में और सच एवं झूठ में भेद करना मुश्किल होता है।

उसके लिये प्रशिक्षण (परमेश्‍वर के वचन की गहरी बातों के अर्थ को समझने में प्रयास) की ज़रूरत होती है। बाईबल बिना अध्ययन किये ये बिलकुल हम कुछ भी समझ नहीं सकते !

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परमेश्वर के दिए गए मार्ग दर्शन को  अपने जीवन में लाघू  किए बिना कुछ कोई भी व्यक्ति आत्मिक उन्नति नहीं कर सकता ।

उदाहरण(What is spiritual growth in hindi ) :

जैसे परमेश्वर पिता ने आपको प्रेम करने की आज्ञाएं दि है और आप किसी व्यक्ति से प्रेम नहीं कर सकते हैं इस से आप उनकी बातों को टालते हो !

तो इस तरह आप अपने जीवन में यीशु के कही गई वचन को अभ्यास नहीं करते हैं । यह परमेश्वर के प्रति अन आग्यता भी कहते हैं !

  • परमेश्‍वर की चाह यही है कि हम सभी आत्मिकता में बढ़ते जाएँ। यही समझदारी सारी आत्मिक बातों के बारे में है।

हमें मसीह में और उनके कद तक तब तक बढ़ते रहना चाहिए, जब तक उनकी भरपूरी को हासिल न कर लें। सम्पूर्ण मण्डली के लिए यही परमेश्‍वर की कामना है।

वह इसे पा भी लेंगे। व्यक्‍तिगत तरीके से हम सभी को यह प्यार में सच बोलने से प्राप्त करना है। यह आत्मिक विकास और उन्नति के लिए बहुत ज़रूरी है।

यदि हम उन्नति करना चाहते है, तो बाईबल में परमेश्‍वर के बताए गए सत्य को एक दूसरे के साथ बाँटना चाहिए।

  • सच्चाई ही वह ज़मीन है, जिसमें मण्डली को बोया गया है। सच्चाई ही वह खाना है, हवा है जिसकी इसे ज़रूरत है। जब सच्चाई खो जाती है तो सब कुछ खो जाता है।

ज़रूरी है कि हम सच्चाई से प्यार करें और सच्चाई बोलना सीखें। यह सब कुछ प्यार भरे दिल से होना चाहिए। जिन बातों को परमेश्‍वर गलत ठहराते हैं, उन पर चलने वालों के बिल्कुल यह विरोध में है।

A.  कुरिन्थ. 5:8 👇

(8)इसलिए हम बुराई और अशुद्धता के पुराने खमीर के साथ त्यौहार न मनाएँ। लेकिन बिना खमीर की उस रोटी से जो ईमानदारी और सच्चाई की है।

फ़सह के मनाने का अर्थ यथार्थ में पुराने यहूदी त्यौहार का मनाना नहीं है। यह करने के लिये मसीहियों को कभी सिखाया नहीं गया।

विश्‍वासियों के उत्सव का अर्थ है मसीह जो फ़सह हैं उनके सम्बन्ध में जो सच्चाई है उस पर मनन करना। यह नए जीवन में उनके साथ सहभागिता करना है।

घमण्ड, पार्टीबाज़ी, अनैतिकता, बेईमानी आदि का इस त्यौहार या पर्व में कोई स्थान नहीं है ।

B.  कुलुस्सि. 3:9👇

(9) एक दूसरे से झूठ मत बोलो✽, क्योंकि तुम ने अपना पुराना जीवन उसके कामों सहित दूर कर दिया है।

  • झूठ मत बोलो”- इसका क्या मतलब आता है ; जो बातें पवित्रता और भलाई के खिलाफ़ हैं, विश्‍वासियों को उन्हें अस्वीकार करना चाहिए, रोक देना चाहिए।

सच्चाई से हम मज़बूत होते हैं। झूठ बर्बाद करता है। जब मसीही यहाँ असफल होते हैं, तो एक दूसरे के साथ तथा सच्चाई के परमेश्‍वर के साथ समस्या बनी रहेगी (भजन 31:5)।

झूठ और धोखा देना परमेश्‍वर और लोगों के खिलाफ़ अपराध है।

C.  भजन 15:2👇

(2) वही जो बेदाग ज़िंदगी जीता है, हमेशा सही काम करता है और दिल में सच बोलता है।

D.  भजन 1:1👇

(1) सुखी है वह इंसान जो दुष्टों की सलाह पर नहीं चलता, पापियों की राह पर खड़ा नहीं होता, न ही हँसी-ठट्ठा करनेवालों के साथ बैठता है।

1. यशायाह 33:15, 16👇IMPORTANT  NOTE :

(15) जो नेकी की राह पर बना रहता है, जो सीधी-सच्ची बातें बोलता है, जो धोखाधड़ी और बेईमानी की कमाई ठुकराता है, जो रिश्‍वत पर झपटने के बजाय अपना हाथ रोक लेता है

, जो खून-खराबा करने की साज़िश सुनकर कान बंद कर लेता है, जो बुराई देखने से अपनी आँखें मूँद लेता है,

(16) ऐसा इंसान ऊँची जगहों पर रहेगा, चट्टान पर बना मज़बूत गढ़ उसकी पनाह होगा, उसे रोटी मिलती रहेगी और कभी पानी की कमी न होगी।”

2. प्रेरीतों 10:34, 35👇

(34) तब पतरस ने बोलना शुरू किया, “अब मैं अच्छी तरह समझ गया हूँ कि परमेश्‍वर भेदभाव नहीं करता,

(35) मगर हर वह इंसान जो उसका डर मानता है और सही काम करता है, फिर चाहे वह किसी भी राष्ट्र का क्यों न हो, उसे वह स्वीकार करता है।

3.  नीतिवचन 3:32👇

(32)क्योंकि यहोवा कपटी लोगों से नफरत करता है, मगर सीधे-सच्चे लोगों से गहरी दोस्ती रखता है।

4.  इफिसियों 4:25👇

(25)इसलिए जब तुमने छल-कपट को खुद से दूर कर दिया है, तो अब तुममें से हर कोई अपने पड़ोसी से सच बोले, क्योंकि हम एक ही शरीर के अलग-अलग अंग हैं।

5.  नीतिवचन 12:22👇

(22) झूठ बोलनेवाले होंठ से यहोवा घिन करता है, लेकिन जो सच्चाई से काम करते हैं उनसे वह खुश होता है।

6.  इब्रानि. 10:26👇

(26) क्योंकि सच्चाई की पहचान हासिल करने के बाद यदि हम जान बूझकर गुनाह करते रहें, तो गुनाहों के लिए फिर कोई कुर्बानी बाकी नहीं।

  • शैतान का यह प्रयास रहता है कि विश्‍वासी अपने विश्‍वास से मुकर जाये और इसका खतरा है भी। किन्तु खतरे की संभावना का अर्थ यह नहीं है कि ऐसा अवश्य होगा।

यदि परमेश्‍वर का वचन, उनकी सम्हालने की योग्यता और उनके लिये मसीह की प्रार्थनाएँ न होतीं तो यह संभव था ।

किन्तु इन कारणों से वे मुकरने से बचे रहते हैं और जब खतरा आता है, मुकरने के विषय में दी गयी चेतावनियों के कारण वे विश्‍वास को त्यागने से बचे रहते हैं।

उन लोगों के बारे में हो सकते हैं जो सत्य को जानते हैं, उसके द्वारा प्रभावित हुए हैं, परमेश्‍वर के राज्य के बहुत पास आ चुके हैं, फिर भी उन्हों ने उसमें प्रवेश नहीं किया है।

जो लोग परमेश्‍वर की सन्तान नहीं हैं, किन्तु ऐसा ऐलान करते हैं, कुछ समय तक वे परमेश्‍वर की सन्तान दिखायी दे सकते हैं ।

  • उन लोगों के विषय में कहा गया है, जो सत्य को जानते हैं। मसीह की रोशनी उन पर चमकी है। किंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि उन्हों ने रोशनी पर अपना भरोसा रखा या ज्योति की सन्तान’

(यूहन्ना 12:35-36) बन गए। लोग बिना मन परिवर्तन और उद्धार के या यीशु पर बिना विश्‍वास किये सत्य को जानना जारी रख सकते हैं।

  • परमेश्‍वर द्वारा प्रगट महिमान्वित सत्य के प्रकाश के विरोध में जानबूझ कर अपराध करना है। सच्चाई की पहचान”- वह यह नहीं कहता कि पश्चाताप और विश्‍वास के बाद”

हमें सच्चाई का ज्ञान हो सकता है और फिर भी पश्चाताप और विश्‍वास को ठुकरा सकते हैं। इस पद में लेखक जिस गुनाह की बात करता है,

वह इस बात को लगातार अस्वीकार करना हो सकता है।

  • लेकिन एक अपराध है, जिसके लिये कोई माफ़ी नहीं है। यहाँ यह मसीह और उसके बलिदान का तिरस्कार करना है,

उसके रक्‍त की नयी वाचा से मुड़ना और पवित्र आत्मा की वाणी की आज्ञा नहीं मानना है ।

7.  केसे भेद जाने परमेश्वर और शैतान की संतान कोन है :👇

यूहन्ना 3:6👇

(6) क्योंकि जो देह से जन्मा है, वह देह है, और जो आत्मा से जन्मा है, वह आत्मा है।

  • मनुष्य स्वाभाविक रीति से जो कुछ है (रोमि. 7:5, 18 )। मनुष्य अपने समान बच्चों को जन्म दे सकता है। परन्तु वह नए आत्मिक जीवन को उत्पन्न नहीं कर सकता ।

ऐसा करने के उसके सारे प्रयास नाकाम रहेंगे। केवल परमेश्‍वर का आत्मा आत्मिक जीवन का निर्माण कर सकता है।

यूहन्ना 1:13👇

(13) वे न तो खून से, न शरीर की इच्छा से, न मनुष्य की इच्छा से, परन्तु परमेश्‍वर से उत्पन्न हुए हैं।

  • इसका अर्थ है परम पिता से एक नया आत्मिक जीवन प्राप्त करना। यदि हम यीशु को अपना प्रभु और मुक्‍तिदाता ग्रहण करते हैं,

तो हम यहाँ और अभी एक नए आत्मिक जन्म का अनुभव करते हैं और परमेश्‍वर की संतान बन जाते हैं।

कोई भी स्वर्गिक पिता की संतान इसलिए नहीं हो सकता क्योंकि उसके माता – पिता और पूर्वज उनकी संतान थे ।

हर एक व्यक्‍ति को प्रभु यीशु को अपना प्रभु और मुक्‍तिदाता के रूप में ग्रहण करना है और परमेश्‍वर की ओर से नया जीवन पाना है (मत्ती 3:9 से तुलना करें)।

भौतिक साधनों की सहायता से आत्मिक जीवन दूसरों तक नहीं पहुँचाया जा सकता। कोई भी व्यक्‍ति अपनी इच्छा से दूसरे व्यक्‍ति को परमेश्‍वर की संतान नहीं बना सकता।

केवल परमेश्‍वर ही ऐसा कर सकते हैं और वह ऐसा तब कर सकते हैं जब लोग यीशु को अपना प्रभु ग्रहण करते हैं। केवल परमेश्‍वर आत्मिक संतान उत्पन्न कर सकते हैं।

पूरी मानवजाति दो भागों में विभाजित है – जो पिता से उत्पन्न हुए और जो उत्पन्न नहीं हुए।

  • लोग स्वभाव से परमेश्‍वर की संतान नहीं हैं – उन्हें परमेश्‍वर की संतान बनना है। स्वभाव से वे सृष्टिकर्ता के विरोधी हैं और परमेश्‍वर से अलग हो गए हैं वे उस यीशु को ग्रहण करने के

द्वारा उनकी संतान बनते हैं जो वचन और ज्योति हैं, जिन्हें परमेश्‍वर ने मनुष्यों के लिये भेजा, वह परमेश्‍वर जिनके द्वारा यह संसार बनाया गया और

जिसने उद्धारकर्ता को भेजा है उन्हें ग्रहण करने का मतलब है विश्‍वास करना। शब्द “विश्‍वास” महत्वपूर्ण है और लगभग 100 बार विभिन्न स्थानों में इसका उपयोग किया गया है।

हम विश्‍वास से उन्हें ग्रहण करते हैं और स्वर्गिक पिता की संतान बन जाते हैं उनके नाम पर विश्‍वास, उन पर विश्‍वास करना है – बाईबल के अनुसार वह क्या हैं, वह कौन हैं, उन्हों ने क्या किया है।

यूहन्ना 8:44👇

(44) तुम अपने पिता शैतान से हो, और अपने पिता की लालसाओं को पूरा करना चाहते हो। वह तो शुरुआत से खूनी है।

वह सत्य पर स्थिर न रहा, क्योंकि सत्य उसमें है ही नहीं। जब वह झूठ बोलता है, तो अपने स्वभाव ही से बोलता है, क्योंकि वह झूठा है, वरन झूठ का पिता है।

  • यूहन्ना कह रहा है कि हर इन्सान या तो परमेश्‍वर की संतान है या शैतान कि ।  एक व्यक्‍ति क्या करता है या क्या नहीं करता है, उस से हम बता सकते हैं कि वह किस कि संतान है।
  • शैतान उन में कार्यरत था वे शैतान की मानते थे, कई रीति से उसके समान थे और उसी के थे। यह मानवीय हृदय का धोखा और मात्र दुष्टता है

(यिर्म. 17:9)। यहाँ शैतान के विषय में दो बातें प्रगट की गई हैं – वह हत्यारा एवं महा झूठा है ।

मत्ती 13:38👇

(38) खेत संसार है, अच्छा बीज राज्य की सन्तान, और जंगली बीज दुष्ट की सन्तान हैं।

रोमि 7:5👇

(5) जब हम बुरे स्वभाव (पुराने स्वभाव) के वश में थे, तब नियमों की आधीनता की वजह से उठी बुरी अभिलाषाएँ हमारे देह में कार्य कर रही थीं,

जिससे हम मौत (शारीरिक और अनन्त) के लिए परिणाम उत्पन्न कर रहे थे।

  • यह उस स्वभाव की ओर इशारा है जो लोग स्वभाव से हैं – वे पापमय हैं और अपनी अभिलाषाओं के गुलाम हैं। यह उन सब की ओर संकेत है जो मनुष्य मन, प्राण और शरीर में हैं।

रोमि 1:18-32👇

(18) स्वर्ग से परमेश्‍वर का दण्ड उन लोगों की सारी दुष्टता और अन्याय पर प्रगट होता है, जो अपने अन्याय और दुष्टता से सच्चाई को दबा देते हैं।

(19) परमेश्‍वर के बारे में जो कुछ जाना जा सकता है वह उन के बीच में साफ़-साफ़ दिखता है, क्योंकि परमेश्‍वर ने उन्हें यह बातें दिखायी हैं।

(20) क्योंकि इस सृष्टि की शुरूआत से उनके अनदेखे गुण साफ़-साफ़ दिखते हैं: उनकी सदा काल की शक्‍ति और उनका परमेश्‍वरीय स्वभाव प्रकृति में देखा जा सकता है। इसलिए लोग किसी तरह का बहाना बना नहीं सकते।

(21) क्योंकि पिता परमेश्‍वर को जानने के बावजूद, उन्हों ने सर्वश्रेष्ठ परमेश्‍वर जान कर उनको आदर-सम्मान या धन्यवाद नहीं दिया। इसके विपरीत वे बेकार की बातें सोचने लगे और उनका मूर्खतापूर्ण मन अन्धेरे से भर गया।

(22) हालाँकि उन्हों ने बुद्धिमान होने का दावा तो किया, किन्तु वे बेवकूफ़ बन गए।

(23) उन्हों ने परमेश्‍वर को नाशमान मनुष्य, चिड़ियों, चौपायों और रेंगने वाले पशुओं की समानता में बदल दिया।

(24) इसलिए परमेश्‍वर ने उनको मन की अभिलाषाओं के कारण होने वाली अशुद्धता के सुपुर्द कर दिया, ताकि वे आपस में एक दूसरे की देह का अपमान करें।

(25) उन्हों ने परमेश्‍वर की सच्चाई के स्थान पर झूठ को चुना और परमेश्‍वर को जो सदा सम्मानीय हैं छोड़ कर, सृष्टि की उपासना की।

(26) इसलिए परमेश्‍वर ने उन्हें शर्मनाक इच्छाओं के हवाले कर दिया, क्योंकि स्त्रियाँ पुरुषों के साथ शारीरिक सम्बन्ध को छोड़ कर स्त्रियों के साथ शारीरिक सम्बन्ध रखने लगीं।

(27) इसी प्रकार से पुरुषों ने स्त्रियों के साथ स्वभाविक व्यवहार को छोड़ कर पुरुषों के साथ यौन सम्बन्ध की कामना की। पुरुषों ने पुरुषों के साथ अभद्र व्यवहार किया और उस दण्ड से दुःख पाया जो उन्हें मिलना चाहिए था।

(28) क्योंकि जब उन्हों ने अपने जीवन में परमेश्‍वर को स्थान न देना चाहा, परमेश्‍वर ने भी उन्हें अनुचित काम करने के लिए, उनके गन्दे मन के हवाले कर दिया।

(29) वे सब प्रकार की दुष्टता, लालच और कड़वाहट से भरपूर हो गए। वे ईर्ष्या, हत्या, झगड़े, धोखे और दुश्मनी से भी भर गए।

(30) वे बुरा कहने वाले, चुगलखोर, परमेश्‍वर से नफ़रत करने वाले, घमण्डी, डींग मार, बुरी-बुरी बातों को बनाने वाले और माता-पिता की आज्ञा न मानने वाले हैं।

(31) बिना समझ के, शपथ तोड़ने वाले, स्वाभाविक प्रेम रहित, क्षमा रहित और निर्दयी भी हैं।

(32) यह जानने के बावजूद कि परमेश्‍वर न्यायी हैं और ऐसे काम करने वाले मौत के दण्ड के लायक हैं, वे न ही ये सब करते हैं, लेकिन ऐसा करने वालों से खुश भी होते हैं।

  • बाधा डालते” – क्योंकि लोग परमेश्‍वर को नहीं जानते हैं, बुरे लोग यही करते हैं। वे परमेश्‍वर के या अपने विषय में किसी भी सच्चाई को दबाना चाहते हैं जो उन्हें परमेश्‍वर या पश्चात्ताप की ओर ले जाती है।

वे अपने परमेश्‍वर और उसके सत्य के बारे में गलत धारणा रखते हैं और ज्योति के बजाए अँधेरे को चाहते हैं। यह उनकी बड़ी बुराई और बड़ा अन्धकार है।

पौलुस एक मुख्य विषय पर ज़ोर डालता है। वह है सभी लोगों की बुरी अवस्था और मसीह के संदेश की बड़ी ज़रूरत। सभी अधर्मी हैं।

उनके गुनाह के सम्बन्ध में जो सच्चाई है उसे सभी ने दबाने का प्रयत्न किया है। सभी लोगों को परमेश्‍वर की सज़ा का साम्हना करना है।

  • लोग केवल अनजाने में बुरा नहीं करते हैं। यह प्रगट है, कि एक अद्भुत सृजनहार ने सृष्टि को बनाया है। किन्तु लोग इस सच्चाई के बारे में अपनी आँखें बन्द कर लेते हैं।

(इन्कार भी करते हैं – भजन 14:1), जानबूझकर गुनाह करते हैं। इसलिए उनका यह बहाना नहीं चलेगा। यदि परमेश्‍वर ने कोई ज्ञान न दिया होता, बाईबल न होती, मसीह न आए होते,

तब भी अपनी बुराई के सम्बन्ध में उन्हें अबोध गिना नहीं जा सकता था। सृष्टि के द्वारा ही परमेश्‍वर की सच्चाई, उनकी सामर्थ स्पष्ट दिखाई देती है।

लोगों को परमेश्‍वर का विचार करना चाहिए, उनकी उपासना करनी चाहिए। (प्रे.काम 17:26-27)  क्योंकि वे ऐसा नहीं करना चाहते, इसलिए नहीं करते।

उन्हें अपने बुरे जीवन से लगाव है, इसलिए उस परमेश्‍वर के बारे में सोचना नहीं चाहते जो उन्हें अच्छा, ऊँचा और पवित्र मार्ग दिखाना चाहते हैं।

इब्रानि. 6:7👇

(7) क्योंकि जो ज़मीन बरसात के पानी को जो इस पर बार-बार पड़ता है, पी पीकर जिनके द्वारा जोती-बोई जाती है, उनके काम का साग-पात उपजाती है, वह परमेश्‍वर से आशीष पाती है।

  • उत्पादन देने वाली भूमि विश्‍वासियों की ओर संकेत करती है । फल न देने वाली भूमि अविश्‍वासियों और विश्‍वास त्यागने वालों को दर्शाती है।

वे लोग परमेश्‍वर के लिये कोई फल नहीं उत्पन्न करते हैं  (तुलना करें 👉मत्ती 13:19-22; लूका 13:6-9 आदि)। दोनों प्रकार की ज़मीन पर वर्षा हो सकती है

(यहाँ पर वर्षा परमेश्‍वर के सत्य और पवित्र आत्मा के प्रभाव को दिखाती है। किंतु परमेश्‍वर के लिये दोनों ही फल पैदा नहीं करते हैं।

एक मनुष्य के जीवन का उत्पादन (फल) यह प्रगट करता है कि वह मसीह में है या नहीं है।

विश्‍वास त्याग के काँटे इस बात का चिन्ह हैं कि इन लोगों में मसीह कभी नहीं थे (तुलना करें 👉1 यूहन्ना 2:19; मत्ती 3:8; 7:16-20)।

मत्ती 13:23👇

(23) लेकिन अच्छी ज़मीन में बीज़ों का गिरना उस इन्सान की तरफ़ इशारा है जो सुनकर समझता है, उसी में परमेश्‍वर की बातों का नतीजा दिखता है।

कुछ लोग सौ गुना, कुछ साठ गुना और कुछ तीस गुना फ़सल पैदा करते हैं।”

  • यहाँ यह नहीं बताया गया है कि दूसरे समझ गए कि उन्हों ने क्या सुना। लेकिन इस तरह के व्यक्‍ति को परमेश्‍वर ने सिखाया है और उसकी आँखें खुल चुकी हैं -👉

लूका 24:45. इसी से फ़र्क पड़ता है। जितना हम बाईबल की शिक्षा समझते हैं, आत्मिक परिवर्तन दिख सकता है।

  • हम जो नहीं समझते हैं, हम जीवन में लागू नहीं कर पाएँगे और जल्दी भूल जाएँगे। परमेश्‍वर चाहते हैं कि हम सच्चाई सीखें और समझे।

देखें 👉व्यव. 6:6-7; यहोशू 1:8; भजन 1:1-2; 119:1; नीति. 2:1-8; प्रे.काम 8:30-35; 1 कुरि. 2:12-16; इफ़ि. 1:17-18; 4:13-14; कुल. 1:9; 2:2.

  • “नतीजा”- मनुष्य के मन में परमेश्‍वर के काम का सबूत आत्मिक फल है, अगर कोई फल नहीं है, तो एक शक की बात है कि कुछ सच्चा स्थायी काम हो रहा है या नहीं।

देखें 👉 यूहन्ना 15:1-6; इब्रा. 6:7-12. मन की खराब हालत हमेशा ऐसी ही रहे, ज़रूरी नहीं। सख्त मन तोड़े जा सकते हैं, काँटे निकाल कर फेंके जा सकते हैं।

इस दृष्टान्त में उन सभी के लिए सीख है जो यीशु की आज्ञा मानकर खुशी की खबर सुनाते हैं। परमेश्‍वर एक ज़मीन तैयार करते हैं और फ़सल मिलेगी।

तुलना करें 👉9:37; भजन 126:5-6; यूहन्ना 4:35.

  • इस दृष्टान्त में एक चेतावनी है, हमें अपने मनों की हालत के बारे में सतर्क रहना चाहिए। हम भी इसके ज़िम्मेदार हैं –

चाहे तैयारी हो या नहीं या खोखलापन, कड़ापन और कँटीलापन हो। तुलना करें होशे 10:12; यिर्म. 4:3; यहेज. 18:31; योएल 2:13; नीति. 4:23.

8. मत्ती 13:19-22👇

(19) जब कभी कोई व्यक्‍ति राज्य की बातें सुनता है और समझता नहीं✽, तो दुष्ट आत्मा आकर उसके मन में बोयी हुयी बातों को छीन ले जाता है। यह वही है जिसने रास्ते पर गिरे बीजों को अपनाया था।

(20) लेकिन पथरीली ज़मीन पर बीज़ों को अपनाने वाला वह है, जो सुनता है और तुरन्त खुशी से अपना लेता है।

(21) लेकिन क्योंकि उसकी जड़ मजबूत न होने की वजह से थोड़ी देर ही बना रहता है। जब परमेश्‍वर की बातों को अपनाने की वजह से दबाव या सताव आता है, वह तुरन्त लड़खड़ा जाता है।

(22) काँटेदार झाड़ी में गिरना उस व्यक्‍ति की तरफ़ इशारा है जो परमेश्‍वर की बातों को तो सुनता है, लेकिन इस दुनिया की फ़िकर और धन का धोखा उन बातों को दबा देते हैं और वे बातें यों ही सूख जाती हैं।

  • समझता नहीं”– यह आत्मिक अन्धेपन और अज्ञानता की वजह से इस तरह का व्यक्‍ति परमेश्‍वर की सच्चाई के प्रति लापरवाह और अज्ञान है।

दुष्ट शैतान है। वह तत्पर है कि इन्सान के मन से परमेश्‍वर की बातों को मिटा डाले। शैतान का उद्देश्य 👉लूका 8:12 में दिखता है।

9. लूका 8:12👇

(12) रास्ते के किनारे के वे हैं, जो सुनते हैं, तब शैतान आकर उनके भीतर से शब्द को उठा ले जाता है ताकि वे लोग सुनकर मुक्‍ति न पा जाएँ।

  • जहाँ तक परमेश्‍वर की बातों का सवाल है यहाँ दिखावा और खोखलापन दिखता है जहाँ तक धर्म इस तरह के व्यक्‍ति को खुश करता है, वह धार्मिक बना रहता है।

मुसीबत उसकी प्रसन्नता और धर्म को बर्बाद करती है। चाहे कुछ भी हो जाए, अन्त तक पहुँचने के लिए कोई दृढ़ निश्चय नहीं है।

शिष्यता की गहराई नहीं है। यीशु की बातों को सीखकर उन्हें लागू करने के लिए कोई प्रयास नहीं है।

  • दुनियावी चिन्ताएँ और दौलत की फ़िकर बर्बाद करने वाले और हमें रोक देने वाले काँटों की तरह हैं।👉

(मरकुस 4:19 में कुछ और शब्द हैं “दूसरी चीज़ों की चाह” और 👉 लूका 8:14 में “आमोद प्रमोद” )। यह एक कारण है जिसकी वजह से यीशु और

प्रेरितों ने सिखाया कि शिष्यों को अपनी ज़रूरतों के लिए सृष्टिकर्ता पर भरोसा रखना चाहिए और आत्मिक और

स्वर्गिक बातों पर ध्यान लगाना चाहिए, न कि इस दुनिया की। देखें 👉 कुल. 3:1-3; 1 तीमु. 6:9-10.

10.  मरकुस 4:19👇

(19) दुनिया की फ़िकर, दौलत का धोखा और दूसरी चीज़ों का लालच उन में समाकर परमेश्‍वर के संदेश को धर दबोचता है और वह बिना फले रह जाता है।

11. लूका 8:14👇

(14) जो कँटीली झाड़ियों में गिरे उन लोगों की तरफ़ इशारा करते हैं, जो वचन सुनने के बाद बढ़ते हैं, लेकिन चिन्ताओं, इस जीवन के ऐश-ओ-आराम और दौलत की चाह में फँसने से किसी काम के नहीं रह जाते।

  • “ऐश-ओ-आराम”- यह शब्द 👉 मत्ती 13:22 में नहीं देखा गया। परमेश्‍वर के वचन के दबाए जाने के बारे में जो इन्सान की ज़िन्दगी मे बोया जाता है। जिस तरह से चिन्ता और डर काम करता है, आमोद प्रमोद भी वही काम करते हैं।

12.  लूका 13:6-9👇

(6) फिर यीशु ने उन्हें एक दृष्टान्त बताया, एक आदमी अपने बगीचे में लगाए गए अंजीर के पेड़ से अंजीर तोड़ने आया, लेकिन उसमें एक भी फल नहीं था।

(7) इसलिए उसने माली से कहा, “देखो भई, मैं आज तीन साल बाद अंजीर के लिए आया हूँ लेकिन इस में एक भी अंजीर नहीं लगी है। इस पेड़ को काट फेंको। यह बेकार ही में इतनी ज़मीन क्यों घेरे रहे?”

(8) लेकिन माली गिड़गिड़ाकर बोला, “श्रीमान जी, इसे एक साल की मोहलत और दे दीजिए मै इसके चारों तरफ़ खोद कर खाद डालूँगा।

(9) यदि अगले साल तक इस में अंजीर लगते हैं, तो ठीक है, नहीं तो आप इसे कटवा डालना।”

  • जिस आदमी का पेड़ था वह परमेश्‍वर की तरफ़ इशारा है। जो बाग की निगाहबानी करता है वह परमेश्‍वर का सेवक या शायद यीशु खुद हैं।

हमें निश्चित हो जाना चाहिए कि परमेश्‍वर बराबर लोगों पर नज़र रख हुए हैं। कुछ को वह पृथ्वी पर से उठा लेते हैं, कुछ के लिए सीमित समय तक शायद इन्तज़ार करते हैं।

हर एक जीवन जो बिना अच्छे फल का है, खतरे में है – 👉मत्ती 3:10; 7:19; यशा.51:1-7; यूहन्ना 15:2, 6.

13.  मत्ती 3:10👇

(10) अब कुल्हाड़ी पेड़ों की जड़ पर रखी हुयी है। इसलिए जो पेड़ अच्छा फल नहीं लाता, काटा और आग में डाला जाता है।

  • यूहन्ना का मतलब यह था कि प्रभु राष्ट्र का इन्साफ़ करेंगे। मसीह प्रगट होने वाले थे। इस्राएल के जंगल में लोग पेड़ों की तरह थे। तुलना करे 👉लूका 13:6-9; भजन 1:3; 37:35; 52:8; 92:12; सभो. 11:3.

14.  मत्ती 7:17-20👇

(17) इसी तरह हर एक अच्छा पेड़ अच्छा फल पैदा करता है और खराब पेड़ खराब फल पैदा करता है।

(18) अच्छा पेड़ खराब फल नहीं ला सकता, न ही एक खराब पेड़ अच्छा फल ला सकता है।

(19) हर एक पेड़ जो अच्छा फल नहीं लाता, काटा और आग में फेंका और जला दिया जाता है।

(20) इस तरह, तुम उनके फलों से उन्हें पहचान लोगे।

15.  यूहन्ना 15:2👇

(2) जो डाली मुझ में हे, और फल नहीं लाती, उन्हें वह काट डालते हैं। जो फल लाती है, उसे वह छाँटते हैं ताकि और फले।

बहुत से मसीही कार्यकर्ता कुछ बातों को सेवा में सफ़लता कहते हैं। वे घमण्डी, बेईमान, अपवित्र, निर्दयी और शारीरिक हैं। यीशु उनकी दिखने वाली सफ़लता को “फल” नहीं कहते हैं।

जिस फल को परमेश्‍वर देखना चाहते हैं, वह है मसीह के समान बनते जाना और उन्हीं के समान सेवा करना।

16.  मत्ती 3:8👇

(8) इसलिए तुम्हारे मन के बदलाव का फल तुम्हारे जीवन में दिखाई दे।

  • मन बदलाव के लायक फल का मतलब है बुराई से परे रहना, भला करना, नुकसान भरपाई करना, चोरी की चीज़ वापस करना। सच्चा मन बदलाव नये जीवन की शुरूआत है। यह पुराने जीवन से फ़र्क है।

17.  लूका 3:10-14👇

(10) भीड़ ने सवाल किया, “हमें करना क्या चाहिए?” (11) यूहन्ना ने उत्तर दिया, “अगर तुम्हारे पास दो कुरते हैं, एक गरीब को दे दो। अगर तुम्हारे पास खाना है, तो मिल-बाँटकर खाओ।”

(12) भ्रष्ट टैक्स जमा करने वाले भी बपतिस्मा पाने के लिए आए और पूछने लगे, “गुरु जी, हमें क्या करना चाहिए?”

(13) उसने उत्तर दिया, “ईमानदार रहो और जितना रोमी सरकार ने तय किया है उससे ज़्यादा मत लो।” (14) कुछ फ़ौजियों ने पूछा, “हमें बताइए कि हम क्या करें?” उसने उन से कहा, “दबाव डाल कर किसी से पैसा मत ऐंठना, या किसी पर झूठा आरोप मत लगाना। अपनी मज़दूरी से खुश रहना।”

  • परमेश्‍वर से प्रेम रखते थे, परमेश्‍वर के लिये कार्य करते थे और उन्हों ने परमेश्‍वर के लोगों की सेवा की थी ।

यदि मसीह के जीवन में इस प्रकार की बातें नहीं दिखायी देती तो उसके विश्‍वासी होने का क्या चिन्ह है? यदि  उसके जीवन में परमेश्‍वर के लिये कोई फल नहीं है, तो सब कुछ बेकार है।

वह आज ऐसी ज़मीन के समान है, जो काँटे उगाती है।

18. इब्रानि. 10:32-34👇

(32) उन पहले दिनों को याद करो, जब तुम सच्चाई को जानने की वजह से दुखों में भी मज़बूत रहे।

(33) कुछ तो बदनामी, और सताव सहते हुए तमाशा बने, और कुछ इस तरह, कि तुम उनके साझी हुए जिनके साथ बुरा व्यवहार किया जाता था।

(34) क्योंकि तुम कैदियों के दुख में भी दुखी हुए, और अपनी संपत्ति भी आनन्द से लुटने दी, यह जान कर कि तुम्हारे पास एक और भी उत्तम और हमेशा ठहरने वाली दौलत है।

  • हमेशा ठहरने वाली दौलत है ”– मसीह में हमारे पास अनन्तकालिक दौलत है, इसलिए हमारे पास क्या है या क्या नहीं है इस विषय में हमें अधिक चिंतित नहीं होना चाहिये,

या इस विषय में कि हमारे पास क्या है और क्या नहीं है।

19. इब्रानि. 6:10👇

(10) क्योंकि परमेश्‍वर अन्यायी नहीं कि तुम्हारे काम, और उस मेहनत को भूल जाए, जो तुम ने उनके नाम के लिए इस तरह से दिखाया, कि दूसरे पवित्र जनों की सेवा की, और कर भी रहे हो।

20.  मत्ती 25:26👇

(26) उसके मालिक ने जवाब में कहा, ‘तुम दुष्ट और आलसी नौकर। तुम जानते थे कि जहाँ मैं बोता नहीं हूँ, वहीं काटना चाहता हूँ। वहीं इकट्ठा करना चाहता हूँ जहाँ छिथराता नहीं हूँ।

  • आत्मिक बातों में आलस्य विनाशकारी है, जैसा दूसरे क्षेत्रों में भी होता है। मालिक उसे दुष्ट कहता है क्योंकि उसने मालिक की बात नहीं मानी।

अनाज्ञाकारिता दुष्टता है और मालिक उसे सुस्त भी कहता है क्योंकि उसने उसकी नहीं मानी। उसके पास बुरा और आलसी मन था और उस पर उसने जीत नहीं हासिल की।

नीति. 6:6-11; 15:19; 22:13; 24:30-34. यहाँ मालिक यह नहीं कह रहा था कि वह उसी तरह का व्यक्‍ति था जैसा उसने सोचा था, “क्या मेरे चरित्र कि बारे में तुम्हारा यही विचार है?

क्या तुम सोचते हो कि मैं ऐसा हूँ? तब तो तुम्हें सही रीति से काम करना चाहिए।”

  • दो बे-बदल बातें”- परमेश्‍वर की प्रतिज्ञाएँ और शपथ दोनों विश्‍वासियों के प्रोत्साहन के लिये हैं, विश्‍वासी शरण प्राप्त करने के लिये भागे हैं – गुनाह से, गुनाह के प्रति परमेश्‍वर के क्रोध से,

पतित संसार से, और प्रत्येक उस बात से जो लोगों को अनन्त उद्धार से अलग रखती है (गिनती 35:9-29 से तुलना करें)। उन्हों ने परमेश्‍वर के अनन्त उद्धार की प्रतिज्ञा को पकड़ लिया है।

  • जिस आशा के विषय में बाईबल बताती है, वह निर्बल और डावाँडोल नहीं है। यह मज़बूत और सुरक्षित लंगर है। यह कभी न हिलने वाली है👉 (रोमि. 5:2-5)।

लंगर समुद्र में जहाज़ को एक स्थान पर स्थिर रखता है। आशा से विश्‍वासी एक स्थान पर स्थिर रहते हैं – ‘पर्दे भीतर’ (स्वर्ग जहाँ मसीह है) वहाँ विश्‍वास त्याग का कैसा तूफ़ान भी क्यों न आ जाए, वे कभी भी नाश नहीं होंगे।

21.  रोमि 5:2-5👇

(2) विश्‍वास के द्वारा हमारी पहुँच उस शर्तहीन कृपा (अनुग्रह) तक होती है, जिसमें आज तक हम बने हुए हैं और परमेश्‍वर की महिमा की आशा में खुश होते हैं।

(3) इतना ही नहीं, हम अपने सताव में भी खुश हों यह जानते हुए कि सताव सहते रहने से धीरज पैदा होता है।(4) धीरज वाली सहनशीलता से चरित्र बनता है और ग्रहणयोग्य चरित्र से आशा।

(5) आशा किसी भी तरह से निराश नहीं करती है, क्योंकि जो पवित्र आत्मा हमें दिया गया है, उसके द्वारा परमेश्‍वर पिता का प्यार उन्हों ने हमारे दिलों में डाला है।

22. इब्रानि. 8:10👇

10 फिर प्रभु कहते हैं कि “जो वाचा मैं उन दिनों के बाद इस्राएल के घराने के साथ बान्धूँगा, वह यह है, कि मैं अपने नियमों को उनके मनों में डालूँगा,

और उसे उनके आत्मा पर लिखूँगा, और मैं उनका परमेश्‍वर ठहरूँगा, और वे मेरे लोग ठहरेंगे।

  • यहाँ परमेश्‍वर अपने लोगों को नया और भिन्न बनाने की प्रतिज्ञा करते हैं, एक ऐसा नया मन और हृदय देने की प्रतिज्ञा करते हैं जो उनकी आज्ञाओं को मानेगा ।

23.  2 कुरिन्थ. 6:16-18👇

(16) क्या परमेश्‍वर के भवन और मूर्तियों के बीच कोई समझौता संभव है? क्योंकि हम (चर्च) परमेश्‍वर का जीवित भवन हैं। जैसा कि परमेश्‍वर ने कहा भी था, मैं उन में रहूँगा और उनके बीच चला-फिरा करूँगा। मैं उनका परमेश्‍वर होऊँगा और वे मेरे लोग होवेंगे।”

(17) इसलिए प्रभु कहते हैं, “उनके बीच में से निकलो और अलग हो जाओ और जो कुछ अशुद्ध है, उसे मत छुओ, तब मैं तुम्हें अपनाऊँगा।

(18) “मैं तुम्हारा पिता होऊँगा, तुम मेरे बेटे-बेटियाँ होगे” सर्वशक्‍तिमान प्रभु का कहना यही है।

  • विश्‍वासी परमेश्‍वर का मन्दिर हैं (1 कुरि. 3:16; 6:19; इफ़ि. 2:21-22)। अविश्‍वासी या तो सचमुच की मूर्तियों की उपासना करते हैं

या (मन की मूर्तियों की इफ़ि. 5:5) या स्वयं को मूर्ति बना लेते हैं। इसलिए दो बिल्कुल भिन्न प्रकार के लोगों के बीच किस प्रकार का समझौता हो सकता है।

कुछ पुराने नियम के पदों की ओर इशारा कर के परमेश्‍वर के मन्दिर के अर्थ को बताना है – लैव्य. 26:11-12; यिर्म. 32:38; यहेज. 36:27.

आसा करता हूँ Aatmic  Bikash kya Hai (What is spiritual growth in hindi )aur Bible Hume kya batati hai   यह blog आपको आछा लगा हो तो जरुर आपने दोस्तों को share करे

मन में कुछ भी सवाल हो या फिर कोई सुझाब देना हो तो  comment करके बता सकते हैं धनियाबाद

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Amit kujur: नमस्ते दोस्तों मेरा नाम Amit Kujur हे ,में इंडिया के Odisha States के रहने वाला हूँ | आछा लगता हे जब इन्टरनेट के मदत से कुछ सीखते हैं और उसे website/blog के जरिये आपही जसे दोस्तों के बिच शेयर करना आछा लगता हे और मुझे भी सिखने को बोहुत कुछ मिलता हे | इसी passion को लेकर sikhnaasanhe.com website नाम का ब्लॉग बनाएं जहा हिंदी भाषा के आसान सब्दों में हार तरह के technology और skills related आर्टिकल जरिये मेरा जितना जो experience और knowledge हे शेयर करता हूँ |

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